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टैक्‍स बचाने की जल्‍दबाजी में अक्‍सर ये आम गलतियां कर जाते हैं लोग, पड़ती हैं भारी

टैक्स प्लानिंग, बीमा और निवेश ऐसे मामले हैं जिन पर आपको पूरे साल ध्यान देना चाहिए। इन्हे आप साल के अंत में कुछ मिनटों में निपटाने की कोशिश ना करें, क्यूंकि ऐसा करने से कई गंभीर आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप में किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

टैक्स प्लानिंग, बीमा और निवेश ऐसे मामले हैं जिन पर आपको पूरे साल ध्यान देना चाहिए। इन्हे आप साल के अंत में कुछ मिनटों में निपटाने की कोशिश ना करें, क्यूंकि ऐसा करने से कई गंभीर आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। अगले वित्तीय वर्ष की टैक्स प्लानिंग इसी अप्रैल से शुरू करें। ज़रूरत पड़ने पर किसी निवेश सलाहकार से बात करें और एक ऐसा प्लान बनाएं जिससे आपकी टैक्स बचत बढे, पर्याप्त बीमा हो, ज़रूरत पड़ने पर चलनिधि हो, और आपको साल के अंत में आर्थिक तनाव न झेलना पड़े। टैक्स बचाने के लिए हम अपने योग्य निवेश और बीमा करा सकते हैं। लेकिन ऐसा करने में हम कुछ गलतियां कर बैठते हैं। चलिए देखते हैं वह गलतियां क्या हैं, ताकि उनसे बच सकें-

बिना कवरेज का आकलन किये जीवन बीमा खरीद लेना
कई भारतीय टैक्स बचाने के लिए जीवन बीमा खरीदते हैं। बीमे का प्रीमियम इनकम टैक्स एक्ट, सेक्शन 80C के तहत टैक्स बचाता है। काफी लोग जीवन बीमा को अपनी आर्थिक समस्याओं का रामबाण इलाज समझते हैं। वे बिमा खरीदते हैं टैक्स बचाने के लिए और निवेश के लिए भी। पर जीवन बीमा की प्राथमिक लक्ष्य है आपकी मृत्यु में आपकी आय की प्रतिस्थापन करना, ताकि आपके परिवार पर कोई आर्थिक मुसीबत न आये। इसी लिए जब आप जीवन बीमा खरीदें, चेक करें की आपकी सुनिश्चित राशि (सम अश्योर्ड) आपके परिवार के लिए पर्याप्त है या नहीं। कोशिश करें कि राशि आपकी वर्तमान वार्षिक आय से 10-20 गुना ज़्यादा हो। मान लीजिये आपकी आय 5 लाख रुपये हैं तो सुनिश्चित राशि 50 लाख से 1 करोड़ तय करें, ताकि आपके बाद आपके परिवार को सालों कोई दिक्कत न आये।

बिना लक्ष्य के निवेश करना
कोई भी निवेश किसी विशिष्ट कारण के लिए ही करें। निवेश का लक्ष्य होना जरूरी है, भले ही वह निवेश टैक्स बचत के लिए किया जा रहा हो। आपका लक्ष्य पहले आता है। टैक्स बचत सिर्फ एक अतिरिक्त लाभ है। आपको कोई भी निवेश सिर्फ टैक्स बचाने के लिए नहीं करना चाहिए। ऐसा किया तो बाद में आर्थिक दिक्कतें आ सकती हैं। अगर आप निवेश का स्पष्ट लक्ष्य बना कर चलें, आपको पता होगा की निवेश से कितना फायदा होगा, कब आप उसे लिक्विडेट कर सकते हैं और निवेश की अवधि कितनी लम्बी हैं।

लम्बे लॉक-इन वाला निवेश कर पछताना
जब आप हड़बड़ी में निवेश करेंगे, हो सकता है आप निवेश का लॉक-इन चेक करना भूल जाएं। टैक्स बचाने वाले हर निवेश में एक लॉक-इन अवधि होती है। लॉक-इन में आप अपना पूरा निवेषित पैसा नहीं निकाल पाएंगे। PPF की लॉक-इन अवधि 15 साल होती है। NSC की 5 साल। ELSS में 3। ज़्यादातर जीवन बीमा पॉलिसियों में कम से कम 3-5 साल पैसा अटकाना पड़ता है। सुनिश्चित करें की आपके निवेश की अवधि आपके लिए आरामदायक है। ऐसा न हो की कुछ समय बाद आप उस निवेश को किसी कारणवश तोडना चाहें। समयपूर्व निवेश तोड़ने से भारी नुक्सान हो सकता है।

निवेश का प्रतिफ़ल न समझना
निवेश के फायदे की समझ ना होना आपकी सबसे बड़ी आर्थिक गलती हो सकती है। टैक्स बचाने की हड़बड़ी में निवेश के प्रतिफ़ल को समझना ना भूलें। PPF में आज सालाना 8% ब्याज़ मिलता है जो की पूरी तरह टैक्स-मुक्त है। अतः अगर आप कोई दूसरा निवेश प्लान चुनें, सुनिश्चित करें की आपका कम से कम 8% मुनाफा हो। ऐसा निवेश न करें जो आपसे 10- 20 साल पैसे ऐंठे पर आपका सालाना 4% मुनाफा भी न हो। ऐसा निवेश आपके आर्थिक स्वास्थ के लिए हानिकारक है। कोई भी निवेश खरीदें, यह ज़रूर समझ लें की हर साल आपको कितना मुनाफा मिलेगा। अगर टैक्स के बाद का मुनाफा 8% से कम है तो PPF ही क्यों न लें?

सिर्फ टैक्स बचाने के लिए बीमा कराना
भारत में बीमे पॉलिसियों का दृढ़ता अनुपात (पर्सिस्टंसी रेश्यो) बहुत खराब है। बीमा एक दीर्घकालिक प्रतिबद्धता है। एक बार अच्छी तरह से सोच समझ कर खरीदें और लम्बी आयु तक उसका फायदा उठाएं। अगर आप बार बार पुराना बीमा रद्द कर नया खरीदेंगे तो आपके आर्थिक स्वास्थ के लिए नुक्सानदायक होगा। भारत में कई लोग सिर्फ टैक्स बचाने के लिए बीमा खरीदते हैं। टैक्स बचाने के बाद पालिसी रद्द कर देते हैं। समयपूर्व बीमा तोड़ने से काफी नुक्सान होता है, और जो टैक्स बचाया उसे वापिस भी चुकाना पड़ सकता है। बीमा तोड़ना आपके लिए जोखिम से भरा है क्यूंकि बिना बीमे के आपके परिवार का आर्थिक नुक्सान हो सकता है।

जल्दबाजी में फॉर्म भरना
यह गलती बहुत भारी पड़ सकती है। कोई भी निवेश या बीमा फॉर्म हड़बड़ी में ना भरें। पूरा समय लें, फॉर्म ध्यान से पढ़ें, और पूरे और सही ढंग से भरें। स्वास्थ्य-संबंधित कोई भी गलत बात फॉर्म में ना लिखें। कुछ लापरवाह एजेंट आपसे खाली फॉर्म पर साइन करवा लेंगे, और फिर बाकी डिटेल मन-मर्ज़ी भर देंगे। उदाहरण के लिये मान लें की आपका एजेंट यह नहीं जानता है की आपकी 10 साल पहले सर्जरी हुई थी, और इसका ज़िक्र आपके फॉर्म पर नहीं हुआ। अगर आगे चल कर बीमा कंपनी ने कोई जाँच पड़ताल करवाई, तो आपका क्लेम खारिज हो सकता है जिसके कारण आप पर कई दिक्कतें आ सकती हैं।

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