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इस मोर्चे पर फेल हो गया केंद्र सरकार का ‘मेक इन इंडिया’ अभियान! इंपोर्ट में जुटी देसी कंपनियां

केंद्र सरकार के मेक इन इंडिया अभियान मेडिकल डिवाइस बनाने के मोर्चे पर असफल दिखाई दे रहा है। इस बाद का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि घरेलू मैन्यूफैक्चर्स मेडिकल उपकरणों का आयात करने को मजबूर हैं।

Author नई दिल्ली | July 20, 2019 3:14 PM
Make in India, medical devices, imports, medical devices manufacturing hubs, Union Government, closing down their units, become importer, traders of medical devices, business news, business news in hindi, india news, Hindi news, news in Hindi, latest news, today news in Hindi देश में अधिकतर घरेलू मेडिकल उपकरण बनाने वाले अपनी यूनिटें बंद कर रहे हैं। (फाइल फोटो)

केंद्र सरकार का मेक इन इंडिया मेडिकल डिवाइस सेक्टर में पूरी तरह से अप्रभावी नजर आ रहा है। स्थिति यह है कि देश में मेडिकल डिवाइस का विनिर्माण करने वाले व्यापारी व कंपनियां अपनी यूनिटें बंद करने को मजबूर है। ये लोग अब मेडिकल डिवाइस मैन्यूफैक्चर करने की बजाय इंपोर्ट और उसकी ट्रेडिंग के काम में लग गए हैं।

मेडिकल डिवाइस सेक्टर से जुड़े लोग इसके लिए पूरी तरह से सरकार की असफल नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। मालूम हो कि सरकार ने मेक इन इंडिया के तहत देश को दुनिया के शीर्ष 5 मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की पहल की थी। केंद्र सरकार ने इसके लिए व्यापक स्तर पर मेडिकल डिवाइस का मैन्युफैक्चर करने और उनका निर्यात को बढ़ावा देने की पहल की थी।

बिजनेस टुडे की खबर के अनुसार साल 2018-19 में मेडिकल डिवाइस के आयात में 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। देश में 38,837 करोड़ रुपये के मेडिकल डिवाइस आयात किए गए। साल 2017-18 में मेडिकल डिवाइस का आयात 31,386 करोड़ रुपये था। इससे पहले साल 2016-17 में यह 28,067 करोड़ और 2015-16 में यह 26,203 करोड़ रुपये था।

पिछले 5 साल में देश में मेडिकल डिवाइस का बाजार सालाना 10-12 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। भारत के मेडिकल डिवाइस के मार्केट पर मल्टीनेशनल कंपनियों का दबदबा है। इनमें जीई, जॉनसन एंड जॉनसन, फिलीप्स, विप्रो, एबॉट, सिमंस, बैक्सटर जैसी कंपनियां शामिल हैं।

इस उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत में बड़ा बाजार होने के बावजूद अभी तक कोई सही नियामक संस्था नहीं है। वैश्विक नियमों और वैश्विक गुणवत्ता के मानकों के साथ ही उद्योग की मांग है कि उनके लिए एक नियामक संस्था हो। इसे सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड रेगुलेटर कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन द्वारा रेगुलेट किया जाए। इसके अलावा मेडिकल उपकरणों की कीमतों को लेकर भी एक नियम बनाने की मांग है। साल 2016 में सरकार ने मेडिकल डिवाइस पॉलिसी के लिए एक टास्क फोर्स गठित किया था।

भारत में करीब 75 फीसदी मेडिकल डिवाइस इन्हीं कंपनियों के बेचे जाते हैं। देश में केवल चार ही कंपनियां ऐसी हैं जिनका सालाना राजस्व 500 करोड़ रुपये से अधिक हैं। ये कंपनियां ट्रिविट्रॉन, ट्रांसएशिया बायोमेडिकल्स, हिंदुस्तान सीरिंज्स एंड मेडिकल डिवाइस और पोलीमेडिक्यूर हैं।

भारत का घरेलू मेडिकल डिवाइस बाजार अनुमानित 900-1000 करोड़ रुपये का है। यहां सिर्फ 15 ही कंपनियां ऐसी हैं जिनका टर्नओवर 200 करोड़ रुपये से अधिक है। देश में 80 फीसदी से अधिक घरेलू मैन्यूफैक्चर्स स्मॉल सेक्टर्स के हैं। इनका टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से कम का है।

 

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