आपने बैंक से पैसे उधार लेने के बारे में तो सुना होगा, लेकिन क्या शेयर भी उधार लिए जा सकते हैं? इसका जवाब है- हां। शेयर बाजार में इसके लिए बाकायदा एक व्यवस्था मौजूद है, जिसे Securities Lending and Borrowing (SLB) कहा जाता है।
अब भारत में शेयरों को उधार देने और लेने की यह व्यवस्था चर्चा में है। रॉयटर्स की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार नियामक सेबी इस सिस्टम से जुड़े कुछ बदलावों पर काम कर रहा है।
ऐसे में सवाल है कि आखिर शेयर उधार कैसे लिए जाते हैं, कोई अपने शेयर उधार क्यों देता है और इसका शॉर्ट सेलिंग से क्या संबंध है? आइए आसान भाषा में समझते हैं…
क्या होता है स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग?
स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग में आसान भाषा में समझे तो हम इसे शेयर किराए पर देने और लेने की व्यवस्था कह सकते हैं। जैसे कोई व्यक्ति अपनी चीज कुछ समय के लिए दूसरे को इस्तेमाल करने देता है और बदले में किराया लेता है, वैसे ही शेयर बाजार में निवेशक अपने शेयर कुछ समय के लिए दूसरे निवेशक को उधार दे सकता है।
शेयर उधार देने वाले निवेशक को इसके बदले फीस मिलती है। वहीं, शेयर उधार लेने वाला निवेशक तय समय तक उन शेयरों का इस्तेमाल करता है और बाद में उन्हें वापस करता है।
भारत में यह पूरी प्रक्रिया एक संगठित सिस्टम के जरिए होती है। NSE Clearing ने 21 अप्रैल 2008 को इस व्यवस्था की शुरुआत की थी। इसमें शेयर उधार देने और लेने के ऑर्डर ऑनलाइन सिस्टम पर डाले जाते हैं और तय नियमों के आधार पर उनका मिलान किया जाता है।
कैसे काम करता है स्टॉक लेंडिंग एंड बॉरोइंग सिस्टम?
एनएसई के मुताबिक, SLBS Platform पर शेयर उधार देने वाला पक्ष Lend Order और शेयर उधार लेने वाला पक्ष Borrow Order डाल सकता है। शेयर उधार देने वाले को प्रति शेयर Lending Fee Quote करनी होती है।
इस प्लेटफॉर्म पर ऑर्डर Price-Time Priority के आधार पर मैच किए जाते हैं। यानी शेयरों की लेंडिंग और बॉरोइंग कोई अनौपचारिक लेनदेन नहीं, बल्कि तय बाजार व्यवस्था के तहत होती है।
कोई निवेशक क्यों देता है शेयर उधार?
कोई निवेशक अपने पोर्टफोलियो में लंबे समय से पड़े शेयरों को उधार देकर अतिरिक्त कमाई कर सकता है। इसके बदले उसे तय फीस मिलती है, जबकि शेयरों का मालिकाना हक उसी के पास रहता है।
कोई शेयर उधार क्यों लेता है?
कोई निवेशक आमतौर पर शॉर्ट सेलिंग या बाजार में कीमत गिरने से मुनाफा कमाने के लिए शेयर उधार लेता है। वह उधार लिए शेयर बेचता है और बाद में कीमत गिरने पर सस्ते में खरीदकर वापस कर देता है।
क्या होती है शॉर्ट सेलिंग?
शॉर्ट सेलिंग ऐसी बिक्री है जिसमें विक्रेता के पास बिक्री के समय शेयर मौजूद नहीं होता। भारतीय बाजार में शॉर्ट सेलिंग के लिए मार्केट रेगुलेटर सेबी ने अलग फ्रेमवर्क तय किया है।
यह सिस्टम अभी क्यों चर्चा में है?
रॉयटर्स की 6 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, सेबी शेयरों की लेंडिंग एंड बॉरोइंग के लिए योग्य शेयरों की संख्या करीब दोगुनी करने और Collateral Requirements घटाने की दिशा में काम कर रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, एनएसई पर करीब 2,600 कंपनियां लिस्टेड हैं, लेकिन फिलहाल केवल 176 शेयर उधार देने और उधार लेने के लिए योग्य हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित बदलावों से योग्य शेयरों की संख्या करीब दोगुनी हो सकती है और अधिक लिक्विड शेयर्स को इस व्यवस्था के दायरे में लाया जा सकता है।
हालांकि, रॉयटर्स की रिपोर्ट सूत्रों पर आधारित है। सेबी ने टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया और प्रस्ताव का अंतिम विवरण अभी तय नहीं हुआ है।
यह भी पढ़ें: Mis-selling क्या होती है? वित्तीय उत्पादों की बिक्री से जुड़े RBI के नए नियम समझिए
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों और रेगुलेटेड एंटिटीज द्वारा वित्तीय उत्पादों या सेवाओं की बिक्री से जुड़े नियम कड़े कर दिए। इस कदम का उद्देश्य लेंडर्स द्वारा फाइनेंशियल प्रोडक्ट की गलत बिक्री को रोकना, गलत मार्केटिंग तरीकों पर रोक लगाना और कस्टमर की सहमति, डिस्क्लोजर और बिक्री के तरीकों के नियमों को कड़ा करना है। यहां पढ़ें पूरी खबर…
