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सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में निजीकरण को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ गुस्सा, सड़कों पर उतरेंगे पीएसयू कर्मचारी!

केंद्र सरकार ने साल 1956 में स्टेट ट्रेड कॉर्पोरेशन का गठन किया। पीएसयू मुख्य रूप से पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ व्यापार में शामिल था जो कि तत्कालीन सोवियत संघ के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट ब्लॉक का हिस्सा थे। बाद में एसटीसी बड़े पैमाने पर रसायन, दवाईयों, थोक वस्तुओं जैसे खाद्य तेल, सीमेंट, चीनी, गेहूं और यूरिया के आयात-निर्यात में शामिल हो गया।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी को कम करने के लिए केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की नीति के खिलाफ गुस्सा जाहिर किया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट में इस साल विनिवेश से 1.05 लाख करोड़ रुपए निकालने का लक्ष्य रखा है। सरकार की इस योजना पर सेंट्रल ट्रेड यूनियन जैसे सीआईटीयू, एआईटीयूसी, आईएनटीयूसी, एलपीएफ, एसईडब्ल्यूए और एचएमएस ने वाणिज्य मंत्रालय के स्टेड ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन (एसटीसी), पोजेक्ट और परियोजना और उपकरण निगम (पीईसी) के बंद करने का प्रस्तावों का विरोध करने की धमकी दी है।

सीपीएम पोलित ब्यरो के सदस्य तापन सेन ने कहा, ‘हम मोदी सरकार की सभी वित्तीय योजनाओं के खिलाफ 30 सितंबर को एक महा रैली शुरू करने जा रहे हैं। इसमें एसटीसी और पीईटी के बिक्री के मुद्दे को शामिल किया गया है।’ इसी बीच पशु व्यापार ट्रेड यूनियन के एक लीडर ने कहा कि सरकार के कदम स्पष्ट रूप से राष्ट्र हित के खिलाफ है।

जानना चाहिए कि केंद्र सरकार ने साल 1956 में स्टेट ट्रेड कॉर्पोरेशन का गठन किया। पीएसयू मुख्य रूप से पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ व्यापार में शामिल था जो कि तत्कालीन सोवियत संघ के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट ब्लॉक का हिस्सा थे। बाद में एसटीसी बड़े पैमाने पर रसायन, दवाईयों, थोक वस्तुओं जैसे खाद्य तेल, सीमेंट, चीनी, गेहूं और यूरिया के आयात-निर्यात में शामिल हो गया।

अंग्रेजी न्यूज वेबसाइट फाइनेंशियल एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक एसटीसी की स्थापना के 15 साल बाद सरकार ने रेलवे और इंजीनियरिंग उपकरणों के निर्यात को संभालने के लिए PEC को 1971 में STC की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के रूप में स्थापित किया। बाद में 1997 में पीईसी को एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में शामिल कर लिया गया। लेकिन उदारीकरण के साथ, व्यापार और आयात-निर्यात पर इन सार्वजनिक उपक्रमों की पकड़ कमजोर होती चली गई और कंपनी के सभी खाते एनपीए में बदल गए हैं।

यही वजह है कि वित्त वर्ष 2018-19 में एसटीसी को 881 करोड़ का शुद्ध घाटा हुआ जबकि 2017-18 के वित्त वर्ष में कंपनी को 38 करोड़ रुपए शुद्ध लाभ हुआ था। ऐसे में वाणिज्य मंत्रालय ने इन दोनों सार्वजनिक उपक्रमों एसटीसी और पीईसी को बंद करने का फैसला लिया है जबकि देश के सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर ट्रेडर MMTC लिमिटेड का पूरी तरह पुर्नोत्थान किया जाएगा। इसके लिए वाणिज्य मंत्रालय कैबिनेट मंजूरी का इंतजार रहा है। हालांकि सरकार के इस कदम का ट्रेड यूनियनों और कर्मचारी यूनियन फेडरेशन का समर्थन नहीं मिला है।

जानना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार का दस पब्लिक सेक्टर के बैंकों को चार बड़े बैंकों में तब्दील करने के फैसले का बैंक यूनियन पहले ही खासे विरोध में हैं। ऐसे में एसटीसी और पीईसी को पूरी तरह बंद करने का प्रस्ताव सरकार के लिए और परेशानी पैदा कर सकता है।

मामले में पूर्व राज्य सभा सदस्य तापन सेन ने फाइनेंशियल एक्सप्रेस से कहा, ‘हर कोई सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध कर रहा है। सभी सेंट्रल ट्रेड यूनियन और फेडरेशन ऑफ एंप्लॉय यूनियन ऑफ बैंकिंग, इंश्योरेंस, डिफेंस सेक्टर, सिवाय भारतीय मजदूर संघ के 30 सितंबर को महारैली में विरोध प्रदर्शन करेंगी।’

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