ग्लोबल ऑयल मार्केट में गुरुवार को तेज उछाल देखने को मिला, जहां कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें 2022 के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गईं। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच Strait of Hormuz पर नाकेबंदी से आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ी है। इसके चलते ब्रेंट क्रूड करीब 7% चढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया। इस तेजी का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर पड़ सकता है…
कच्चे तेल की कीमत में तेज उछाल
आज गुरुवार को कच्चे तेल की कीमत में तेज उछाल देखने को मिल रहा है।
– ब्रेंट क्रूड जून डिलीवरी के लिए 7% बढ़कर 126 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
– अमेरिकी क्रूड (WTI) 3.3% की बढ़त के साथ 110 डॉलर प्रति बैरल पर चला गया।
सुबह करीब 11 बजे ब्रेंट क्रूड 5.77% की तेजी के साथ 124.8 डॉलर प्रति डॉलर और डब्ल्यूटीआई 2.25% की बढ़त के साथ 109.3 डॉलर पर कारोबार कर रहा था।
भारत में क्या पड़ सकता है इसका असर?
भारत दुनिया के तेल आयातक देशों में तीसरे स्थान पर है, जो अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85% कच्चा तेल आयात करता है। जिसमें लगभग 80% हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मूज से होकर आता है, जो अमेरिका ईरान तनाव के कारण बंद है।
जनसत्ता ऑनलाइन के साथ बातचीत में एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा ने कहा, ‘अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं या थोड़ी से नीचे नहीं आती हैं तो आज नहीं तो आने वाले समय में तेल कंपनियों के पास कोई विकल्प नहीं होगा और उन्हें पेट्रोल-डीजल की कीमतें आम उपभोक्ताओं के लिए बढ़ानी होंगी। यह भी हो सकता है कि सरकार ने टैक्स में जो पहले राहत दी थी और यह भी संभव है कि और ज्यादा राहत देनी पड़े।’
क्या है ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी की वजह?
ब्रेंट क्रूड की कीमतों में एक ही सत्र में लगभग 10% की बढ़ोतरी हुई, जबकि अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 112 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।
जनसत्ता के सहयोगी फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की इस तेजी का कारण अमेरिका-ईरान वार्ता का रुक जाना है, क्योंकि महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य पर दोहरी नाकाबंदी अभी भी जारी है। इस जलमार्ग से होकर गुजरने वाला अधिकांश वाणिज्यिक यातायात ठप हो गया है।
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भारत की प्रमुख एयरलाइंस एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट ने कहा है कि वे “ऑपरेशन रोकने” की कगार पर हैं और जेट फ्यूल की ऊंची कीमतों के बीच सरकार से “तुरंत दखल” की मांग की है। एयरलाइंस का कहना है कि वे दोहरी मार (एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की ऊंची कीमतें और युद्ध से जुड़ी एयरस्पेस पाबंदियों के कारण लंबे रूट) झेल रही हैं। यहां पढ़ें पूरी खबर…
