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एशिया की करंसी में 2018 के सबसे निचले स्‍तर पर पहुंचा रुपया

भारतीय रुपया जनवरी 2017 से अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। रुपया वर्तमान में यूएस डॉलर की तुलना में 6.22 फीसदी रसातल में जा चुका है जबकि साल 2017 में ये आज की तुलना में 6 फीसदी से अधिक ऊपर गया था।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

भारतीय रुपया जनवरी 2017 से अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। 68 रुपये प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक और महत्वपूर्ण अंक से भी रुपया फिसल चुका है। कर्नाटक में होने वाले चुनाव के नतीजों का इंतजार बाजार के निवेशकों को था, करंसी के अस्थिर होने के पीछे ये बड़ा कारण हो सकता है। कर्नाटक में अब केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने अकेली सबसे बड़ी पार्टी होने का करिश्मा तो कर लिया, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े से थोड़ा ही पीछे रह गए। वहीं राजनीतिक नेतृत्व के अलावा कुछ अन्य कारक जैसे कच्चे तेल के ऊंचे दाम, कर्ज की वसूली न हो पाना और घरेलू उद्योगों के प्रदर्शन में गिरावट भी रुपये की अस्थिरता के बड़े कारण माने जा सकते हैं।

डॉलर की तुलना में रुपये में पूरे दिन गिरावट का दौर जारी रहा। मॉर्केट खुलने के वक्त एक डॉलर की कीमत 68.14 रुपये थी जबकि बाजार बंद होते समय डॉलर की कीमत 68.11 रुपये थी। जबकि इससे पहले रुपया 67.52 रुपये पर बंद हुआ था। मार्केट विशेषज्ञ और मैकलाई फिनेंनसियल के सीईओ जमाल मैकलाई ने मीडिया से कहा,’ रुपये में गिरावट कर्नाटक चुनाव के नतीजों का शुरुआती झटका भर है। जिस तरीके से कर्नाटक चुनाव के नतीजों के कारण पूरा घटनाक्रम बदला है। इसने राज्य की सियासत में अनिश्चितता को बढ़ावा दिया है।’

डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये में आ रही गिरावट ने अर्थशा​स्त्रियों को चिंता में डाल दिया है। फोटो- पीटीआई ग्राफिक

हालांकि दिन भर की अस्थिरता राजनीति के कारण बनी रही। लेकिन भारतीय रुपये को वैश्विक और देश के भीतर चल रही उथल—पुथल के कारण भी कई झटके खाने पड़े हैं। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। बड़ी मात्रा में तेल का आयात भारत के वर्तमान बाजार घाटे को 2.3 प्रतिशत तक बढ़ा देगा जबकि पिछले साल यही बाजार घाटा सकल घरेलू उत्पाद का करीब 1.9 फीसदी तक रहा था। ये बातें मंगलवार (15 मई) को एचएसबीसी की ग्लोबल रिसर्च रिपोर्ट में कही गई हैं।

इसी बीच, देश से प्रतिभा पलायन भी तेज हो गया है। विदेशियों ने इस साल भारत में करीब 22071 हजार करोड़ रुपये बेचे हैं। अगर कुल निकासी को देखें तो कर्ज और इक्विटी बाजार दोनों को मिलाकर करीब 17,096 करोड़ बनता है। घरेलू बाजार के इन आंकड़ों के कारण यूएस डॉलर के लेनदेन और वैश्विक मौद्रिक नीति के कारण ही रुपये की बाजार में ये हालत हुई है। भारतीय रुपया वर्तमान में यूएस डॉलर की तुलना में 6.22 फीसदी रसातल में जा चुका है जबकि साल 2017 में ये आज की तुलना में 6 फीसदी से अधिक ऊपर गया था।

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