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CHANDRAYAAN 2: जानिए क्या है ‘विक्रम लैंडर’ जो भारत के सपनों को चांद की सतह पर उतारेगा

विक्रम लैंडर का नाम इसरो के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। विक्रम साराभाई 'भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक' के रूप में माने जाते हैं। इसका कुल वजन 1,471 किलोग्राम है।

Author July 22, 2019 1:34 PM
प्रतिकात्मक तस्वीर: चांद की सतह पर विक्रम लैंडर और बाहर निकलता प्रग्यान रोवर। (Photo-ISRO)

 

Chandrayaan 2:  भारत के दूसरे मून मिशन ‘चंद्रयान 2’ की उल्टी गिनती शुरु हो चुकी है। इस मिशन के तहत आज दोप​हर 2 बजकर 43 मिनट पर (भारतीय समयानुसार) श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया जाएगा। चंद्रयान 2 को ऑर्बिटर, विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर सहित तीन मॉड्यूलों बांटा गया है। इसे इसरो के जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल-एमकेआई (जीएसएलवी एमके- III) रॉकेट द्वारा अंतरीक्ष में भेजा जाएगा। इस लेख में हम आपको इस मिशन की सबसे अहम कड़ी ‘विक्रम लैंडर’ से रूबरू करायेंगे, तो आइये जानते हैं क्या है विक्रम लैंडर —

विक्रम लैंडर: विक्रम लैंडर एक ऐसा मॉड्यूल है जो अपने स्वयं के कुछ प्रयोगों का संचालन करते हुए प्रग्यान रोवर को चांद के सतह पर पहुंचाएगा। विक्रम लैंडर जब एक बार तय समय के अनुसार सफलता पूर्वक चांद की सतह पर लैंड कर लेगा तो प्रग्यान रोवर खुद ही बाहर चांद की सतह पर आएगा, इस प्रक्रिया को रोल आउट कहा जाता है। इसमें कई उपकरण और पेलोड भी शामिल हैं जो अपने पूरे मिशन समय में लगातार प्रयोग करते रहेंगे।

बता दें कि, इस लैंडर का नाम इसरो के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। विक्रम साराभाई ‘भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक’ के रूप में माने जाते हैं। ये लैंडर चांद की सतह पर पहुंचने के बाद 14 दिनों तक संचालित किया जाएगा। इस दौरान विक्रम लैंडर बेंगलुरु के पास बयालू में भारतीय डीप स्पेस नेटवर्क (IDSN) के साथ लगातार कम्यूनिकेशन करता रहेगा।

इसी नेटवर्क का उपयोग ऑर्बिटर और रोवर द्वारा भी कम्यूनिकेशन के लिए किया जाएगा। विक्रम लैंडर का कुल वजन 1,471 किलोग्राम है, जिसमें प्रज्ञान रोवर (27 किलोग्राम) भी शामिल है। ये लैंडर लगभग 650 W बिजली पैदा करने में सक्षम है।

ISRO ने खुद तैयार किया लैंडर: ये बात 2007 की है, जब रूस की फेडरल स्पेस एजेंसी Roscosmos को एक लैंडर तैयार करने के लिए कमीशन किया गया था। हालांकि, इस लैंडर की डिलीवरी स्थगित कर दी गई थी, क्योंकि रूस समय सीमा के भीतर लैंडर बनाने में सक्षम नहीं था। यहां तक रूस की ये स्पेस एजेंसी मार्स के लिए फ़ोबोस-ग्रंट मिशन में रोस्कोस्मॉस विफल होने के बाद 2015 तक डिलीवरी देने में समर्थ नहीं थी। जिसके बाद ISRO के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था और उन्होनें अंत में खुद ही लैंडर को तैयार करने का फैसला किया।

विक्रम लैंडर चांद की सतह पर बेहद स्मूथ लैंडिंग करेगा जिससे बोर्ड पर किसी भी उपकरणों को कोई नुकसान नहीं हो। अंतरिक्ष की दुनिया में ऐसा पहली बार होगा कि कोई लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। ये लैंडर अपने तय स्थान पर लैंडर करने के बाद प्रग्यान रोवर को बाहर निकालेगा जो कि चांद की सतह पर विचरण कर के वहां की स्थिति की जानकारी स्पेस सेंटर को देगा। इस दौरान वहां की तस्वीरें सीधे स्पेस सेंटर भेजी जाएंगी। ये लैंडर आगामी 6 सितंबर को चांद पर पहुंचेगा और उसके बाद प्रज्ञान रोवर अपने प्रयोग शुरू करेगा।

इसरो का अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) ने कई अत्याधुनिक सेंसर्स विकसित किए हैं ताकि लैंडरी को सुरक्षित चांद की सतह पर उतारा जा सके और सटीक जानकारियां हा​सिल की जा सकें। इसकें एक ऑर्बिटर हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरा (OHRC), का-बैंड अल्टीमीटर, लैंडर पोजिशन डिटेक्शन कैमरा (LPDC) और लैंडर हैज़र्ड डिटेक्शन एंड अवॉयडेंस कैमरा (LHDAC) शामिल हैं।

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