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मील का पत्थर साबित हो सकता है GST

लोकसभा में जिस विधेयक का प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने जोरदार विरोध किया था, राज्यसभा में वही सरकार के सुर में सुर मिलाने को मजबूर हो गई।

Author नई दिल्ली | August 5, 2016 12:47 AM

लोकसभा में जिस विधेयक का प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने जोरदार विरोध किया था, राज्यसभा में वही सरकार के सुर में सुर मिलाने को मजबूर हो गई। क्षेत्रीय दल तो पहले भी इस एकल कर प्रणाली के ज्यादा विरोध में नहीं थे, पर कांग्रेस को यू टर्न लेना पड़ा है तो यह मौजूदा आर्थिक परिवेश में जीएसटी की अपरिहार्यता का ही संकेत है। तभी तो राज्यसभा में इसके पारित होने पर देसी-विदेशी सभी कारोबारी जश्न मना रहे हैं। सरकार के लिए बड़ी चुनौती देश में विदेशी निवेश लाना है। आर्थिक क्षेत्र का हर जानकार मान रहा है कि नई व्यवस्था सरकार को एफडीआई जुटाने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

देश में दो तरह की कर व्यवस्था लागू है। एक आयकर और संपत्ति कर है जिसे प्रत्यक्ष कर कहते हैं। जबकि अप्रत्यक्ष करों की सूची लंबी है। केंद्र जहां सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क के अलावा सर्विस टैक्स भी वसूल रहा है, वहीं राज्यों ने बिक्री कर और चुंगी से लेकर मनोरंजन कर व प्रवेश कर जैसे कई-कई टैक्स लागू कर रखे हैं। एक से ज्यादा टैक्स होना तो कारोबार को जटिल बनाता ही है, टैक्स की दरें राज्यों में अलग-अलग होने से तस्करी और कर चोरी भी बढ़ती है। ईमानदार व्यापारी इसमें सरकारी तंत्र के हाथों उत्पीड़न की शिकायत भी लगातार करते रहे हैं।
1991 में देश में आर्थिक उदारीकरण के दौर की शुरुआत और भारत के विश्व व्यापार संगठन का हिस्सा बन जाने के बाद से ही विदेशी निवेशक भारतीय कर प्रणाली के जटिल ढांचे के कारोबार में व्यवधान होने की शिकायत करते रहे हैं। मसलन अगर कोई तमिलनाडु में कारखाना लगाता है तो दूसरे राज्यों में अपने उत्पाद की बिक्री करना उसके लिए झंझट भरा था। जीएसटी की सबसे बड़ी खासियत यही होगी कि सारे देश में अप्रत्यक्ष कर की दर बराबर रहेगी। सस्ते के चक्कर में कोई दूसरे सूबे से खरीदारी का सिरदर्द अब लेगा ही नहीं। तो कारोबारियों को भी अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग कर कानूनों के पचड़ों से राहत मिल जाएगी।

दरअसल जीएसटी को लेकर सरकार को यह भरोसा है कि इससे देश की आर्थिक विकास दर में कम से कम दो फीसद का इजाफा तो जरूर होगा। यानी विकास दर को दहाई के आंकड़े तक पहुंचाने का अपना जो सपना अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अधूरा छोड़ गए, मोदी के राज में वह पूरा हो सकता है। फिर कारोबार बढ़ेगा तो रोजागर के अवसर भी खुद-ब-खुद बढ़ेंगे ही। तमाम तरह के अप्रत्यक्ष करों को जोड़ें तो अलग-अलग राज्यों में सारे करों की यह मौजूदा दर 27 से 32 फीसद तक है। जीएसटी के मामले में कांग्रेस का शुरू से आग्रह रहा है कि सरकार इसकी अधिकतम दर 18 फीसद तय करे। बेशक सरकार ने इसकी हामी नहीं भरी है। पर संकेत यही है कि शुरू में यह दर बीस फीसद हो सकती है।

जहां तक जीएसटी के सकारात्मक पक्ष का सवाल है, विदेशी निवेशकों को अब यहां निवेश करने में अड़चनें कम होंगी। इससे टैक्स चोरी पर भी अंकुश लगेगा। तभी तो मूडीज और फिच जैसी अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजंसियों से लेकर फिक्की, एसोचैम, सीआइआइ और पीएचडी चैंबर आॅफ कामर्स जैसे तमाम बड़े देसी व्यवसायिक संगठन जश्न मना रहे हैं। सरकार ने भी दावा किया है कि कुछेक चीजों को छोड़ कर ज्यादातर चीजों की कीमतों में कमी ही आएगी।

जीएसटी को अगर वित्त मंत्री अरुण जेटली ऐतिहासिक अध्याय की शुरुआत बता रहे हैं तो इसमें कुछ अतिशयोक्ति है भी नहीं। जिस कानून के लिए संसद के दोनों सदनों की दो तिहाई बहुमत वाली सहमति के अलावा देश के कम से कम आधे राज्यों की मंजूरी भी जरूरी हो, उसके विरोध में अगर देश के सर्वोच्च सदन में एक भी मत नहीं पड़ा हो तो राष्ट्रहित में व्यापक राजनीतिक सहमति की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है? हां, तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों को टैक्स में अपनी हिस्सेदारी घटने की आश्ांका ने जरूर इस व्यवस्था का आलोचक बना रखा था। पर जीएसटी काउंसिल के गठन और उसमें दो तिहाई अधिकार राज्यों को सौंपने व शुरुआत के सालों में घाटे की भरपाई केंद्र द्वारा करने के वादे ने माहौल को जीएसटी का पक्षधर बना दिया। तभी तो सात घंटे की लंबी बहस के बाद एक ही दिन में इस विधेयक को उसी सदन ने पारित कर दिया, जिसे लेकर सरकार आशंकित थी।

जीएसटी कानून को जेटली ने अगले वित्त वर्ष से अमली जामा पहनाने का इरादा जताया है। पर उससे पहले सरकार को इसके प्रावधानों को साफ करना पड़ेगा। छोटे कारोबारियों की आशंका दूर करनी होगी और इसके दायरे से बाहर रखे जाने वाले कारोबार की सीमा भी तय करनी पड़ेगी। छोटे व्यापारियों को अभी एक ही डर सता रहा है कि वे कारोबार और टैक्स का ब्योरा आॅनलाइन कैसे दाखिल करेंगे। बड़ा फैसला करने वाली सरकार इसकी सुगम और सरल व्यवस्था नहीं कर पाएगी, लगता नहीं।

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