जानें-समझें,सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश: वित्त प्रबंधन के रास्ते में कैसी हैं चुनौतियां

वर्ष 2021-22 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1.75 लाख करोड़ रुपए विनिवेश का लक्ष्य रखा है। भारत पेट्रोलियम, एअर इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया, कंटेनर कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया, आइडीबीआइ बैंक, पवन हंस, नीलांचल इस्पात निगम लिमिटेड और कई अन्य कंपनियों में सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचेगी।

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ऊपर वित्‍तमंत्री निर्मला सीतारमन, नीचे (बाएं) से सी रंगराजन, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष, ,तुहिन कांत पांडेय, सचिव, निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम)। फाइल फोटो।

जीवन बीमा निगम का आम निर्गम लाया जाएगा। आइआरसीटीसी के 15-20 फीसद शेयर बेचने की भी तैयारी है। एक बार फिर विनिवेश योजना को लेकर तमाम सवाल पूछे जाने लगे हैं, क्योंकि आजादी के बाद से ही सरकारी कंपनियां भारत की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार रही हैं। सरकारी कंपनियों से सरकार को सालाना करीब 1.5 लाख करोड़ रुपए का शुद्ध मुनाफा होता है।

बजट भाषण में वित्त मंत्री ने माना कि इस साल का राजकोषीय घाटा सकल घरेलु उत्पाद के 9.5 फीसद के बराबर रह सकता है, जिसे 6.8 फीसद लाने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार के सामने राजकोषीय घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था की विकास दर को तेज करने की दोहरी चुनौती है।

विनिवेश की नौबत क्यों

वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से सरकारी कंपनियों का वर्चस्व बाजार में लगातार घटता जा रहा है। वर्ष 2014 में एनडीए सरकार आने के बाद सरकारी कंपनियों की बाजार में हिस्सेदारी 36 फीसद घट गई है। सरकार ने 121 से ज्यादा कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेची है और इससे करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए की कमाई की है।

जब सरकार किसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी में अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचती है तो इसे विनिवेश या डिसइन्वेस्टमेंट कहते हैं। इसी नीति पर चलते हुए सरकार ने 2020-21 के लिए देश के 23 सार्वजनिक उपक्रमों में रेकॉर्ड 2.10 लाख करोड़ रुपए के विनिवेश का लक्ष्य रखा था। हालांकि जनवरी तक सरकार महज 19 हजार करोड़ रुपए ही जुटा सकी है।

केंद्रीय वित्त मंत्री का तर्क है कि सरकार ऐसे समय में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिस्सेदारी बेचना चाहती है, जब उसे इसका सही मूल्य प्राप्त हो। दरअसल, आजादी मिलने के बाद प्रमुख रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की स्थापना जरूरी मानी गई।

इससे 1950 के बाद भारतीय आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में अच्छे बदलाव हुए। सरकार का मानना है कि पीएसयू के उद्देश्य सीमित रह गए हैं। अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए विनिवेश और निजीकरण जरूरी है। यही तक देते हुए वित्त वर्ष 2019-20 के बजट में वित्त मंत्री ने गैर-वित्तीय सार्वजनिक कंपनियों में हिस्सेदारी को 51 फीसद से कम करने की बात कही थी।

प्रमुख कंपनियों की चुनौतियां

अधिकांश पीएसयू में तकनीक के नवीनीकरण के अभाव में संचालन खर्चीला है। कई कंपनियों के घाटे के कारण उनमें भूमि के अतिरिक्त बहुत ही कम संपत्ति बची है। भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड विनिवेश सूची की महत्त्वपूर्ण कंपनी है। तर्क है कि अभी इसकी आर्थिक स्थिति बहुत ही अच्छी है परंतु देश में खनिज तेल के क्षेत्र में स्थानीय और विदेशी निजी कंपनियों की बढ़ती सक्रियता के कारण भविष्य में बीपीसीएल के शेयरों में गिरावट आ सकती है।

इसका सौदा जून तक जबकि जीवन बीमा का आइपीओ दिसंबर से पहले आ सकता है। भारत पेट्रोलियम में सरकार की 53 फीसद हिस्सेदारी है जिसकी कीमत करीब 40 हजार करोड़ रुपए है। जीवन बीमा का अगर 10 फीसद भी आइपीओ लाया जाता है तो इसकी कीमत करीब 80 हजार करोड़ रुपए होगी।

दरअसल, सरकार द्वारा विनिवेश के लिए सूचीबद्ध 23 सार्वजनिक उपक्रमों में केवल चार या पांच के लिए अच्छे ग्राहक और उपयुक्त मूल्य प्राप्त होने का अनुमान है। कोविड-19 महामारी के कारण देश में औद्योगिक और अन्य क्षेत्रों में हुई आर्थिक गिरावट के कारण सरकार के लिए पीएसयू के विनिवेश से आय का लक्ष्य प्राप्त करना आसान नहीं होगा। विनिवेश के लिए निर्धारित सरकारी कंपनियों की सूची में एअर इंडिया को भी शामिल किया गया है। हालांकि, एअर इंडिया जैसी बड़ी कंपनी का एक ही बार में विनिवेश बहुत ही कठिन हो रहा है।

विनिवेश के बाहर चार रणनीतिक क्षेत्र

वित्त मंत्री का कहना है कि चार रणनीतिक क्षेत्रों को छोड़कर अन्य सरकारी कंपनियां खत्म की जाएंगी। जिन चार क्षेत्रों में सरकार अपनी उपस्थिति बरकरार रखेगी, वे हैं – 1. परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा, 2. यातायात और दूरसंचार, 3. ऊर्जा, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज, 4. बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाएं।


क्या कहते
हैं जानकार

महामारी से प्रभावित अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और परियोजनाओं का वित्त पोषण करने के लिए विनिवेश कार्यक्रम का लक्ष्य तय किया गया है। अर्थव्यवस्था को मुश्किलों से बाहर निकालने के लिए रेकॉर्ड पूंजीगत व्यय का लक्ष्य रखा गया है।
तुहिन कांत पांडेय, सचिव, निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (दीपम)

निजी बीमा कंपनियों की विदेशी हिस्सेदारी में वृद्धि, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए के लिए परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों (जैसे बैड बैंक) की स्थापना, एक-दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण जरूरी कदम हैं।
– सी रंगराजन, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष

विनिवेश और निजीकरण

सरकारी कंपनियों में विनिवेश से आशय सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के किसी उपक्रम में अपनी हिस्सेदारी की बिक्री से है। सरकार राजकोषीय बोझ को कम करने या विशिष्ट जरूरतों को पूरा करने के लिए धन जुटाने हेतु विनिवेश का विकल्प अपनाती है।

कुछ मामलों में सरकारी संपत्ति के निजीकरण के लिए विनिवेश किया जा सकता है। दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के निजीकरण के तहत सरकार उस उपक्रम से अपनी पूरी या अधिकांश हिस्सेदारी किसी निजी कंपनी को बेच देती है। इन दोनों कदमों के उद्देश्य बताए जाते हैं; राजकोषीय बोझ घटाना, सार्वजनिक वित्त में सुधार, निजी स्वामित्व को प्रोत्साहित करना, विकास के लिए वित्त का प्रबंध, बाजार में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा।

इसके लिए 10 दिसंबर, 1999 को केंद्रीय वित्त मंत्रालय के तहत विनिवेश विभाग की स्थापना की गई थी। 14 अप्रैल, 2016 को विनिवेश विभाग का नाम बदलकर ‘निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग’ कर दिया गया था।

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