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‘कोविड-19 के संकट ने हमें बताई टेक-होम राशन प्रोग्राम की अहमियत’

कोविड-19 के कारण खाद्य प्रणाली में बाधा और देश के बड़े हिस्से में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता पर इसके प्रभाव ने टेक होम राशन (THR) प्रोग्राम और देश के आखिरी मील तक फोर्टिफाइड फूड पहुंचाने की क्षमता पर प्रकाश डाला है।

kalpana beesbathuniकल्पना बीसबाथूनी

साइट एंड लाइफ फाउंडेशन की ग्लोबल लीड फॉर टेक्नोलॉजी ऐंड एंटरप्रेन्योरशिप कल्पना बीसबाथूनी के मुताबिक कारोना संकट ने टेक-होम राशन प्रोग्राम की अहमियत बताने का काम किया है। साइट एंड लाइफ फाउंडेशन खुद को ‘ह्यूमेनिटेरियन न्यूट्रिशन थिंक टैंक’ कहता है। कल्पना फूड और न्यूट्रिशन सिक्योरिटी सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही है, खासतौर पर कम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में। आइए पढ़ते हैं, उनसे बातचीत के महत्वपूर्ण अंश…

भारत जैसे देशों के लिए महामारी रिस्पॉन्स/रोकथाम रणनीतियों के लिए पोषण का एकीकरण (न्यूट्रिशन इंटिग्रेशन) सुनिश्चित करना क्यों महत्वपूर्ण है?

कल्पना बीसबाथूनी: सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिए इम्यूनिटी को बेहतर बनाने के लिए अच्छा पोषण पहली ज़रूरत है। इम्यून सिस्टम बीमारियों और संक्रमण के खिलाफ शरीर का सुरक्षा कवच है और यह सभी जानते हैं कि कुछ कारक इम्यून सिस्टम की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं जैसे तनाव, नींद, पोषण (सॉन्ग एट अल, 2019; पटेल एट अल 2012 और गोमार्ट एट अल 2020)। डायट को लेकर डब्लूएचओ की सलाह, खासतौर पर मौजूदा महामारी की स्थिति में कहती है, ‘स्वास्थ्य के लिए अच्छा पोषण ज़रूरी है, विशेष रूप से ऐसे समय जब इम्यून सिस्टम को वापस लड़ने की ज़रूरत पड़ सकती है।’ (डब्ल्यूएचओ, 2020)

न्यूट्रिशन टारगेट और उसके नतीजों के मामले में कोविड-19 ने कैसे हमें पीछे धकेल दिया है? क्या आपको लगता है सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अधिक राशन देना, अतिरिक्त घर ले जाने के लिए राशन और सेवाओं की डोरस्टेप डिलिवरी यह सुनिश्चित करने के लिए काफी है कि भारत अपने न्यूट्रिशन टारगेट (पोषण लक्ष्य) के संबंध में पीछे नहीं हुआ है?

कल्पना बीसबाथूनी: राहत के ये उपाय सबसे कमज़ोर उन लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, जो इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। पेट ज़्यादातर स्टार्च वाली चीज़ों से भरा होता है, जबकि आवश्यक पोषक तत्व नहीं होते हैं। लॉकडाउन के दौरान, हमने प्रवासी मज़दूरों, उनके परिवार और गरीब ग्रामीण लोगों की मदद के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले संगठनों के लिए आपूर्तिकर्ताओं के साथ मिलकर पोषक खाद्य पदार्थों को अधिक मात्रा में स्टॉक करने की कोशिश की। लेकिन यह समुद्र में केवल एक बूंद के समान ही है।

‘न्यूट्रिशन इन द परफेक्ट स्ट्रॉम’

यह कोट ‘न्यूट्रीशन इन द परफेक्ट स्टॉर्म’ नामक एक लेख से लिया गया है जिसे हमने 2008 में इनसाइट (In Sight) और लाइफ (Life) मैगज़ीन में प्रकाशित किया था, जिसमें खाद्य मूल्य संकट के दौरान व्यापक रूप से माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी और न्यूट्रिशनल स्टेट्स और स्वास्थ्य के संबंध में इसके परिणामों पर चिंता जताई गई। सूखा, बाढ़ और टिड्डियों के हमले जैसी आपदा के दौरान गरीब परिवार भोजन की विविधता को कम कर देते हैं और अंडे, मीट, फल और सब्ज़ियों से जैसे महंगे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स से भरपूर खाद्य पदार्थ नहीं खाते। पेट भरने के लिए खाली कैलोरी और स्टार्च युक्त चीज़ें या तुंरत ऊर्जा देने वाले प्रोसेस्ड फूड खाते हैं।

हमारे 2008 के पेपर में प्रदान की गई सिफारिशें मौजूदा संकट के समय भी प्रासंगिक हैं: ‘… कमजोर जनसंख्या समूहों के बीच माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी को दूर करने के लिए माइक्रोन्यूट्रिएंट्स सप्लीमेंटेशन, फोर्टिफिकेशन और खाद्य-आधारित रणनीतियों का समर्थन …” अस्वस्थ बच्चों की एक संभावित पीढ़ी के विकास और कभी न बदले जा सकने वाले आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए।’

हालांकि महिलाएं और छोटे बच्चे इस महामारी का चेहरा नहीं हैं, लेकिन वे कमजोर समूहों में सबसे अधिक प्रभावित हैं। द लांसेट के एक अध्ययन के अनुसार, महामारी के दौरान पोषण की कमी के कारण अकेले भारत में लगभग 3 लाख बच्चों की मृत्यु हो सकती है। पोशन अभियान प्रोग्राम के तहत हस्तक्षेप को पहले 1,000 दिनों में महिलाओं और उनके नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले COVID-19 के प्रभाव के आधार पर बदलने की ज़रूरत है?

कल्पना बीसबाथूनी: आपदा में, धूमिल ही सही एक अवसर छिपा होता है। कोविड-19 के कारण खाद्य प्रणाली में बाधा और देश के बड़े हिस्से में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता पर इसके प्रभाव ने टेक होम राशन (THR) प्रोग्राम और देश के आखिरी मील तक फोर्टिफाइड फूड पहुंचाने की क्षमता पर प्रकाश डाला है। भारत के सप्लीमेट्री न्यूट्रिशन प्रोग्राम को केंद्र सरकार की ओर से 15,000 रुपए का फंड मिलता है, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी पहल में से एक बनाती है। 6 साल से कम उम्र के 8.5 करोड़ बच्चों और 2 करोड़ गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं तक यह पहुंचती है। इसके तीन घटक हैं- आंगनवाड़ी केंद्रों में गर्म पका भोजन, सुबह का नाश्ता और घर ले जाने के लिए राशन। टेक होम राशन प्रोग्राम अपनी पहुंच और पैमाने के आधार पर अनूठा है, लाखों लाभार्थियों (छोटे बच्चे, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं) तक पहुंचने के लिए इसके पास पर्याप्त संसाधन है। मौजूदा संकट ने टेक होम राशन प्रोग्राम को अपने वादे को पूरा करने और भारत के पोषण सुरक्षा परिदृश्य को बदलने का अवसर दिया है।

भारत में फूड फोर्टिफिकेशन कितना महत्वपूर्ण है, खासतौर पर महिलाओं और लड़कियों के मामले में?

कल्पना बीसबाथूनी: खासतौर पर प्रजनन की उम्र वाली महिलाएं, किशोर लड़कियां, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी की संभावना अधिक होती है, क्योंकि उनके शरीर को आयरन, विटामिन ए, डी, बी12, फॉलिक एसिड, कैल्शियम, आयोडिन और ज़िंक जैसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की अधिक ज़रूरत होती है। आयरन की अधिक कमी से एनीमिया होने की स्थिति में प्रसव के दौरान महिलाओं की मौत का खतरा बढ़ जाता है। माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी से बच्चे का संज्ञानात्मक विकास और सीखने की क्षमता कम हो जाती है। महिलाओं की मृत्यु और बच्चों के संज्ञानात्मक विकास का नुकसान, मानवीय पूंजी पर गहरा और स्थायी प्रभाव डालता है।

व्यापक नेशनल न्यूट्रिशन सर्वे, 2016 – 2018 के अनुसार, 10-19 वर्ष की किशोर महिलाओं में एनीमिया का फैलाव पुरुष किशोरों की तुलना में दो गुना ज़्यादा है; विटामिन डी की कमी खासतौर पर शहरी बच्चों और किशोरों के बीच नया पनपता सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा है; विटामिन बी 12 की कमी – अंडे / मछली / मांस के कम सेवन से संबंधित- 1-19 साल की उम्र में 14% से 31% तक और किशोरों में यह कमी सबसे अधिक थी। इन माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी को दूर करने के लिए फोर्टिफिकेशन को ही सही समाधान माना जा सकता है।

क्या भारत की लड़कियों और महिलाओं को खास फूड फोर्टिफिकेशन की ज़रूरत है, जो फिलहाल उनके आहार में शामिल नहीं है?

कल्पना बीसबाथूनी: पौधों पर आधारित सप्लीमेंट्री फूड या स्टैपल फूड फोर्टिफिकेशन माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा वास्तविक सेवन की मात्रा बताई गई मात्रा से कम होती है, खासतौर पर 12 महीने से कम उम्र के बच्चे में जिनके पेट की क्षमता कम होती है। इसलिए टेक होम राशन प्रोग्राम को पोषण के अंतर की समस्या को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। ICDS की गाइडलाइन नौ माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (लोहा, कैल्शियम, फोलिक एसिड, जस्ता और विटामिन ए, बी 1, बी 2, बी 3 और सी) के लिए 50% आरडीए शामिल करने की सलाह देते हैं, जबकि वास्तव में लाभार्थी बहुत कम उपभोग करते हैं। इन चुनौतियों को पूरी तरह से दूर करने के लिए टेक होम राशन प्रणाली में कई सुधार करने की ज़रूरत है।

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