भारत में लोग अब अपने बैंक खातों में पैसा रखने का तरीका बदल रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए आंकड़े बताते हैं कि पिछले पांच सालों में बड़ी संख्या में जमाकर्ताओं ने कम ब्याज वाले सेविंग्स अकाउंट से पैसा निकालकर अधिक रिटर्न देने वाले टर्म डिपॉजिट (FD) में लगाना शुरू कर दिया है। इससे देश में बैंक डिपॉजिट की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिला है।
आरबीआई ने कहा कि कुल बैंक डिपॉजिट में सेविंग्स डिपॉजिट का हिस्सा मार्च 2022 के 34.6 फीसदी से तेजी से घटकर मार्च 2026 में 28.7 फीसदी हो गया, जो बढ़ते ब्याज दर के माहौल में डिपॉजिट करने वालों की बदलती पसंद को दिखाता है।
इसके उलट, इसी समय के दौरान टर्म डिपॉजिट का हिस्सा 55.2% से बढ़कर 61.6% हो गया, जो दिखाता है कि ग्राहक बेहतर रिटर्न के बदले फिक्स्ड समय के लिए फंड लॉक करने को तैयार हो रहे हैं, आरबीआई की ‘जमा पर वार्षिक मूल सांख्यिकीय प्रतिफल’ रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
सेविंग बैंक अकाउंट पर कम ब्याज दर
सेविंग्स बैंक रेट में गिरावट का ट्रेंड 2025-26 के दौरान और तेज हो गया क्योंकि बैंकों ने रिसोर्स जुटाने और क्रेडिट ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट पर आकर्षक रेट देना जारी रखा। इसके चलते, पूरे बैंकिंग सिस्टम में ओवरऑल डिपॉजिट ग्रोथ मजबूत हुई।
बैंक अब सेविंग्स बैंक अकाउंट पर कम ब्याज देते हैं। सबसे बड़ा बैंक भारतीय रिजर्व बैंक (SBI) सेविंग्स अकाउंट पर सिर्फ 2.5% इंटरेस्ट देता है। पिछले दस वर्षों में सेविंग्स बैंक रेट लगभग 6-7% से गिर गए हैं।
दूसरी ओर, एसबीआई एक साल के एफडी पर 6.25% और दो साल के डिपॉजिट पर 6.45% ब्याज देता है। एचडीएफसी बैंक भी एक साल के एफडी पर 6.25% और सेविंग्स बैंक अकाउंट पर 2.5% ब्याज देता है। आरबीआई के रेपो रेट कम करने से सेलिंग्स बैंक रेट कम हो गए (जनवरी 2025 से RBI ने रेपो रेट को 6.50% से घटाकर 5.25% कर दिया है) जो कुल मिलाकर 125 बेसिस पॉइंट की गिरावट है।
कम हो जाती है परचेजिंग पावर
जब सेविंग्स बैंक डिपॉज़िट रेट रिटेल महंगाई से कम होता है, तो सेविंग्स पर असली रिटर्न नेगेटिव होता है। आसान शब्दों में, सेविंग्स अकाउंट में पैसे की परचेजिंग पावर समय के साथ कम होती जाती है।
बैंकों के मौजूदा सेविंग्स बैंक रेट अप्रैल के रिटेल इन्फ्लेशन लेवल 3.48% से लगभग 100 बेसिस पॉइंट कम हैं।
आरबीआई के डेटा के अनुसार, 15 मई 2026 तक बैंकिंग सेक्टर के डिमांड डिपॉजिट (SB और करंट अकाउंट) 31.65 लाख करोड़ रुपये और टर्म डिपॉज़िट 225.23 लाख करोड़ रुपये थे। करंट अकाउंट पर कोई ब्याज नहीं मिलता है।
सेविंग्स अकाउंट डिपॉजिट कस्टमर्स को उनके पैसे तक आसान एक्सेस देते हैं, जिससे वे बिना किसी पेनल्टी या प्रिंसिपल के नुकसान के कभी भी पैसे निकाल सकते हैं।
आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि जहां एक ओर परिवार भारत के जमा आधार का मुख्य आधार बने हुए हैं, वहीं दूसरी ओर बचतकर्ता पारंपरिक बचत खातों की तुलना में सावधि जमा को अधिक पसंद कर रहे हैं, जिससे बैंकों की देनदारी का स्वरूप बदल रहा है और वित्तीय प्रणाली में सावधि जमा की भूमिका मजबूत हो रही है।
परिवार सबसे बड़ा सोर्स
बैंकों में जमा राशि के सबसे बड़े स्रोत के रूप में परिवारों की हिस्सेदारी में मामूली गिरावट के बावजूद उनका स्थान बना रहा। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 के अंत में कुल जमा राशि में परिवारों की हिस्सेदारी 59.3% थी।
हालांकि, परिवार म्यूचुअल फंड और इक्विटी को निवेश के पसंदीदा विकल्पों के रूप में तेजी से अपना रहे हैं, क्योंकि वे फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे पारंपरिक बचत साधनों की तुलना में इनमें उच्च रिटर्न की संभावना से आकर्षित हैं। अन्य क्षेत्रों का योगदान भी बढ़ा है। गैर-वित्तीय क्षेत्र से जमा का हिस्सा एक वर्ष पहले के 17.7% से बढ़कर 18.5% हो गया, जबकि वित्तीय निगमों से जमा इसी अवधि में 6.8% से बढ़कर 7.8% हो गया।
बड़े एफडी का दबदबा है
सावधि जमाओं पर गहन नजर डालने से पता चलता है कि बड़ी जमा राशियों का दबदबा बना हुआ है। मार्च 2026 तक कुल सावधि जमाओं में से 46.3% जमा 1 करोड़ रुपये और उससे अधिक की थीं। इस श्रेणी में, अकेले 5 करोड़ रुपये और उससे अधिक की जमा राशि 34.8% थी। दूसरी ओर, आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, 5 लाख रुपये तक की जमा राशियां कुल सावधि जमाओं का 17.8% थीं।
डिपॉजिटर्स ने मीडियम-टर्म फिक्स्ड डिपॉजिट को भी साफ तौर पर पसंद किया। एक से तीन साल की ओरिजिनल मैच्योरिटी वाले टर्म डिपॉजिट का हिस्सा मार्च 2022 में 50.4% से बढ़कर मार्च 2026 में 69.8% हो गया। इस बीच, एक साल तक की मैच्योरिटी वाले डिपॉजिट का हिस्सा उसी समय के 16.7% से तेज़ी से घटकर 8.8% हो गया। इस ट्रेंड से पता चलता है कि कस्टमर्स लंबे समय के लिए अच्छे इंटरेस्ट रेट पाना चाहते थे।
RBI ने डिपॉज़िट के इंटरेस्ट-रेट प्रोफ़ाइल में भी बड़े बदलाव की जानकारी दी। 7% से कम इंटरेस्ट कमाने वाले टर्म डिपॉजिट का हिस्सा मार्च 2026 में बढ़कर 61.8% हो गया, जबकि एक साल पहले यह 27.3% था। यह बदलते इंटरेस्ट रेट साइकिल और बैंकिंग सिस्टम में डिपॉजिट की रीप्राइसिंग को दिखाता है।
इस बीच, सीनियर सिटिज़न्स का बैंक डिपॉजिट में हिस्सा स्थिर रहा। पिछले चार फाइनेंशियल वर्षों में उनका योगदान मोटे तौर पर 19.8-20.2% की रेंज में बिना किसी बदलाव के रहा और मार्च 2026 के आखिर में 20% था।
डिपॉजिट में बढ़ोतरी
RBI के मुताबिक, मार्च 2026 के आखिर तक शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों (SCBs) में डिपॉजिट साल-दर-साल 11.5% बढ़ा, जबकि एक साल पहले यह 10.6% बढ़ा था। खास बात यह है कि सभी आबादी वाले ग्रुप की बैंक ब्रांचों ने साल के दौरान डबल-डिजिट डिपॉज़िट ग्रोथ दर्ज की, जो बढ़ोतरी के बड़े पैमाने पर होने को दिखाता है।
FY26 के दौरान डिपॉजिट जुटाने में पब्लिक सेक्टर के बैंक सबसे बड़े योगदान देने वाले के तौर पर उभरे, बैंकिंग सिस्टम द्वारा जुटाए गए इंक्रीमेंटल डिपॉजिट का 50.8% हिस्सा इन्हीं बैंकों का था। प्राइवेट सेक्टर के बैंकों ने 38.6% का योगदान दिया, जिससे पता चलता है कि नई बचत को आकर्षित करने में इन दोनों सेगमेंट की अहम भूमिका रही है।
RBI के डेटा से यह भी पता चला कि डिपॉज़िट जुटाने में रीजनल रूरल बैंकों (RRBs) की भूमिका धीरे-धीरे कम हो रही है। मार्च 2026 में RRBs के पास मौजूद डिपॉजट का हिस्सा चार साल पहले के 3.2% से घटकर 2.9% हो गया, जिससे पता चलता है कि बड़े कमर्शियल बैंक घरेलू और इंस्टीट्यूशनल डिपॉज़िट को आकर्षित करने में आगे बढ़ रहे हैं।
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