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भारत को बड़े कर सुधारों की जरूरत: न्यायमूर्ति सीकरी

न्यायधीश एके सीकरी ने कहा कि जीडीपी और कराधान के रूप में सृजित समूची आय में आयकर का हिस्सा प्रत्यक्ष कर की तुलना में काफी कम है

Author नई दिल्ली | July 21, 2016 6:59 PM
आयकर विभाग कई तरीकों से वित्‍तीय लेनदेन पर नजर रखता है। (प्रतीकात्‍मक फोटो)

उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश ए के सीकरी ने कहा है कि भारत को बड़े सुधारों के साथ अपनी कर व्यवस्था को बेहतर करने की जरूरत है, क्योंकि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में आयकर का हिस्सा काफी कम है। कर मुद्दों पर एक पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि विभिन्न पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है। इनमें आयकर को पूरी तरह समाप्त करने का सुझाव भी आता है, जैसा कर पनाहगाह वाले देशों में है।

अधिवक्ता मुकेश बुटानी की पुस्तक ‘टैक्स डिसप्यूट रिजोलेशन, चैलेंजेज एंड अपॉरच्यूनिटीज फॉर इंडिया’ का विमोचन करते हुए उन्होंने कहा कि जीडीपी और कराधान के रूप में सृजित समूची आय में आयकर का हिस्सा प्रत्यक्ष कर की तुलना में कितना है, यह काफी कम है। वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने इस पुस्तक का विमोचन किया। इस पुस्तक में मौजदूा दायरे से बाहर के कुछ सुझाव दिए गए हैं। इसमें मौजूदा कर व्यवस्था को आधुनिक और बदलावों के अनुरूप बनाने के लिए नए विचारों को रखा गया है। साल्वे ने कहा कि सोच बदलने की जरूरत है।

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