फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फार्मेक्सिल) ने कहा है कि पश्चिम एशिया में चल रहे सैन्य संघर्ष के कारण आपूर्ति और माल ढुलाई में तमाम तरह की रुकावट आई हैं। काउंसिल ने कहा है कि फार्मा उद्योग को 2,500 करोड़ से लेकर 5,000 करोड़ रुपये तक के नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
काउंसिल के चेयरमैन नमित जोशी ने कहा कि खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सदस्य देशों का हिस्सा भारतीय दवा कंपनियों के कुल निर्यात में 5.58 प्रतिशत है।
नमित जोशी ने कहा कि औषधि निर्यात का मूल्य पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका क्षेत्र में वित्त वर्ष 2020-21 के 132.04 करोड़ डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 174.96 करोड़ डॉलर हो गया। जोशी के मुताबिक, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), सऊदी अरब, ओमान, कुवैत और यमन जैसे प्रमुख बाजार भारत पर सस्ती और जेनेरिक दवाओं के लिए काफी हद तक निर्भर हैं। जॉर्डन, कुवैत और लीबिया जैसे उभरते बाजारों में भी निर्यात बढ़ा है।
जोशी ने कहा कि वैश्विक माल ढुलाई बाजार में जारी चुनौतियों से भारतीय दवाओं का खाड़ी और उत्तरी अफ्रीकी देशों में निर्यात प्रभावित हो सकता है।
माल ढुलाई की दरें हुई दोगुनी
फार्मेक्सिल प्रमुख जोशी ने कहा कि आयात और निर्यात दोनों के लिए माल ढुलाई की दरें दोगुनी हो गई हैं तथा प्रति खेप 4,000 से 8,000 डॉलर तक अतिरिक्त शुल्क लगने से कंपनियों पर भारी दबाव है।
जोशी ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट के कारण मार्च में निर्यात पूरी तरह बाधित होने की स्थिति में उद्योग को लगभग 2,500 करोड़ रुपये से 5,000 करोड़ रुपये तक का संभावित नुकसान हो सकता है। जोशी ने सरकार से अपील की कि दवा निर्यातकों के लिए मालभाड़ा राहत, सब्सिडी और लॉजिस्टिक सहायता जैसे उपायों पर विचार किया जाए।
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