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NPA पर नियंत्रण करने में RBI बैंक नाकाम, कर्ज बसूल कर पाना बैंकिंग व्यवस्था के लिए खतरा

संसद की एक समिति ने रिजर्व बैंक और बैंकों की ओर से गैरनिष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) से निपटने के तरीके को लेकर नाखुशी जताई और कहा कि एनपीए का बढ़ना इस मामले से निपटने की प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।

Author मुंबई | Published on: February 25, 2016 1:11 AM
RBI गवर्रन रघुराम राजन ( FE PHOTO)

संसद की एक समिति ने रिजर्व बैंक और बैंकों की ओर से गैरनिष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) से निपटने के तरीके को लेकर नाखुशी जताई और कहा कि एनपीए का बढ़ना इस मामले से निपटने की प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। यह मुद्दा बैंकिंग व्यवस्था की स्थिरता के लिए खतरा है।

समिति ने यह भी कहा है कि रिजर्व बैंक फंसे कर्ज के मामले में नियमों को लागू करने को लेकर पूरी तरह सफल नहीं हुआ है। समिति की राय में निष्क्रिय नियामक नहीं रहना चाहिए बल्कि चूक के मामले में बैंकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की शक्ति का उपयोग करना चाहिए। सितंबर 2015 तक के आंकड़ों के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की गैरनिष्पादित परिसंपत्ति 2,05,024 करोड़ रुपए जबकि सकल एनपीए 3,69,990 करोड़ रुपए थी।

वित्त पर संसद की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एनपीए या फंसे कर्ज का बढ़ना इस मामले से निपटने की प्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। कुछ अनुमान में सकल एनपीए के चालू वित्त वर्ष में 4.0 लाख करोड़ रुपए पहुंच जाने की बात कही गई है। समिति ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि सरकार व रिजर्व बैंक के समय-समय पर कदम उठाए जाने के बाद भी वित्तीय क्षेत्र के समक्ष एनपीए की समस्या बढ़ती जा रही है और बैंक प्रणाली की स्थिरता के लिए खतरा बनती जा रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंक का बहीखाता दबाव में बना हुआ है। बैंकों के ताजा तिमाही परिणाम उनकी खराब स्थिति बयां करते हैं। अधिकतर सरकारी बैंकों के लाभ में भारी गिरावट आई है जबकि एनपीए और उसके लिए किए जाने वाले पूंजी प्रावधान बढ़ रहे हैं। इसमें कहा गया है कि एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और आर्थिक शक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही है, वहीं एनपीए में वृद्धि की प्रवृत्ति से वृद्धि की कहानी खराब हो सकती है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता एम वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा कि समिति रिजर्व बैंक और बैंकों के स्तर पर समस्या से निपटने के तरीके से खुश नहीं है। स्पष्ट रूप से बैंक अपने दिए गए कर्ज के फंसे होने के शुरुआती संकेत को नहीं समझ सके। समिति के अनुसार सितंबर 2015 की स्थिति के अनुसार 6.8 लाख करोड़ बैंक कर्ज फंसे हुए की श्रेणी में थे जबकि एक साल पहले यह 5.91 लाख करोड़ रुपए था।

लोकसभा और राज्यसभा की समिति ने कहा कि एनपीए की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए शुरू में ही और समय पर हस्तक्षेप के साथ स्थिति को ठीक करने के लिए उपाय किया जाना जरूरी है। समिति पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शामिल हैं। समिति ने तीन स्तरों- रिजर्व बैंक, बैंक और कर्ज लेने वाले पर अधिकार प्राप्त समिति गठित करने की सिफारिश की है जो बड़े कर्ज की स्थिति पर नजर रखेगी। रिपोर्ट के अनुसार बैंक के निदेशक मंडल में शामिल आरबीआइ मंत्रालय के नामित निदेशकों के साथ-साथ बैंक के चेयरमैन-प्रबंध निदेशकों की जवाबदेही भी मामले में तय की जानी चाहिए।

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