विकास, बाजार और विरोधाभास

करोना संकट से पहले ही दुनिया के आर्थिक क्षितिज पर खतरे की रेखाएं उभरने लगी थीं और एक साथ दुनिया की तमाम आर्थिक शक्तियां घोर संरक्षणवादी रास्ते पर बढ़नी शुरू हो गई थीं।

सांकेतिक फोटो।

कोरोना संकट से पहले ही दुनिया के आर्थिक क्षितिज पर खतरे की रेखाएं उभरने लगी थीं और एक साथ दुनिया की तमाम आर्थिक शक्तियां घोर संरक्षणवादी रास्ते पर बढ़नी शुरू हो गई थीं। इसे एक तरफ जहां वैश्वीकरण की प्रक्रिया के विरोधाभासी पटाक्षेप के तौर पर देखा जा रहा था, तो वहीं आर्थिक असमानता के सामने आए भयावह तथ्यों के बीच ईमानदार और पारदर्शी समावेशी विकास की दरकार नीति निर्माताओं को समझ में आने लगी थी।

इस बीच, कोरोना संकट ने अर्थ जगत की चुनौतियों को एक ऐसी सतह पर लाकर रख दिया जहां से आगे का रास्ता कठिन से ज्यादा अबूझ है। बहरहाल, इस बीच भारत जैसे देश ने थोड़ी उम्मीद इसलिए बहाल रखी क्योंकि हमारा आर्थिक ढांचा हमारी संस्कृति की तरह ही बहुलतावादी आधारों पर तय हुआ है। खासतौर पर हाल में सामने आए कुछ तथ्यों से ऐसा जरूर लगता है कि हमारी अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है। हाल में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े जारी किए। मौजूदा वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून के आंकड़े बताते हैं कि देश की विकास दर 20.1 फीसद रही है। ये चीन से भी बेहतर आंकड़े हैं क्योंकि पहली तिमाही में चीन की विकास दर 7.9 फीसद दर्ज की गई है।

पिछले साल जब देश कोरोना की पहली लहर का सामना कर रहा था, तब भारत में दुनिया का सबसे लंबा और बड़ा ‘लॉकडाउन’ लगाया गया था। इस वजह से पिछले वित्त वर्ष यानी 2020-21 की पहली तिमाही में विकास दर निगेटिव में चली गई थी। तब यह माइनस 24.4 फीसद दर्ज की गई थी। वैसे विकास दर में सुधार के दावे पहले से किए भी जा रहे थे। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) की इकोरैप रिसर्च रिपोर्ट में अप्रैल-जून तिमाही के दौरान जीडीपी में 18.5 फीसद की दर से वृद्धि का अनुमान लगाया गया था। वहीं, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही के लिए 21.4 फीसद की वृद्धि का अनुमान जताया था।

उधर, देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम ने कहा है कि बाहरी क्षेत्र बेहतर स्थिति तैयार कर रहा है। फॉरेक्स रिजर्व बढ़ रहा है। महामारी के कारण आपूर्ति में समस्याएं आने के बावजूद महंगाई वैश्विक आर्थिक संकट (जीएफसी) के मुकाबले कहीं कम रही है। उनके आकलन के मुताबिक पेट्रोलियम खपत और आॅटो बिक्री के क्षेत्र में आ रहा स्थिर सुधार संकेत कर रहा है कि हालात महामारी से पहले जैसे हो रहे हैं।

शेयर बाजार को तो जैसे तेजी और सुधार के इन आंकड़ों का पहले से ही भान था। वह पिछले महीनों से ऊपर की तरफ भागने में लगा था। विकास दर के आंकड़े जब आए तो सेंसेक्स पहली बार 57,550 के पार पहुंच गया। निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही सूचकांक आज सार्वकालिक शीर्ष पर हैं।

अलबत्ता आर्थिक बेहतरी के इन सुनहरे संकेतों के बीच अब भी कुछ ऐसे चिंता बढ़ाने वाले तथ्य हैं जो ये दर्शाते हैं कि अर्थ जगत का अनर्थ अभी कुछ दिन और भारी पड़ेगा। सबसे बड़ी चिंता का सबब है बेलगाम बेरोजगारी। सुधार और प्रोत्साहन की कई घोषणाओं और पहल के बाद भी बेरोजगारी दर अगस्त में एक बार फिर से बढ़ गई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) की मासिक रिपोर्ट के मुताबिक देश में अगस्त में बेरोजगारी दर 8.32 फीसद रही। रोजगार से जुड़े दूसरे विश्लेषण और रिपोर्ट भी बार-बार आगाह कर रहे हैं कि अगर देश की कामकाजी आबादी के सामने काम नहीं होगा तो आंकड़ों में दिखने वाली बेहतरी का कोई मतलब नहीं होगा।

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