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एमआरपी पर बिकेंगी सब्जियां? आरएसएस से जुड़ी संस्था ने मोदी सरकार से की बजट में लागू करने की मांग

केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह भी संसद के शीतकालीन सत्र में सदन में कह चुके हैं कि किसानों को एमएसपी नहीं मिल पा रहा है।

एक बाज़ार में लगी सब्जियों की दुकान। (फाइल फोटो)

वित्त वर्ष 2018-19 का आम बजट पेश होने में बीस दिनों से भी कम समय बचा है। ऐसे में समाज का हर तबका अपने लिए बजट में कुछ राहत की नई उम्मीद लगाए बैठा है। मोदी सरकार का यह आखिरी पूर्ण बजट होगा, इसलिए उम्मीद जताई जा रही है कि इसमें सभी वर्गों को लुभाने की कोशिश की जाएगी। लंबे समय से हाशिए पर चल रहे किसानों के लिए भी बेहतर घोषणाओं की उम्मीद का जा रही है। इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहयोगी संस्था भारतीय किसान संघ ने मोदी सरकार से बजट में सब्जियों के दाम फिक्स करने की मांग की है। संघ के महासचिव मोहिनी मोहन मिश्रा ने न्यूज 18 इंडिया से कहा कि सरकार को चाहिए कि वो सब्जियों और अन्य कृषि उपज के दाम तय करे।

उन्होंने कहा कि एक किसान टमाटर उपजाता है और उसे बिचौलिये के हाथों पांच रुपये प्रतिकिलो बेच देता है लेकिन वो बिचौलिया मंडी में उसे 30 रूपये प्रति किलो बेचता है। बाद में वही टमाटर उपभोक्ताओं को 50 रुपये प्रतिकिलो मिलता है। मिश्रा ने कहा कि किसान खेतीबारी से जुड़े सारे सामान अधिकतम मूल्य पर खरीदता है जबकि अपनी उपज न्यूनतम मूल्य पर बेचता है। उन्होंने कहा कि किसानों को कभी भी लाभ हासिल नहीं हो पाता है क्योंकि मंडियों में उन्हें मिनिमम सपोर्ट प्राइज (एमएसपी) नहीं मिलता है। लिहाजा, अधिकांश किसान एमएसपी से भी कम कीमत पर अपनी उपज बेचने को मजबूर है।

मिश्रा ने कहा कि सरकार ने किसानों को मिनिमम सपोर्ट प्राइज देने का वादा किया था लेकिन अभी भी यह दूर की कौड़ी है। फिलहास पंजाब और हरियाणा सरकार ही किसानों को सब्जियों जैसी उपज पर एमएसपी दे रही है। उन्होंने कहा कि सरकार को सभी कृषि उपज के लिए एमएसपी लागू करना चाहिए। बता दें कि फिलहाल सरकार ने केवल 23 कृषि उत्पादों को ही एमएसपी के दायरे में लाया है। केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह भी संसद के शीतकालीन सत्र में सदन में कह चुके हैं कि किसानों को एमएसपी नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि सब्जियों आदि कृषि उपज के दाम तय नहीं किए जा रहे हैं।

ऐसे में भारतीय किसान संघ ने मोदी सरकार से सब्जियों की कीमत तय करने की मांग की है। अगर ऐसा होता है तो इसका लाभ किसानों के अलावा उपभोक्ताओं को होगा।

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