क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) लागू होने के बाद ट्रेडिंग वॉल्यूम में गिरावट और इंडस्ट्री की आपत्तियों के बीच भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने पिछले हफ्ते संकेत दिया कि वह डेरिवेटिव्स सेगमेंट के सेटलमेंट के तरीके में बदलाव का प्रस्ताव ला सकता है।

मार्केट रेगुलेटर ने गुरुवार को अपनी प्रेस रिलीज़ में कहा, “उठाए गए मुद्दों में फीडबैक का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र CAS के जरिए तय क्लोजिंग प्राइस के आधार पर एक्सपायरी पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस तय करने से जुड़ा है।”

रेगुलेटर ने आगे कहा “डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस तय करने के तरीके में कुछ बदलाव का प्रस्ताव दे सकता है, जिसके लिए लगभग एक हफ्ते में एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया जाएगा।”

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क्या है समस्या की वजह?

CAS में ट्रेडिंग अभी दोपहर 3:30 PM पर खत्म होती है, जबकि डेरिवेटिव्स सेगमेंट में ट्रेडिंग 10 मिनट और चलती है। सेशन के खत्म होने के समय में यह अंतर ट्रेडिंग इंडस्ट्री के लिए चिंता के सबसे बड़े कारणों में से एक है।

इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर (जिनमें कॉर्पोरेट, विदेशी इन्वेस्टर, म्यूचुअल फंड और कॉम्प्लेक्स एल्गोरिदम वाले प्रोप्राइटरी ट्रेडर शामिल हैं) कुल मिलाकर डेरिवेटिव मार्केट में लगभग 60-65% टर्नओवर के लिए जिम्मेदार हैं।

डेरिवेटिव फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट होते हैं जो ट्रेडर को भविष्य में पहले से तय तारीख और कीमत पर किसी अंडरलाइंग सिक्योरिटी को खरीदने या बेचने की सुविधा देते हैं। ये इंस्टीट्यूशनल निवेशक, जिनके पास मार्केट में कई तरह के दांव होते हैं, डेरिवेटिव का इस्तेमाल या तो अपने दांव को हेज करने या आर्बिट्रेज के मौके ढूंढने के लिए करते हैं।

उदाहरण के लिए अगर किसी ट्रेडर के पास कैश मार्केट में किसी स्टॉक का बड़ा हिस्सा है, जो सुबह 9:15 AM से दोपहर 3:30 PM तक का रेगुलर ट्रेडिंग सेशन है, तो ट्रेडर अक्सर अपने रिस्क को हेज करने और कैपिटल को बचाने के लिए डेरिवेटिव मार्केट में स्टॉक बेच देगा, चाहे कीमत किसी भी तरफ जाए। इसका उल्टा भी हो सकता है जब ट्रेडर पहले डेरिवेटिव मार्केट में स्टॉक बेचता है और फिर उसे कैश मार्केट में खरीदता है।

पहले, जब कैश और डेरिवेटिव मार्केट एक ही समय पर खत्म होते थे, तो ट्रेडर्स को ऐसे हेज की प्लानिंग करते समय प्राइस विज़िबिलिटी और कम से कम अनिश्चितता होती थी। हालांकि, CAS और एक्सटेंडेड डेरिवेटिव सेशन के आने से, ट्रेडर्स सुरक्षित रूप से यह अनुमान नहीं लगा सकते कि CAS खत्म होने के बाद डेरिवेटिव मार्केट में क्या हो सकता है।

CAS के दौरान टाइम प्रेशर और लिमिटेड प्राइस विजिबिलिटी जैसे दूसरे मुद्दों ने भी इस समस्या को और बढ़ा दिया है, जिससे ज्यादातर इंस्टीट्यूशनल ट्रेडर्स रिस्क से बचने के लिए CAS और डेरिवेटिव दोनों सेगमेंट से बाहर रहते हैं।

यह रिस्क उन दिनों और भी ज्यादा होता है जब निफ्टी 50 और सेंसेक्स के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट एक्सपायर होते हैं। यह एक ऐसा समय होता है जब हर ट्रेडर पे-डे से पहले अपने प्रॉफिट को मैक्सिमाइज करने या अपने लॉस को मिनिमाइज करने की पूरी कोशिश कर रहा होता है।

जब बड़े प्लेयर्स CAS से बाहर रहते हैं, तो कम वॉल्यूम से हाई वोलैटिलिटी होती है, जिसमें कुछ बड़े ऑर्डर प्राइस को काफी हद तक बदल सकते हैं। CAS में यह वोलैटिलिटी, बदले में, डेरिवेटिव में वोलैटिलिटी की ओर ले जाती है, जो अंडरलाइंग सिक्योरिटीज की CAS डिटरमाइंड प्राइस से जुड़े होते हैं। इसलिए, बड़े प्लेयर्स अभी दोनों से बच रहे हैं।

डेटा भी यही दिखाता है। अगस्त में डेरिवेटिव्स सेगमेंट में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का टोटल टर्नओवर 34.48 लाख करोड़ रुपये था, जो नवंबर 2023 के बाद सबसे कम है।

आनंद राठी वेल्थ में म्यूचुअल फंड्स की हेड श्वेता रजनी ने कहा, “अगस्त में (NSE का) एवरेज डेली ऑप्शंस टर्नओवर भी महीने-दर-महीने 20% गिरा। इसलिए, 18-20% की गिरावट को CAS शुरू होने के बाद देखे गए ओवरऑल मार्केट-वॉल्यूम असर के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि खास तौर पर CAS विंडो के अंदर वॉल्यूम में गिरावट के माप के तौर पर।”

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क्या F&O और CAS को एक साथ करने से मदद मिलेगी?

मार्केट पार्टिसिपेंट्स चाहते हैं कि डेरिवेटिव्स और CAS सेशन के आखिर एक साथ हों, और डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट प्राइस CAS में सेटलमेंट प्राइस से अलग हों (खासकर एक्सपायरी के दिनों में)।

अगर रेगुलेटर ऐसा करता है, तो इससे रातों-रात सावधानी और CAS के प्रति ठंडे रिस्पॉन्स का हल नहीं निकलेगा। हालांकि, इससे ट्रेडर्स के मन में अनिश्चितता का एक बड़ा हिस्सा कम हो सकता है।

इंस्टीट्यूशनल ट्रेडर्स बिना सही हेज के ट्रेड करना पसंद नहीं करते हैं और दोनों सेशन का एक साथ बंद होना और CAS और डेरिवेटिव्स की कीमतों को अलग करना ऐसे ट्रेडर्स के लिए एक जरूरी हेजिंग का रास्ता दे सकता है, जिससे CAS में बहुत जरूरी लिक्विडिटी आएगी।

इससे बेहतर प्राइस डिस्कवरी होगी और CAS के दौरान वोलैटिलिटी कम होगी, जिससे डेरिवेटिव्स सेगमेंट ज्यादा स्टेबल हो जाएगा।

एक घरेलू ब्रोकिंग फर्म के डेरिवेटिव्स एनालिस्ट ने कहा, “ऐसा तरीका हेजिंग रिस्क को कम कर सकता है और कुछ अनिश्चितता को कम कर सकता है, लेकिन यह वॉल्यूम को प्री-CAS लेवल पर नॉर्मल करने के लिए अपने आप में काफी नहीं हो सकता है। लोगों और एल्गो को एडजस्ट करने और नई स्ट्रेटेजी बनाने के लिए और समय चाहिए होगा।”

एक्सपायरी के दिनों में, एक्सपर्ट्स का सुझाव है कि डेरिवेटिव्स सेटलमेंट की कीमतें पारंपरिक वॉल्यूम-वेटेड एवरेज प्राइस (VWAP) तरीके पर आधारित हो सकती हैं, जिसे CAS ने बदल दिया था।

रजनी के अनुसार, “इससे कीमतों में बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव की संभावना कम हो सकती है, जबकि अभी भी काफी प्राइस डिस्कवरी की अनुमति मिलती है।”

हालांकि SEBI ने अब तक VWAP सिस्टम को किसी भी रूप में वापस लाने की अपनी अनिच्छा का संकेत दिया है, लेकिन हमें और जानने के लिए इस हफ्ते रेगुलेटर के कंसल्टेशन पेपर का इंतजार करना होगा।

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