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तेल का खेल : लोगों तक पहुंचने में तीन गुना क्यों बढ़ जाती है कीमत

तरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगातार गिर रही है, लेकिन अपने देश में कीमतें कम नहीं हो रहीं। उल्टे महंगाई का रेकॉर्ड तोड़ते हुए सौ रुपए प्रति लीटर का आंकड़ा छूने लगी हैं। आखिर क्या कारण है इसका? कैसे लोगों तक पहुंचते में पेट्रोल-डीजल की कीमत तीन गुना से ज्यादा बढ़ जाती है?

Author Updated: February 22, 2021 10:55 PM
oil priceसांकेतिक फोटो।

भारत अपनी जरूरत का 85 फीसद से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। विदेशों से आने वाला कच्चा तेल शोधनागारों में जाता है। वहां पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट निकाले जाते हैं। इसके बाद ये उत्पाद तेल कंपनियों के पास जाते हैं, जैसे- इंडियन आॅयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम। ये कंपनियां मुनाफा जोड़कर पेट्रोल पंप तक पहुंचाती हैं। पेट्रोल पंप का मालिक अपना कमीशन जोड़ता है। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से लगने वाला टैक्स जोड़ता है।

सरकार विदेश से कच्चा तेल बैरल में खरीदती है। एक बैरल यानी 159 लीटर। इस साल नवंबर में दिल्ली एक लीटर पेट्रोल की कीमत थी 81.06 रुपए। इंडियन आॅयल कॉरपोरेशन ने एक लीटर पेट्रोल की आधारभूत कीमत 25.37 रुपए तय की थी। इसके बाद इसमें 32.98 रुपए आयात शुल्क (केंद्रीय कर), 18.71 रुपए सेस (राज्य कर), पेट्रोल पंप के मालिक का कमीशन उसके बाद 3.64 रुपए और अन्य कर मिलाकर कीमत पहुंची 81 रुपए। पेट्रोल की तरह ही डीजल की आधारभूत कीमत भी 25 रुपए प्रति लीटर रही नवंबर में।

दिल्ली में तब एक लीटर पेट्रोल की बेस प्राइस 24.42 रुपए थी। केंद्र का कर 31.83 रुपए, 10.36 रुपए राज्य का कर और 2.52 रुपए पेट्रोल पंप के मालिक का कमीशन लगा गया। इसके बाद एक लीटर डीजल की कीमत हो गई 70 रुपये 46 पैसे।

मई 2020 केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला आयात शुल्क बढ़ाया था। मई 2014 में जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी थी, तब एक लीटर पेट्रोल पर 9.48 रुपए और डीजल पर 3.56 रुपए आयात शुल्क लगता था। तब से 16 बार आयात शुल्क बढ़ा है। कमी सिर्फ तीन बार की गई है। सरकार को इससे अच्छी-खासी कमाई होती है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी पीपीएसी के मुताबिक, इसी साल पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर आयात शुल्क और अलग-अलग करों के जरिए 49,914 करोड़ रुपए कमाई की है।

केंद्र के बाद राज्य सरकारें वैट लगाकर कमाती हैं। पूरे देश में सबसे ज्यादा वैट तेलंगाना सरकार वसूलती है। यहां 35.20 फीसद कर पेट्रोल पर और 27 फीसद वैट डीजल पर लगता है। उसके बाद तमिलनाडु और तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश सरकार है। भारत में पेट्रोल और डीजल की सबसे ज्यादा खपत यातायात और कृषि क्षेत्र में होती है।

इसलिए पेट्रोल डीजल की कीमतें अप्रत्यक्ष रूप से भारत के आम आदमी की जेब पर ही असर डालती हैं। केंद्र सरकार का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम करना उसके हाथ में नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कीमतों में बढ़ोतरी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है। भारत में जहां पेट्रोल-डीजल की कीमतें जबर्दस्त बढ़ी हैं। वहीं पड़ोसी देशों में इनकी कीमतों में कमी आई है।

पाकिस्तान में अप्रैल 2014 में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 66.17 रुपए और डीजल की कीमत 71.27 रुपए थी। लेकिन अब वहां एक लीटर पेट्रोल 51.13 रुपए और डीजल 53 रुपए के आसपास है। हमारे चार पड़ोसियों में सिर्फ बांग्लादेश ही ऐसा है, जिसने इस दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतें मामूली बढ़ाई हैं।

कर वसूली दोगुनी

मई 2014 में जब भाजपा की सरकार बनी, तब कच्चे तेल की कीमत 106.85 डॉलर प्रति बैरल थी। जनवरी 2021 में 54.79 डॉलर प्रति बैरल थी। कच्चे तेल की कीमतें लगभग आधी हो गई हैं। लेकिन कर वसूली दोगुनी बढ़ी है। वर्ष 2014 तक पेट्रोल पर 34 फीसद और डीजल पर 22 फीसद कर लगते थे, लेकिन आज पेट्रोल पर 64 फीसद और डीजल पर 58 फीसद तक कर वसूली होती है।
हम पहले की तुलना में पेट्रोल पर दोगुना और डीजल पर ढाई गुना कर दे रहे हैं।

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