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जीएम सरसों को मंजूरी के ख़िलाफ़ किसानों ने दी आंदोलन की धमकी

अभी तक देश में सिर्फ कपास के ही जीन संवर्धित (जीएम) बीजों के व्यावसायिक इस्तेमाल को मंजूरी दी गई है।
Author नई दिल्ली | September 27, 2016 13:02 pm
सरसों के खेत में कार्यरत एक महिला। (रॉयटर्स फाइल फोटो)

देश के कई किसान संगठनों ने जीएम सरसों की खेती को मंजूरी देने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसके खिलाफ दो अक्तूबर, गांधी जयंती से आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी है। इन संगठनों ने सरकार से मांग की है कि जीएम सरसों पर जारी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर सार्वजनिक टिप्पणी के लिए अधिक समय दिया जाए और कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया जाए। भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के प्रवक्ता धर्मेन्द्र मलिक ने कहा, ‘हम जीएम सरसों समेत सभी प्रकार की जीएम फसलों का विरोध करते हैं। जीएम सरसों के विरोध में लखनऊ में दो अक्तूबर से किसान सत्याग्रह किया जाएगा।’ मलिक ने यह भी कहा कि जीएम सरसों पर जारी रिपोर्ट को लेकर सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिये कम से कम 120 दिन का समय दिया जाना चाहिए।

गौरतलब है कि केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली जीन संवर्धित अभियांत्रिकी मूल्यांकन समिति (जीईएसी) की एक उपसमिति ने जीएम सरसों पर अपनी रपट अगस्त में सरकार का सौंपी थी, जिसमें जीएम सरसों को अधिक पैदावार वाली और पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित फसल बताया गया है। जीईएसी ने इसे अपनी वेबसाइट पर डाला है और सभी संबंधित पक्षों से पांच अक्तूबर तक इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने को कहा है।

मजदूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक निखिल डे ने जीएम फसलों का विरोध करते हुए कहा, ‘सरकार का यह कदम प्रकृति को बदलने जैसा प्रयास है, जो मानव को पीढ़ियों तक नुकसान पहुंचाएगा। हम सख्ती से इसका विरोध करते हैं। सरकार ने जीएम सरसों वाली रपट पर सार्वजनिक टिप्पणी के लिए बहुत कम समय रखा है। इसके लिए कम से कम 120 दिन तक का समय देना चाहिए।’

मलिक को आशंका है कि जीएम सरसों की खेती को मंजूरी दी जाती है, तो सरसों की खेती वाले क्षेत्रों में शहद का कारोबार बुरी तरह प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि अकेले उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर इलाके से सालाना करोड़ों रुपए का शहद निर्यात होता है पर जीएम सरसों आने के बाद उनपर मधुमक्खियां कम आएंगी। मलिक ने कहा कि जीईएसी के वैज्ञानिकों ने अपनी रपट में जीएम सरसों की इस किस्म पर खरपतवार नाशक का असर नहीं पड़ने की बात कही है। यानी यह फसल ‘हर्बीसाइड टालरेंट’ होगी। उन्होंने कहा इसका एक खतरा यह है कि किसान ज्यादा मात्रा में रसायनों का प्रयोग करने लगेंगे, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।

भारतीय कृषक समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णवीर चौधरी ने कहा, ‘हम खेती की उन्नति से जुड़ी तकनीकी के पक्ष में हैं, लेकिन वह तकनीक किसानों और देश के लिए फायदेमंद होनी चाहिए। जीएम सरसों के साथ ऐसा नहीं है। इसकी उत्पादकता करीब 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि देशी सरसों प्रति हेक्टेयर में 30 से 32 क्विंटल की पैदावार देती है। इसके इसके साथ ही इसकी उत्पादन लागत भी अधिक है। ऐसे में जीएम सरसों की मंजूरी किसानों के लिए नुकसानदायक है।’ उन्होंने भी जीएम सरसों के ‘हर्बीसाइड टालरेंट’ होने के बारे में चिंता जताई। उन्होंने कहा, ‘जीएम सरसों के ‘हर्बीसाइड टालरेंट’ होने से खेत की उर्वरता बुरी तरह प्रभावित होगी। साथ ही अधिक मात्रा में रसायनों के प्रयोग से फसलों की गुणवत्ता भी उच्चकोटि की नहीं रहेगी। ऐसे में जीएम सरसों की मंजूरी कुछ समय बाद किसानों के लिए बहुत महंगी साबित होगी। बीटी कपास में हम पहले ही ऐसा होते हुए देख चुके हैं।’

मलिक ने कहा कपास में भी जीएम खेती की मंजूरी दी गई थी। पिछले साल पंजाब के किसानों ने काफी मात्रा में इसकी पैदावार की, लेकिन उसके पौधे कुछ निश्चित लंबाई के बाद बढ़ना बंद कर देते हैं और ज्यादा पैदावार नहीं हो पाती। पिछले साल के अनुभवों के बाद इस साल पंजाब के किसानों ने गैर-जीएम कपास की बुवाई ही की है। निखिल डे ने जीएम सरसों का परीक्षण करने वाली एजेंसी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पहले तो दिल्ली विश्वविद्यालय के जैव वैज्ञानिकों को यह काम दिया गया था, लेकिन अब इसका परीक्षण दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त एक निजी एजेंसी कर रही है, जिसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है।

उल्लेखनीय है कि अभी तक देश में सिर्फ कपास के ही जीन संवर्धित (जीएम) बीजों के व्यावसायिक इस्तेमाल को मंजूरी दी गई है। यदि सरसों में भी जीएम बीज के इस्तेमाल की मंजूरी मिलती है, तो यह देश में जीएम की पहली खाद्य फसल होगी। जीएम खाद्य उत्पादों के तहत बीटी बैगन को उगाने की अनुमति 2010 में दी गई थी, लेकिन विरोध के कारण तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस पर रोक लगा दी थी। उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह जाने माने सामाजिक कार्यकर्ताओं अरुणा रॉय, मेधा पाटकर और प्रशांत भूषण ने भी केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे को पत्र लिखकर जीएम सरसों को मंजूरी नहीं देने का अनुरोध किया है।

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