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कस्तूरबा जयंती: जब महात्मा गांधी ने कहा बा की चिता जलने तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा…

Kasturba Gandhi Jayanti: 11 अप्रैल 1869 को जन्मीं कस्तूरबा अपने पति मोहनदास करमचंद गांधी से करीब छह महीने बड़ी थीं।

महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी की 1902 की तस्वीर।

अगर मोहनदास करमचंद गांधी देश के करोड़ों लोगों के लिए बापू हैं तो निस्संदेह कस्तूरबा गांधी उनकी बा (माँ) हैं। 11 अप्रैल 1869 को जन्मीं कस्तूरबा अपने पति से करीब छह महीने बड़ी थीं। दोनों की मई 1883 में शादी हो गई। शादी के समय दोनों उम्र करीब 13-14 साल थी। दोनों ने छह दशक से लंबा समय एक साथ गुजारा था। 22 फरवरी 1944 को कस्तूरबा ने आखिरी सांस ली। उसके बाद महात्मा गांधी शायद बेहद अकेले पड़ गए।

कस्तूरबा ने आखिरी सांस पुणेके आगा खान पैलेस डिटेंशन कैंप में बापू की गोद में ली थी। जब कस्तूरबा का अंतिम संस्कार किया गया तो 74 वर्षीय गांधी तब तक वहां बैठे रहे जब तक चिता पूरी तरह जल नहीं गयी। जब गांधीजी से वहां से जाने के लिए कहा गया तो उन्होंने कहा, “ये 62 साल के साझा जीवन की आखिरी विदाई है। मुझे यहां तक तक रहने दो जब तक दाह संपन्न नहीं हो जाता।” उसी शाम गांधी ने अपना सांयकालीन प्रार्थना के दौरान कहा, “मैं बा के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकता।”

कस्तूरबा न केवल गांधीजी के चार संतानों की मां थी बल्कि वो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए माता समान थीं। जब महात्मा गांधी ब्रिटेन में वकालत की पढ़ाई करते थे तो कस्तूरबा भारत में ही रहीं। जब गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका में नौकरी मिली तो वो पत्नी और परिवार को लेकर वहां गए। कस्तूरबा ने पहली बार 1904 में फीनिक्स आश्रम में अपने पति की मदद की। 1913 में उन्होंने भारत प्रवासियों के खिलाफ होने वाले दुर्व्यवहार के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया। जुलाई 1914 में वो गांधीजी के साथ भारत लौट आईं।

कस्तूरबा अपना ज्यादातर समय गांधीजी के आश्रम और आश्रमवासियों की सेवा में गुजारती थीं। 1917 में जब गांधीजी ने चंपारण के नील किसानों का मुद्दा उठाया तो कस्तूरबा ने महिला कल्याण के लिए कार्य शुरू किया। उन्होंने 1922 में गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन में हिस्सा लिया। 1930 में वो गांधीजी के नमक सत्याग्रह के लिए किए गए डांडी मार्च में शामिल नहीं हो सकीं लेकिन सविनय अवक्षा आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आजादी की लड़ाई में शामिल होने की वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा लेकिन वो कभी पीछे नहीं हटीं।

Mahatma Gandhi, Kasturba Gandhi, Rabindranath Tagore महात्मा गांधी, कस्तूरबा गांधी और रबींद्रनाथ टैगोर। (तस्वीर- विकीपीडिया)

उन्हें 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वो महात्मा गांधी और अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया। उन्हें गिरफ्तार करके पुणे के आगा खाँ महल में रखा गया।  उस समय तक उनकी तबीयत काफी खराब हो चुकी थी। उन्होंने वहीं अपनी आखिरी सांस ली। अपनी आत्मकथा में गांधी ने स्वीकार किया है कि कस्तूरबा ने उनके जीवन और लक्ष्यों को ही अपना जीवन और अपना लक्ष्य बना लिया था।

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