Economic Survey 2025-26 : आर्थिक सर्वेक्षण ने मौजूदा साल यानी 2026 का ऐसा खाका पेश किया है, जो उम्मीद जगाने के साथ ही साथ आने वाले समय के खतरों से आगाह भी करता है। इसमें भारत जहां अपनी मजबूत आर्थिक नींव के दम पर मजबूती से खड़ा है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय उठापटक और फाइनेंशियल मार्केट्स में अस्थिरता की चर्चा भी की गई है। आसान शब्दों में कहें तो आर्थिक सर्वेक्षण ने बताया है कि साल 2026 के दौरान दुनिया को मुख्य तौर पर तीन तरह के हालात या ‘सिनैरियो’ का सामना करना पड़ सकता है। इनमें पहला सिनैरियो भविष्य की सबसे बेहतर संभावना की ओर इशारा करता है, जबकि दूसरे और तीसरे अनुमान में हालात मुश्किल से और मुश्किल होने की प्रोबेबिलिटी बताई गई है। सर्वेक्षण के मुताबिक आने वाले समय में विकास के साथ ही साथ खुद को बाहरी झटकों से बचाने की तैयारी पर फोकस करना भी जरूरी है।

2026 का पहला अनुमान यानी सबसे बेहतर हालात

आर्थिक सर्वेक्षण ने 2026 के अंतरराष्ट्रीय हालात को समझने के लिए जो पहला अनुमान जाहिर किया है, वह सबसे बेहतर स्थिति (The best-case scenario) की ओर इशारा करता है। इस पहली स्थिति को ‘मैनेज्ड डिसऑर्डर’ या व्यवस्थित अव्यवस्था कहा जा सकता है। इसमें दुनिया वैसे ही चलती रहेगी जैसे 2025 में चल रही थी (Business as in 2025), लेकिन सुरक्षा की ढाल पहले से कमजोर हो जाएगी। छोटी-छोटी आर्थिक घटनाएं भी बड़े संकट का रूप ले सकती हैं। सर्वे के मुताबिक 2026 में ऐसी स्थिति सामने आने के आसार 40 से 45 प्रतिशत के बीच हैं।

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2026 के हालात पर क्या है दूसरा अनुमान 

आर्थिक सर्वेक्षण ने 2026 के लिए जो दूसरा अनुमान जाहिर किया है, उसमें हालात और गंभीर होने के आसार हैं। इसमें कहा गया है कि इस साल के दौरान दुनिया के बड़े देशों के बीच खींचतान इतनी बढ़ सकती है कि व्यापार और सुरक्षा के नियम पूरी तरह बदल जाएं। इसमें रूस-यूक्रेन जैसे विवाद और गहरे हो सकते हैं। हालात ऐसे हो सकते हैं कि तमाम देश एक-दूसरे पर आर्थिक पाबंदियां लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। सर्वे के अनुसार इस दूसरी स्थिति की आशंका (subjective probability) भी उतनी ही यानी 40 से 45 प्रतिशत ही है।

तीसरे अनुमान में AI से जुड़े रिस्क की चेतावनी

इकनॉमिक सर्वे का 2026 के लिए तीसरा अनुमान सबसे मुश्किल हालात की संभावित तस्वीर पेश करता है। सर्वे में इस तीसरी स्थिति को आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस यानी AI से जुड़ा ‘सिस्टमैटिक शॉक’ (systemic shock) कहा गया है। सर्वे में बताया गया है कि पिछले कुछ समय में एआई पर दुनिया भर में बेतहाशा पैसा निवेश किया गया है। बड़ी टेक कंपनियों ने डेटा सेंटर्स बनाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है और इसमें से बहुत सा पैसा कर्ज के तौर पर लिया गया है। 

सर्वे के अनुसार अगर एआई पर लगाया गया यह दांव उम्मीद के मुताबिक कामयाब नहीं रहा, तो यह दुनिया भर के बाजारों में भारी गिरावट की वजह बन सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह संकट 2008 की अंतरराष्ट्रीय मंदी से भी बड़ा हो सकता है। सर्वे में कहा गया है कि सोने की कीमतों में आई जबरदस्त तेजी भी इसी तरफ इशारा कर रही है कि निवेशक डरे हुए हैं और सुरक्षित निवेश की तलाश में हैं। सर्वेक्षण में इस सबसे खराब आशंका के सच साबित होने की संभावना (residual probability) 10 से 20 फीसदी बताई गई है।

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चुनौतियों के बीच कहां है भारत

सर्वे में कहा गया है कि इन तमाम अंतरराष्ट्रीय खतरों के बावजूद भारत के लिए राहत की बात यह है कि हमारी स्थिति दुनिया के दूसरे कई देशों से बेहतर है। भारत के पास एक बहुत बड़ा घरेलू बाजार है और हमारा विदेशी मुद्रा भंडार काफी मजबूत है। ये चीजें हमें बाहरी झटकों से बचाने में एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती हैं। हालांकि सर्वे इसके साथ ही यह चेतावनी भी देता है कि हम हालात से पूरी तरह अछूते नहीं रह सकते। अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ता है, तो भारत में आने वाले विदेशी निवेश में कमी आ सकती है और इसका सीधा असर हमारे रुपये की वैल्यू पर भी पड़ सकता है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश के लोगों की आय जैसे-जैसे बढ़ेगी, हमारी इंपोर्ट की जरूरतें भी बढ़ेंगी। इन्हें पूरा करने के लिए हमें अपनी एक्सपोर्ट इनकम बढ़ाने पर पूरा ध्यान देना होगा।

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आगे की राह : मैराथन और स्प्रिंट की मिसाल

भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए आर्थिक सर्वेक्षण ने एक बहुत ही दिलचस्प सलाह दी है। इसमें कहा गया है कि भारत को मौजूदा हालात में विकास की राह पर ऐसी दौड़ लगानी होगी जो मैराथन भी हो और स्प्रिंट भी। इसका मतलब यह है कि हमें लंबी अवधि के विकास के लक्ष्य को भी हासिल करना है और साथ ही अचानक आने वाले संकटों से निपटने के लिए बिजली जैसी फुर्ती भी दिखानी होगी। आने वाले समय में हमारी सरकारी नीतियों की साख और प्रशासनिक अनुशासन ही हमारी असली ताकत बनेंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन हालात से हमें डरने की जरूरत नहीं है, बल्कि ‘रणनीतिक गंभीरता’ के साथ अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करना होगा। साथ विदेशी मुद्रा कमाने के नए रास्ते भी तलाशने होंगे ताकि दुनिया के किसी भी कोने से उठने वाला आर्थिक तूफान भारत की रफ्तार को रोक न सके।