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अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर एक और बुरी खबर, ग्रामीण क्षेत्र में घटी खपत, आंकड़े दे रहे संकेत- और बुरे हो सकते हैं हालात

तमाम संकेत बता रहे हैं कि गांवों में इनकम कम होने से तमाम वस्तुओं की डिमांड घट गई है। गोल्ड, ट्रैक्टर, बाइक और FMCG की खपत काफी कम हो चुकी है। ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था की हालत अभी और पतली हो सकती है।

इस तस्वीर का इस्तेमाल सांकेतिक रूप में किया गया है। (फोटो सोर्स: द इंडियन एक्सप्रेस)

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर फिलहाल भारत की स्थिति सुधरते नहीं दिखाई दे रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तरह से वस्तुओं की मांग घट रही है, उसके मद्देनजर हालात और भी ख़राब हो सकते हैं। वहीं, शुक्रवार को सरकार ने खपत के संबंध में कई सारे उतार-चढ़ाव एंव परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देकर 2017-18 के घरेलू खपत से जुड़े सर्वे को सार्वजनिक होने से रोक दिया था। लेकिन, तमाम संकेत बता रहे हैं कि वित्त वर्ष 2019-20 की शुरुआत से ही ग्रामीण क्षेत्रों में मांग की स्थिति बद्तर होती गई है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने देश के प्रमुख कंपनियों का संचालन करने वाले लोगों से बात की ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग के संबंध तमाम संकेतों का पता लगाया जा सके। इस दौरान पता चला कि देश के ग्रामीण इलाकों में FMCG, ट्रैक्टर, दोपहिया वाहन की डिमांग नहीं बन पा रही है। इसके अलावा दूसरे संकेतों में सोने की मांग में कमी आना भी है। चूंकि, सोने की मांग का आधा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में है। ऐसी स्थिति में इस सेक्टर की भी हालत ठीक नहीं है।

गांवों में अर्थव्यवस्था की पतली हालत के लिए श्रम की मजदूरी में सिर्फ मामूली गिरावट ही नही है। बल्कि मजदूरों के लिए सीपीआई बढ़ने के साथ ही मार्च के बाद से वास्तविक मजदूरी में भी गिरावट देखी गई है। CPI-RL (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स-रूरल लेबर) के लिहाज से वास्तविक वेतन वृद्धि की दर में अगस्त माह के दौरान सबसे तेज गिरावट देखी गई। CPI-RL की 6.23% दर के साथ भले ही मजदूरी में 3.4% का इजाफा दर्ज हुआ। लेकिन असल मजदूरी 2.83 फीसदी तक घट गई।

कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कुछ बड़े राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में देर से आए ज्यादा मॉनसून ने खेती की आय में कमी कर डाली। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में डिमांड में कमी का इसे भी एक आधार माना जा रहा है। एक पब्लिक फाइनैंस के साथ जुड़े अर्थशास्त्री ने बताया, “कुछ सालों से निवेश में कमी के चलते रोजगार सृजन भी नहीं हो पाया है। ऐसी स्थिति में इनकम भी कम हुआ है। गांव से शहरों की ओर पलायन करने वालों को भी कोई खास अवसर नहीं मिल पाए। लिहाजा, काफी संख्या में लोग गांव में ही रुके रहे। जबकि, दूसरी तरफ नोटबंदी के बाद खेती के कामों में भी कम ही अवसर मिल पाए हैं।”

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