HDFC Bank News: इस साल मार्च में एचडीएफसी के पूर्व अध्यक्ष अतुल चक्रवर्ती ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय उन्होंने जारी बयान में कहा था कि बैंक में कुछ ऐसी घटनाएं और प्रथाएं चल रही हैं, जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों से मेल नहीं खातीं। इस बड़े घटनाक्रम के बाद एचडीएफसी बैंक ने सफाई देते हुए कहा था कि वहां किसी तरह की गवर्नेंस से जुड़ी दिक्कत नहीं है। वहीं रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी स्पष्ट किया था कि रिकॉर्ड में किसी प्रकार की कोई गंभीर चिंता दिखाई नहीं देती।

अब इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया है कि जिस समय यह सब कुछ हो रहा था, उसी दौरान बैंक एक अंदरूनी जांच में व्यस्त था। दरअसल, 12 मार्च को एचडीएफसी बैंक की ऑडिट कमिटी ने इंटरनल विजिलेंस इन्वेस्टिगेशन यानी अंदरूनी जांच शुरू की थी।

सीक्रेट डील कब हुई, क्या है कहानी?

असल में महाराष्ट्र सरकार की एजेंसी Maharashtra State Road Development Corporation (MSRDC) को 45 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ था। सवाल यह था कि ये पैसे क्यों दिए गए, किस नियम के तहत ट्रांसफर किए गए और आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि एचडीएफसी बैंक ने इस खर्च को मार्केटिंग खर्च के रूप में दिखा दिया।

जानकारी के लिए बता दें कि MSRDC महाराष्ट्र सरकार की एक बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंसी है जो सड़क, एक्सप्रेसवे और बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स पर काम करती है। इनके पास बड़ी मात्रा में पैसा आता-जाता रहता है। ऐसी सरकारी एजेंसियां अपने पैसे बैंकों में जमा करती हैं और बैंकों को भी इनसे फायदा रहता है क्योंकि हजारों करोड़ रुपये जमा होते हैं।

इस मामले की शुरुआत साल 2021 में हुई जब एचडीएफसी बैंक ने MSRDC से कहा कि वह अपना पैसा बैंक में जमा कर सकता है। उस समय एचडीएफसी बैंक सामान्य सेविंग अकाउंट पर लगभग 3.5% ब्याज दे रहा था। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में सामने आया कि MSRDC ने अनौपचारिक रूप से कहा था कि दूसरे संस्थान उन्हें 6% या उससे ज्यादा ब्याज दे रहे हैं। महाराष्ट्र की इस एजेंसी ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि अगर एचडीएफसी बैंक इससे बेहतर रेट देगा, तभी वह अपने हजारों करोड़ रुपये बैंक में जमा करेगी।

डील के शुरुआती, क्या चर्चा हुई थी?

इसके बाद एचडीएफसी बैंक और MSRDC के बीच एक कथित मौखिक डील हुई जिसमें 6.01% रिटर्न देने की बात कही गई। बड़ी बात यह थी कि इसकी कोई लिखित मंजूरी नहीं थी, लेकिन कहा गया कि वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी थी और उनकी सहमति भी थी।

समझने वाली बात यह है कि कोई भी बैंक सामान्य नियमों का पालन करते हुए किसी एजेंसी को इतना ब्याज नहीं दे सकता। इसी वजह से एचडीएफसी बैंक ने एक स्पेशल रेट निकाला जो 4.25% था। इंडियन एक्सप्रेस को पता चला कि कुछ समय बाद इस स्पेशल रेट को भी बंद करना पड़ा क्योंकि महाराष्ट्र की एजेंसी ने उतना पैसा बैंक में जमा नहीं किया जितनी उम्मीद थी।

यहां एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है। एचडीएफसी बैंक ने कथित तौर पर MSRDC से 6.01% ब्याज देने का वादा तो कर दिया, लेकिन नियम इसकी अनुमति नहीं देते थे। ऐसे में 2.51% का अंतर रह गया जिसे तकनीकी भाषा में “डिफरेंशियल इंटरेस्ट” कहा गया।

आरोप है कि एचडीएफसी बैंक ने इस अतिरिक्त ब्याज को अपने रिकॉर्ड्स में ब्याज के रूप में नहीं दिखाया बल्कि उसे मार्केटिंग खर्च बता दिया। इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि बैंक ने रोड सेफ्टी अवेयरनेस कैंपेन के नाम पर कुछ चुनिंदा वेंडर्स के जरिए यह भुगतान किया।

HDFC बैंक ने क्या ‘खेल’ किया?

बताया गया कि भुगतान बैंक के मार्केटिंग विभाग से करवाया गया और CSR टीम को इसमें शामिल नहीं किया गया। वहीं, चार लोकल वेंडर्स के जरिए इनवॉइस तैयार किए गए। यहां भी कथित तौर पर गड़बड़ी सामने आई। एक ही फोटो को तीन अलग-अलग इनवॉइस में इस्तेमाल किया गया और इन इनवॉइस की कुल रकम करीब 9 करोड़ रुपये थी।

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में यह भी सामने आया कि कथित डील के दौरान सही तरीके से वेरिफिकेशन नहीं किया गया। ऑडिट रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि रोड सेफ्टी को लेकर कोई कैंपेन वास्तव में हुआ भी था या नहीं। इसके समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं मिले। इसके बावजूद FY2023-24 और FY2024-25 के लिए 39.7 करोड़ रुपये का योगदान एचडीएफसी बैंक के रिकॉर्ड्स में दिखाया गया।

इस विवादित कड़ी पर बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर रवि संथानम ने कथित तौर पर जांच में माना था कि मार्केटिंग विभाग ने इस पूरे स्ट्रक्चर में भूमिका निभाई थी। बैंक के मार्केटिंग डिपार्टमेंट ने भी बताया कि बिजनेस टीम ने एक डील तैयार की थी, बैंक के वित्त विभाग ने अतिरिक्त बजट दिया था और मार्केटिंग विभाग की तरफ से भुगतान को प्रोसेस किया गया था। जांच में यह भी कहा गया कि जिस रकम को मार्केटिंग खर्च दिखाया गया, वह असल में डिफरेंशियल इंटरेस्ट को छिपाने के लिए इस्तेमाल की गई थी।

आरोप किस-किस पर लगे हैं?

एचडीएफसी बैंक के CEO शशिधर जगदीशन को लेकर भी जांच में कुछ आरोप लगे हैं। इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि महाराष्ट्र की एजेंसी के साथ जो बड़े स्तर की चर्चाएं चल रही थीं, उनमें शशिधर जगदीशन भी शामिल थे।

इसी तरह बैंक के CFO श्रीनिवासन वैद्यनाथन पर भी आरोप लगे हैं कि वे विभिन्न चर्चाओं का हिस्सा रहे। कथित तौर पर जो रिइम्बर्समेंट स्ट्रक्चर तैयार किया गया, उसमें भी उनकी अहम भूमिका थी। विजिलेंस रिपोर्ट का निष्कर्ष यह बताता है कि MSRDC से जुड़ी पूरी प्रक्रिया तय मंजूरी व्यवस्था से बाहर थी और आरबीआई के नियमों का उल्लंघन हुआ।

आरबीआई के नियम स्पष्ट कहते हैं कि किसी ग्राहक को छिपे हुए स्पेशल रिटर्न नहीं दिए जा सकते। सभी ग्राहकों के लिए एक समान नियम होते हैं। लेकिन जांच में आरोप लगा कि एचडीएफसी बैंक ने MSRDC को अतिरिक्त फायदा पहुंचाने की कोशिश की। बड़ी बात यह थी कि इस अतिरिक्त लाभ को ब्याज के रूप में नहीं दिखाया गया बल्कि मार्केटिंग खर्च में डाल दिया गया।

इस मामले में पांच बड़े किरदार सामने आए हैं। पहले अतुल चक्रवर्ती, जो अब पूर्व अध्यक्ष हैं। दूसरे शशिधर जगदीशन जो वर्तमान में एचडीएफसी बैंक के CEO हैं। तीसरे श्रीनिवासन वैद्यनाथन जो बैंक के CFO हैं और कथित इन्वेस्टमेंट स्ट्रक्चर में उनकी भूमिका बताई गई। चौथे रवि संथानम जो बैंक के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर हैं। और पांचवां किरदार है रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जिसके नियमों के उल्लंघन का आरोप है।

और क्या बड़े खुलासे हुए?

  1. एचडीएफसी बैंक की इस कथित डील की जब इंटरनल ऑडिट में जांच हुई तो बैंक की परफॉर्मेंस को “Unsatisfactory” यानी असंतोषजनक बताया गया।
  2. दूसरा बड़ा खुलासा यह रहा कि 10 अप्रैल को यह मामला ऑडिट कमिटी ऑफ द बोर्ड के पास भेजा गया। इसके एक हफ्ते बाद मामला नॉमिनेशन एंड रेम्यूनरेशन कमिटी तक भी पहुंच गया। इसका सीधा मतलब है कि मामला टॉप मैनेजमेंट तक पहुंच चुका था।
  3. तीसरा खुलासा यह रहा कि महाराष्ट्र की एजेंसी ने कथित तौर पर 5 करोड़ रुपये की “अपफ्रंट” रकम भी मांगी थी। यानी डिपॉजिट अरेंजमेंट शुरू होने से पहले ही कुछ भुगतान की मांग की गई थी। बताया गया कि इस मांग को ठुकरा दिया गया, लेकिन इसके बाद 6.01% ब्याज वाला स्ट्रक्चर तैयार किया गया।
  4. एक अन्य खुलासे में सामने आया कि जूनियर स्टाफ मेंबर्स से अहम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए थे।
  5. विजिलेंस रिपोर्ट के मुताबिक जो दस्तावेज सामने आए वे अधूरे थे और खराब तरीके से तैयार किए गए थे। उदाहरण के लिए, उनमें कार्यकाल का कोई जिक्र नहीं था, न्यूनतम बैलेंस थ्रेशोल्ड की जानकारी नहीं थी और 6.01% की मौखिक सहमति का भी कहीं उल्लेख नहीं किया गया था।
  6. एक बड़ा खुलासा यह भी रहा कि रवि संथानम ने कथित तौर पर कहा था कि महाराष्ट्र की एजेंसी को जो भुगतान किया गया, उसका केवल छोटा हिस्सा ही मार्केटिंग एक्टिविटी पर खर्च हुआ था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि वेंडर इन्वॉइस विश्वसनीय लगें।

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