क्या वाकई कुलांचे भर रही अर्थव्यवस्था

सरकारी एजंसियों के आंकड़े दावा कर रहे हैं कि भारत की सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर में 20 फीसद से ज्यादा का उछाल आया है।

(बाएं) कौशिक बसु, भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार, आशिमा गोयल, अर्थशास्त्री। फाइल फोटो।

सरकारी एजंसियों के आंकड़े दावा कर रहे हैं कि भारत की सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर में 20 फीसद से ज्यादा का उछाल आया है। कई और क्षेत्रों में सुधार के संकेत बताए जा रहे हैं। केंद्र के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कह चुके हैं कि सुधार की यही रफ्तार रही तो दिसंबर तक कोविड पूर्व स्थिति में अर्थव्यवस्था पहुंच जाएगी। क्या सही मायनों में ऐसा हो रहा है? क्या जीडीपी वाकई तेजी से बढ़ रही है। अधिकांश अर्थशास्त्री इन आंकड़ों को भ्रम बता रहे हैं। क्योंकि, अर्थव्यवस्था के पूरे परिदृश्य को देखें तो अभी भी स्थितियां अच्छी नहीं बताई जा रही हैं। क्योंकि, जीडीपी में उछाल का जो असर दिखना चाहिए, वह कहीं दिख नहीं रहा है।
क्यों उठ रहे हैं सवाल

सरकारी आंकड़े मौजूदा वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून तक के हैं। ये आंकड़े दिखा रहे हैं कि इस दौरान भारत के जीडीपी में पिछले साल इसी अवधि के आंकड़ों के मुकाबले 20.1 फीसद की वृद्धि हुई है। अपने आप में यह चौंकाने वाला तथ्य लगता है, क्योंकि कहा तो यह जा रहा है कि अर्थव्यवस्था में मंदी फैली हुई है। अगर जीडीपी 20 फीसद की रफ्तार से बढ़ रही है तो कहां है मंदी। पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में जीडीपी में 24.4 फीसद की गिरावट आई थी। दरअसल, पिछले साल महामारी से लड़ने के लिए पूरे देश में जो पूर्णबंदी की गई थी, उससे देश में आर्थिक गतिविधि लगभग पूरी तरह से रुक गई थीं। इस वजह से जीडीपी का बेस यानी आधार ही बहुत नीचे चला गया, जिसे करीब 24 फीसद (-23.9) की गिरावट के तौर पर नापा गया। जब बेस बहुत नीचे चला जाता है तो थोड़ी उछाल भी बड़े सुधार का भ्रम पैदा कर देती है। हकीकत में हालात में उतना सुधार नहीं आया होता है। जाहिर है, अगर जीडीपी पिछले साल 24 फीसद गिर गई थी और इस साल उसी अवधि में 20 फीसद ऊपर आई है तो क्या इसे वाकई अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज होना कहा जाए?
खपत का स्तर

अर्थव्यवस्था में खपत चार साल पुराने स्तर पर है। जीडीपी की गिरावट और ताजा उछाल को अर्थशास्त्री कुछ यूं बता रहे हैं। माना जाए पिछले साल देश की जीडीपी 100 रुपए थी। 24 फीसद की गिरावट के बाद वह 76 रुपए पर आ गई। अब अगर उसमें 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई है, तो वह ऊपर तो बढ़ी है लेकिन बस 91 रुपए तक पहुंची है। जाहिर है, अर्थव्यवस्था अभी सौ रुपए तक नहीं पहुंची है। अगर ताजा आंकड़ों को इसके ठीक पहले की तिमाही यानी जनवरी 2021 से मार्च 2021 के आंकड़ों से तुलना करें तो देखेंगे कि जीडीपी में करीब 17 फीसद की गिरावट आई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अर्थव्यवस्था का सही आकलन करना है तो इसकी तुलना वित्त वर्ष 2019-20 के आंकड़ों से करनी चाहिए। जीडीपी का करीब 55 प्रतिशत अर्थव्यवस्था में खपत के स्तर से बनता है और इसे आर्थिक प्रगति का एक बड़ा सूचक माना जाता है। खपत पिछली कई तिमाही से गिरी ही हुई है और ताजा आंकड़ों में यह गिर कर 2017-18 के स्तर के आस पास पहुंच चुकी है। आम लोग अपनी खपत या खर्च बढ़ा नहीं रहे हैं। खपत नहीं बढ़ेगी तो अर्थव्यवस्था में निवेश भी नहीं होगा। इसलिए जानकार आगाह कर रहे हैं कि अगर इन आंकड़ों को ठीक से नहीं देखा गया तो अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर का गलत अंदाजा लग सकता है।
वी’ आकार में सुधार

वित्त मंत्रालय से लेकर आरबीआइ तक सभी सरकारी संस्थाओं ने दावा किया है कि अर्थव्यवस्था में सुधार ‘वी’ आकार में हो रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि पूर्णबंदी के दौरान सभी क्षेत्रों में विकास की दर नीचे गई और सुधार के दौरान उछाल सभी क्षेत्रों में हो रहा है। लेकिन जानकारों की राय में ‘वी’ आकार में सुधार का मतलब यह हुआ कि कुछ क्षेत्रों में विकास हो रहा है लेकिन कुछ दूसरे क्षेत्रों में या तो विकास की रफ्तार बहुत सुस्त है या विकास नहीं हो रहा है। संगठित और असंगठित क्षेत्रों के लिए समान रूप से विकास नहीं हो रहा है। जीडीपी गणना में असंगठित क्षेत्र पूरी तरह से शामिल नहीं किया जाता। संगठित क्षेत्र में अपेक्षाकृत तेजी से गिरावट आई, असंगठित क्षेत्र महामारी से बहुत अधिक प्रभावित हुआ। संगठित क्षेत्र में शुरू हुआ विकास भी समान नहीं है। फार्मास्यूटिकल्स, प्रौद्योगिकी, ई-रिटेल और सॉफ्टवेयर सेवाओं जैसे क्षेत्रों में महामारी के दौरान भी विकास हो रहा था और अब भी हो रहा है। पर्यटन, परिवहन, रेस्त्रां और होटल और मनोरंजन जैसे क्षेत्र अब भी बुरे दौर से गुजर रहे हैं। अभी भी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से नहीं खुली है।

आंकड़ों की बाजीगरी

जीडीपी के आंकड़े की सरकारी विज्ञप्ति में बताया गया है कि पिछले साल अप्रैल से जून के बीच देश की जीडीपी 26.95 लाख करोड़ रुपए थी, जो इस साल अप्रैल से जून की तिमाही में बढ़कर 32.38 लाख करोड़ हो गई है।यह बात नहीं लिखा गया कि पिछले साल इस तिमाही की जीडीपी उसके पिछले साल के मुकाबले 24.4 फीसद कम थी। 2019 में अप्रैल से जून के बीच भारत की जीडीपी थी 35.85 लाख करोड़ रुपए। इन तीन आंकड़ों को देखें तब स्पष्ट होता है कि अभी भी अर्थव्यवस्था दो साल पूर्व की स्थिति में नहीं पहुंच सकी है।
पिछले साल इस तिमाही में सरकार का खर्च जीडीपी का 16.4 फीसद हिस्सा था, जबकि इस बार जीडीपी में उसका हिस्सा 13 फीसद ही रह गया है। यह दिखाता है कि सरकार के अलावा दूसरे लोगों का लेन-देन ज्यादा बढ़ा है, जिसकी वजह से सरकारी खर्च की हिस्सेदारी कम हो गई है।

क्या कहते हैं जानकार

हकीकत में अप्रैल-जून 2019 के मुकाबले जीडीपी की ताजा विकास दर
-9.2 है, यानी उसमें 9.2 की गिरावट आई है। इतना ही नहीं, चिंता का असली विषय आंकड़ों के और अंदर छिपा हुआ है।

  • कौशिक बसु, भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार

महामारी के गंभीर झटके के बावजूद भारत की वृहद अर्थव्यवस्था ज्यादा स्वस्थ है और तेजी से वृद्धि के लिए तैयार है। उबरने की रफ्तार का उम्मीद से बेहतर होना अर्थव्यवस्था की आंतरिक मजबूती को दर्शाता है।

  • आशिमा गोयल,अर्थशास्त्री

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