सोशल मीडिया विज्ञापनों से बढ़ता भेदभाव

सोशल मीडिया मंचों, खासकर फेसबुक ने आॅनलाइन विज्ञापनों के तौर तरीकों को बदल दिया है।

सांकेतिक फोटो।

सोशल मीडिया मंचों, खासकर फेसबुक ने आॅनलाइन विज्ञापनों के तौर तरीकों को बदल दिया है। इन मंचों पर विज्ञापनों से लिंग, जाति और उम्र आधारित भेदभाव बढ़ रहा है। भेदभाव के नए तरीकों और विपणन के ढंग ने भी नई चिंताओं को जन्म दिया है।आस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय और क्वींसलैंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुछ शोधार्थियों ने इस बारे में एक शोध परियोजना शुरू की है।

परियोजना आस्ट्रेलिया को लेकर शुरू की गई है और दुनिया भर के कुछ और स्थलों को भी इसका हिस्सा बनाया गया है। इस शोध परियोजना से यह पता लगाया जाएगा कि कैसे सोशल मीडिया मंच विज्ञापनों के माध्यम से आस्ट्रेलिया के उपयोगकर्ताओं तक पहुंचते हैं। इसका लक्ष्य आनलाइन विज्ञापन में सार्वजनिक पारदर्शिता की जरूरत के बारे में बातचीत को बढ़ावा देना है।

ताजा शोध ‘डार्क एड’ के खतरे की बात करती है। मास मीडिया के युग में विज्ञापन (अधिकांश भाग के लिए) सार्वजनिक थे। इसका मतलब था कि यह जांच के लिए भी खुले थे। जब विज्ञापनदाताओं ने अवैध या गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार किया, तो परिणाम सबके सामने थे। विज्ञापन का इतिहास गैर-जिम्मेदार व्यवहार से भरा हुआ है। हमने देखा है कि तंबाकू और अल्कोहल (शराब) कंपनियां महिलाओं, कम उम्र के लोगों और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को किस प्रकार से लक्षित करती हैं। हमने इनमें लैंगिक और नस्ल को निशाना बनाते देखा है। हाल में गलत सूचना का प्रसार एक प्रमुख चिंता का विषय बन गया है।

जब ये चीजें खुले तौर पर होती हैं तो नागरिक और मीडिया नियामक प्रतिवाद कर सकते हैं। दूसरी तरफ, आनलाइन विज्ञापन जो खास लोगों के लिए बनाए जाते है और उनके निजी उपकरणों पर साझा किए जाते है, उनकी जनता के प्रति जवाबदेही कम हुई है। ‘डार्क एड’ केवल लक्षित उपयोगकर्ता को दिखते हैं। उनका पता लगाना कठिन होता है, क्योंकि विज्ञापन कुछ ही समय तक दिखने के बाद गायब हो जाता है। साथ ही उपयोगकर्ता को यह नहीं पता होता है कि वे जिस विज्ञापन को देख रहे हैं क्या वे दूसरों को दिखाए जा रहे हैं।

इसके गंभीर परिणाम सामने आए हैं। विज्ञापनों के साथ उपयोगकर्ताओं को लक्षित करने के लिए फेसबुक द्वारा नियोजित स्वचालित प्रणालियों के साथ-साथ विज्ञापनदाताओं को प्रदान की जाने वाली सिफारिशों में पारदर्शिता में कमी पाई गई है। हाल में प्रकाशित रिपोर्ट में आस्ट्रेलिया के तीन चौथाई उपयोगकर्ताओं ने कहा है कि फेसबुक को अधिक पारदर्शी होना चाहिए। फेसबुक की आनलाइन विज्ञापन लाइब्रेरी अपने लक्षित विज्ञापन व्यवहारों में कुछ स्तर की दृश्यता प्रदान करती है, लेकिन यह व्यापक नहीं है।

शोधकर्ताओं मार्क आंद्रेजेविक, अब्दुल करीम ओबेद, डैनियल एंगस और जीन बर्गेस के मुताबिक, जनता की रूचि की आवश्यकता को शोध का हिस्सा बनाया गया है। पूर्व में अपनी असफलताओं के बावजूद फेसबुक जवाबदेही सुनिश्चित करने के बाहरी प्रयासों के प्रति शत्रुतापूर्ण भाव रखता रहा है। उदाहरण के लिए कंपनी ने हाल ही में न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं से अपने उस शोध को बंद करने की मांग की, जिसमें यह पता लगाया जा सकेगा कि कैसे फेसबुक पर राजनीतिक विज्ञापनों को लक्षित किया जाता है।

जब शोधकर्ताओं ने ऐसा करने से मना किया तो फेसबुक ने अपने मंच तक उनकी पहुंच बंद कर दी। हालांकि, संघीय व्यापार आयोग ने सार्वजनिक रूप से इस दावे को खारिज कर दिया और सार्वजनिक हित में अनुसंधान के लिए अपने समर्थन पर जोर दिया जिसका उद्देश्य ‘विशेष रूप से निगरानी आधारित विज्ञापन के आसपास अपारदर्शी व्यावसायिक चलन पर प्रकाश डालना’ है। सोशल मीडिया मंच को निश्चित तौर पर उनके विज्ञापन के तरीके के लिए सार्वभौमिक पारदर्शिता प्रदान करनी चाहिए।

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