टेलीकॉम कंपनियों भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया (Vi) को बड़ी राहत मिली है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से लगाए गए वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC) के दावों को खारिज कर दिया है।

इस फैसले से दोनों कंपनियों पर बकाया 24,000 करोड़ रुपये से अधिक की पुरानी देनदारी खत्म हो गई। कोर्ट ने इस विवादित मांग के आधार पर सरकार द्वारा की गई सभी कार्रवाईयों को भी रद्द कर दिया, जिससे उन पर वित्तीय दबाव काफी कम हो जाएगा।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि याचिकाकर्ता (टेलीकॉम कंपनियां) विवादित फैसलों और उसके बाद जारी डिमांड नोटिस को रद्द करने के पक्ष में अपना मामला साबित करने में सफल रहे हैं। प्रतिवादी (केंद्र सरकार) इन फैसलों और याचिकाकर्ताओं पर पुराने समय से लागू होने वाला वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज लगाने की अपनी कार्रवाई को सही साबित नहीं कर पाया है।”

हालांकि, OTSC को लेकर व्यापक कानूनी लड़ाई अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। आइए जानते हैं इसके बारे में…

कैसे होता है भारत में एयरवेव्स (तरंगों) का मैनेजमेंट?

फोन जैसे डिवाइस को कनेक्ट होने के लिए सिग्नल की जरूरत होती है। ये सिग्नल एयरवेव्स के जरिए भेजे जाते हैं, जिन्हें इंटरफेरेंस (रुकावट) से बचने के लिए तय फ्रीक्वेंसी पर भेजा जाना चाहिए।

देश में मौजूद सभी सार्वजनिक संपत्तियों का मालिकाना हक केंद्र सरकार के पास है, जिसमें एयरवेव्स भी शामिल हैं। इन एयरवेव्स को स्पेक्ट्रम कहा जाता है, जिसे अलग-अलग फ्रीक्वेंसी वाले बैंड में बांटा गया है। प्राइवेट कंपनियों को एयरवेव्स बेचने के लिए, संचार मंत्रालय के तहत टेलीकॉम विभाग (DoT) नियमित रूप से नीलामी करता है।

मौजूदा विवाद की जड़ें 1990 के दशक के टेलीकॉम लाइसेंसिंग सिस्टम में हैं। 1994 की नेशनल टेलीकॉम पॉलिसी (NTP) के तहत, एयरटेल और आइडिया सेल्युलर जैसी प्राइवेट कंपनियों को मोबाइल सेवाएं देने के लिए लाइसेंस दिए गए थे। इसके लिए उन्हें एक तय लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल के लिए अलग से चार्ज देना होता था।

हालांकि, 1999 में इस पॉलिसी में बड़ा बदलाव किया गया क्योंकि सरकार ने पाया कि ओरिजिनल फ्रेमवर्क इस सेक्टर में उम्मीद के मुताबिक ग्रोथ लाने में नाकाम रहा था। NTP-99 के तहत, कंपनियों को रेवेन्यू-शेयरिंग मॉडल अपनाने की इजाजत दी गई। इस मॉडल में लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम से जुड़े पेमेंट को तय सालाना चार्ज के बजाय उनके रेवेन्यू के एक हिस्से से जोड़ा गया।

पॉलिसी में बदलाव

अगले कुछ सालों में, सरकार और टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (TRAI) ने अतिरिक्त स्पेक्ट्रम के आवंटन से जुड़े कई बदलाव किए।

जिन ऑपरेटर्स को शुरुआती आवंटन से ज़्यादा बैंडविड्थ मिली थी, उन्हें ज़्यादा रेवेन्यू-शेयर-बेस्ड स्पेक्ट्रम चार्ज देने थे। इंडस्ट्री बॉडीज़ ने इस फ़्रेमवर्क को मान लिया और कई कानूनी चुनौतियां वापस ले लीं, जबकि बाद के पॉलिसी डॉक्यूमेंट्स और कमिटी की रिपोर्ट्स में एक बार में लिए जाने वाले शुल्क (अपफ्रंट लेवी) के बजाय बार-बार लिए जाने वाले स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज का ज्यादा समर्थन किया गया।

बहस 2008 में तब बदली, जब DoT ने 6.2 MHz से ज्यादा स्पेक्ट्रम होल्डिंग्स पर एक बार का शुल्क लगाने के विचार पर काम करना शुरू किया। DoT में तत्कालीन एडिशनल सेक्रेटरी सुबोध कुमार की अध्यक्षता वाली एक कमिटी ने अतिरिक्त स्पेक्ट्रम के लिए अपफ्रंट पेमेंट मैकेनिज्म की सिफारिश की, और 2010 में TRAI ने औपचारिक रूप से थ्रेशोल्ड से ऊपर की होल्डिंग्स के लिए एक बार के स्पेक्ट्रम शुल्क की सिफारिश की।

2G स्पेक्ट्रम मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2012 के फैसले के बाद इस कदम को और तेज़ी मिली, क्योंकि इस फैसले ने स्पेक्ट्रम आवंटन और प्राइसिंग की जांच को और कड़ा कर दिया था।

नवंबर 2012 में, यूनियन कैबिनेट ने मौजूदा ऑपरेटर्स पर एक बार का स्पेक्ट्रम शुल्क लगाने को मंज़ूरी दी, जिसमें जुलाई 2008 से 6.2 MHz से ज़्यादा स्पेक्ट्रम रखने पर रेट्रोस्पेक्टिव (पिछली तारीख से लागू होने वाले) शुल्क भी शामिल थे। इसके बाद DoT ने एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जैसे ऑपरेटर्स को डिमांड नोटिस भेजे, जिसके चलते वे जनवरी 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट गए।

कोर्ट ने सख्त कार्रवाई के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा दी और इस हफ़्ते फैसला आने से पहले यह मामला एक दशक से ज्यादा समय तक पेंडिंग रहा।

एयरटेल और वोडाफोन आइडिया के लिए क्या है फैसले का मतलब

उम्मीद है कि यह फैसला एयरटेल और वोडाफोन आइडिया दोनों की फाइनेंशियल स्थिति में काफी सुधार करेगा, क्योंकि इससे एक बड़ी संभावित देनदारी (कंटिंजेंट लायबिलिटी) खत्म हो जाएगी जो एक दशक से ज़्यादा समय से अनसुलझी थी। कोर्ट ने एयरसेल मामले में मद्रास हाई कोर्ट के 2016 के फैसले से भी असहमति जताई है, जिसमें इसी तरह के शुल्क को सही ठहराया गया था।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार टेलीकॉम लाइसेंस की फाइनेंशियल शर्तों को रेट्रोस्पेक्टिव रूप से नहीं बदल सकती और स्पेक्ट्रम आवंटित होने के कई साल बाद नई देनदारियां नहीं थोप सकती। यह फैसला असल में केंद्र के 2012 के फैसले को रद्द करता है।

एयरटेल ने 2023 में स्टॉक एक्सचेंज को बताया था कि उस पर कुल 15178 करोड़ रुपये की देनदारी है। इसमें से उसने 8500 करोड़ रुपये चुका दिए थे, जबकि बाकी 6600 करोड़ रुपये को ‘कंटिंजेंट लायबिलिटी’ (ऐसी देनदारी जो किसी घटना के होने पर ही चुकानी पड़ सकती है) के तौर पर दिखाया गया था।

वहीं, वोडाफोन आइडिया ने OTSC से जुड़ी लगभग 7000 करोड़ रुपये की देनदारी की जानकारी दी थी, जिसमें पुरानी कंपनी ‘आइडिया सेल्युलर’ से जुड़ी 3322 करोड़ रुपये की रकम भी शामिल थी।

इंडस्ट्री के जानकारों का अनुमान है कि इस फैसले से दोनों टेलीकॉम कंपनियों को कुल मिलाकर 24000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की राहत मिल सकती है, क्योंकि इससे उनकी बुक्स (हिसाब-किताब) से देनदारी और उससे जुड़ी अनिश्चितता खत्म हो जाएगी।

वोडाफोन आइडिया के लिए यह राहत खास तौर पर अहम है, क्योंकि कंपनी की आर्थिक स्थिति अभी तंग है और वह नया फंड जुटाने और अपना नेटवर्क बढ़ाने की कोशिश कर रही है। संभावित देनदारियों में किसी भी तरह की कमी से उसके फाइनेंशियल मेट्रिक्स (आर्थिक आंकड़े) बेहतर हो सकते हैं और इससे लेंडर्स (कर्ज देने वालों), इन्वेस्टर्स और इक्विपमेंट सप्लायर्स का भरोसा बढ़ सकता है।

आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत होने के बावजूद, एयरटेल को भी इस फैसले से फायदा होगा क्योंकि उसकी ‘कंटिंजेंट लायबिलिटी’ कम होगी और भविष्य की देनदारियों के बारे में स्थिति साफ होगी। कंपनी का हमेशा से यह कहना रहा है कि पिछली तारीख से लागू किए गए इस शुल्क (लेवी) के लिए कोई कॉन्ट्रैक्ट वाला आधार नहीं था और इस फैसले से उसकी बुक्स से लंबे समय से चली आ रही रेगुलेटरी अनिश्चितता खत्म हो गई है।

यह फैसला टेलीकॉम सेक्टर के प्रति इन्वेस्टर्स की सोच को भी बेहतर बना सकता है। इससे यह सिद्धांत और मजबूत होगा कि ऑपरेटर्स पर लगाई जाने वाली आर्थिक देनदारियां लाइसेंस की शर्तों और तय पॉलिसी पर आधारित होनी चाहिए।

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पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी गई है। सरकारी तेल कंपनियों ने मई 2026 में तीसरी बार ईंधन के दाम बढ़ाए हैं। दिल्ली में पेट्रोल 87 पैसे महंगा होकर 99.51 रुपये प्रति लीटर और डीजल 91 पैसे बढ़कर 92.49 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गया है।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए यह फैसला लिया गया है। यहां पढ़ें पूरी खबर…