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Volkswagen और हिटलर के बीच रिश्ते की कहानी जान हैरान हो जाएंगे!

दुनिया के सबसे क्रूर तानाशाह हिटलर का कार प्रेम उसकी तकनीक के प्रति सोच को दर्शाता है। हिटलर अपने लोगों के लिए सबसे सस्ती मग​र तेज रफ्तार कार बनाना चाहता था। उसकी इसी सोच का नतीजा है फॉक्सवैगन बीटल।

Author Updated: February 15, 2019 6:42 PM
Photo- Volkswagen official/ Indian Express archive

Volkswagen and Adolf Hitler History: इतिहास जितना पुराना हो उतना ही दिलचस्प होता है खास कर ये तब और भी बेहतर हो जाता है जब इसमें मजबूत शख्सियत का जिक्र हो। एक दौर में अपने खुंखार रवैये और अक्रामक सोच के लिए मशहूर नेशनल सोशलिस्ट (नाज़ी) पार्टी के एडोल्फ हिटलर को न केवल जंग का शौक था बल्कि उसे कारों से भी विशेष प्रेम था। जर्मनी की धरती शुरू से ही अपने खास तकनीक और मशीनरी के लिए जानी जाती रही है। इसी प्रेम का एक अनूठा संयोग हमें मशहूर कार निर्माता कंपनी फॉक्सवैगन और एडोल्फ हिटलर के बीच भी देखने को मिलता है।

28 मई सन 1927 को एक नई सरकारी स्वामित्व वाली ऑटोमोबाइल कंपनी बनी, जिसे तब Gesellschaft zur Vorbereitit des Deutschen Volkswagens mbH के नाम से जाना जाता था। ये नाम जर्मन भाषा में दिया गया है। लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर केवल फॉक्सवैगन वर्क्स या “द पीपल्स कार कंपनी” कर दिया गया।

इस कंपनी को मुख्य रूप से जर्मन लेबर फ्रंट द्वारा संचालित किया जाता था। इसका मुख्यालय जर्मनी के वोल्फ्सबर्ग में था। उस समय हिटलर जर्मनी में हाइवे का बड़ा नेटवर्क बनाना चाहता था इसके अलावा वो एक ऐसी कार का निर्माण करना चाहता था जिसकी कीमत उस समय के तकरीबन 140 डॉलर से भी कम हो और ये कार लगभग सभी की जरूरतों को पूरा कर सके।

अपने इसी योजना को मूर्तिरूप देने के लिए हिटलर ने ऑस्ट्रियाई ऑटोमोटिव इंजीनियर फर्डिनेंड पोर्श से संपर्क किया और “द पीपल्स कार” का डिजाइन तैयार करने को कहा। सन 1938 में, नाजी रैली में, फ्यूहरर ने घोषणा की कि, “जनता के लिए है कि इस कार का निर्माण किया गया है। इसका उद्देश्य उनकी परिवहन आवश्यकताओं को पूरा करना है।”

सन 1939 में KdF (क्राफ्ट-डर्चर-फ्रायड) -वेगन को पहली बार बर्लिन मोटर शो में प्रदर्शित किया गया। लेकिन इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और फॉक्सवैगन  ने कार का उत्पादन रोक दिया। युद्ध समाप्त होने के बाद, मित्र राष्ट्रों ने फौक्सवेगन एक बार फिर से प्रोत्साहित किया ताकि वो जर्मन ऑटो इंडस्ट्री को एक बार फिर से पुनर्जीवित कर सकें।

शुरूआती दौर में फॉक्सवैगन  की कार अमेरिका में बहुत कम बेची जा रही थीं, इसका मुख्य कारण कंपनी का एतिहासिक नाजी कनेक्शन था। वहीं दुनिया के दूसरे मूल्कों में फॉक्सवैगन  की कारें तेजी से बिक रही थीं। सन 1959 में, विज्ञापन एजेंसी डोयले डेन बर्नबैक ने एक शानदार अभियान शुरू किया, जिसमें कार को “बीटल” नाम दिया गया। इतना ही नहीं इसके खास छोटे गोल आकार के फायदों के बारे में भी लोगों को जागरूक किया गया।

आगे चलकर फॉक्सवेगन कुछ वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे ज्यादा कार बेचने वाले वाहन निर्माता के तौर पर उभरा। सन 1960 में, जर्मन सरकार ने फॉक्सवैगन  के 60 प्रतिशत शेयर जनता को बेच दिए। लगभग बारह साल बाद, बीटल की लोकप्रियता ऐसी बढ़ी की इसने 1908 और 1927 के बीच फोर्ड मोटर कंपनी के दिग्गज मॉडल टी द्वारा निर्धारित 15 मिलियन वाहनों के विश्वव्यापी उत्पादन रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया।

सन 1935 के बाद से लंबे समय तक बीटल की डिजाइन में कोई भी परिवर्तन नहीं किया गया और इस कार की बिक्री सन 1970 तक लगातार बढ़ती रही। लेकिन सन 1998 के बाद कंपनी ने इस कार के​ डिजाइन को छोड़कर अन्य तकनीक क्षेत्रों में बदलाव कर इसे नई बीटल के तौर पर पेश किया। पिछले सत्तर वर्षों के शानदार इतिहास के बाद अब कंपनी ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि सन 2019 से इस कार का उत्पादन बंद कर दिया जाएगा। बीटल एडोल्फ हिटलर की चहेती कार थी और वो इसे इसके खास डिजाइन और स्पीड के लिए खासा पसंद करता था।

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