अगर इनकम टैक्स विभाग सिर्फ किसी बिल्डर की एक्सेल शीट में आपका नाम मिलने के आधार पर आपकी आय में लाखों रुपये जोड़ दे, तो क्या यह सही होगा?

मुंबई ITAT ने कहा है कि ऐसा नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल ने साफ किया कि केवल एक्सेल शीट या तीसरे पक्ष के रिकॉर्ड के आधार पर किसी टैक्सपेयर पर अनडिस्क्लोज्ड इनकम का आरोप नहीं लगाया जा सकता, जब तक उसके समर्थन में ठोस और स्वतंत्र सबूत मौजूद न हों।

क्या है मामला?

अंबरनाथ के टैक्सपेयर, संजीतकुमार केदारनाथ गुप्ता ने अपने भाई के साथ मिलकर जीएनपी गैलेक्सी फेज-I में एक कमर्शियल दुकान खरीदी। प्रॉपर्टी 50 लाख रुपये में एक रजिस्टर्ड एग्रीमेंट के जरिए खरीदी गई थी, जिसमें संजीत के हिस्से का 22.5 लाख रुपये बैंकिंग चैनल के जरिए पेमेंट किया गया था।

23 सितंबर 2021 को आयकर विभाग ने प्रोजेक्ट के डेवलपर GNP कंसल्टेंसी एंड सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड की तलाशी ली, जिसके बाद मामले ने नया मोड़ ले लिया।

तलाशी के दौरान अधिकारियों को बिल्डर के इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से एक एक्सेल शीट मिली। स्प्रेडशीट और बिल्डर के कुछ कर्मचारियों के रिकॉर्ड किए गए बयानों के आधार पर, डिपार्टमेंट ने आरोप लगाया कि भाइयों ने रजिस्टर्ड सेल प्राइस से ज्यादा कैश पेमेंट किया था।

डिपार्टमेंट के मुताबिक, उन्होंने AY 2019-20 में “ऑन-मनी” के तौर पर 90 लाख रुपये और AY 2020-21 में 25 लाख रुपये और दिए थे। रीअसेसमेंट की कार्रवाई के दौरान इन रकमों को संजीत की इनकम में जोड़ा गया।

हालांकि, संजीत ने कोई भी कैश पेमेंट करने से इनकार किया। उसने कहा कि उसने सिर्फ़ रजिस्टर्ड सेल डीड में दर्ज रकम का पेमेंट किया था और किसी भी अनअकाउंटेड लेन-देन से उसे जोड़ने का कोई सबूत नहीं था। कमिश्नर (अपील्स) ने इस बढ़ोतरी को सही ठहराया, जिसके बाद उसने ITAT का दरवाजा खटखटाया।

भूटा शाह एंड कंपनी LLP में डायरेक्ट टैक्स पार्टनर जिग्नेश शाह के अनुसार, किसी थर्ड पार्टी से मिली एक्सेल शीट, डायरी या खुले कागज अपने आप में यह साबित नहीं करते कि कोई लेन-देन असल में हुआ था।

शाह कहते हैं, “ऐसे डॉक्यूमेंट्स, ज्यादा से ज्यादा बिना किसी सबूत के वैल्यू वाले बेकार डॉक्यूमेंट्स होते हैं। आयकर विभाग को इंडिपेंडेंट सबूतों के जरिए टैक्सपेयर और कथित लेन-देन के बीच एक साफ कनेक्शन बनाना चाहिए।”

ट्रिब्यूनल ने क्या पाया?

ITAT ने नोट किया कि उसने AY 2019-20 से जुड़े एक और मामले में पहले ही संजीत के पक्ष में फैसला सुनाया था। 13 मई, 2026 को सुनाए गए उस ऑर्डर में, उसने 90 लाख रुपये की बढ़ोतरी को हटा दिया था, यह पाते हुए कि डिपार्टमेंट टैक्सपेयर को कथित कैश पेमेंट से जोड़ने वाला कोई पक्का सबूत पेश करने में नाकाम रहा था। बेंच ने पाया कि AY 2020-21 के फैक्ट्स एक जैसे थे।

बिल्डर से मिली एक्सेल शीट और बिल्डर के कर्मचारियों के बयानों के अलावा, ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं था जिससे पता चले कि संजीत ने असल में 25 लाख रुपये कैश में दिए थे। क्योंकि डिपार्टमेंट कोई खास बात नहीं बता सका, इसलिए ट्रिब्यूनल ने अपने पहले के फैसले को फॉलो किया और पूरा जोड़ हटा दिया।

क्यों रखता है यह फैसला मायने?

ट्रिब्यूनल ने दोहराया कि अनडिस्क्लोज्ड इनकम साबित करने की जिम्मेदारी आयकर विभाग की है।

इसने यह भी नोट किया कि कोई कैश जब्त नहीं हुआ, कोई रसीद नहीं मिली, कोई मैचिंग बैंक विड्रॉल नहीं मिला, कोई इंडिपेंडेंट गवाह नहीं मिला और टैक्सपेयर को कथित कैश पेमेंट से जोड़ने वाला कोई दूसरा पक्का सबूत नहीं मिला। इसके अलावा, टैक्सपेयर को उन लोगों से जिरह करने का मौका नहीं दिया गया जिनके बयानों पर डिपार्टमेंट ने भरोसा किया था।

शाह का कहना है कि इस सिद्धांत का टैक्सपेयर्स के लिए प्रैक्टिकल महत्व है।

शाह ने कहा, “शुरुआती सबूत की जिम्मेदारी आयकर विभाग की है। अगर वह अपने दावे को भरोसेमंद सबूतों से साबित नहीं कर सकता, तो कुछ जोड़ा नहीं जा सकता। किसी टैक्सपेयर को यह साबित करने की ज़रूरत नहीं है कि उसने कोई ऑन-मनी पेमेंट नहीं किया है, सिर्फ़ इसलिए कि उसका नाम किसी थर्ड पार्टी के ज़ब्त रिकॉर्ड में है,”

वे आगे कहते हैं कि सबूतों में कैश ट्रेल्स, बैंक से पैसे निकालना, पार्टियों से कन्फर्मेशन, ज़ब्त एग्रीमेंट, अकाउंटिंग रिकॉर्ड, डिजिटल सबूत या बिना हिसाब-किताब वाले पैसे के असली फ्लो को साबित करने वाला दूसरा मटीरियल शामिल हो सकता है। सिर्फ बिल्डर की इंटरनल एक्सेल शीट में एंट्रीज आमतौर पर किसी चीज को जोड़ने को सही ठहराने के लिए काफी नहीं होती हैं।

क्या हैं टैक्सपेयर्स के अधिकार?

यह फैसला एक जरूरी प्रोसीजरल सेफगार्ड पर भी जोर देता है। अगर टैक्स डिपार्टमेंट थर्ड पार्टी के बयानों पर भरोसा करता है, तो टैक्सपेयर्स ज़ब्त किए गए मटीरियल, बयानों और डिजिटल सबूतों की कॉपी मांग सकते हैं, जिन पर भरोसा किया गया है। वे उन लोगों से क्रॉस-एग्जामिनेशन के लिए भी कह सकते हैं जिनके बयान जोड़ने का आधार बनते हैं।

शाह के अनुसार, अगर इन सेफगार्ड्स को मना कर दिया जाता है या डिपार्टमेंट काफी सबूत नहीं दिखा पाता है, तो असेसमेंट को अपील अथॉरिटीज के सामने सफलतापूर्वक चैलेंज किया जा सकता है।

यह भी पढ़ें: ITR फाइल करने वालों के लिए जरूरी खबर

आयकर विभाग ने AY 2026-27 के लिए प्री-फिल्ड ITR फॉर्म जारी कर दिए हैं, जिससे टैक्स रिटर्न फाइल करने की प्रक्रिया आसान हो गई है। हालांकि, इन फॉर्म में पहले से टैक्सपेयर की कुछ जानकारी (जैसे पर्सनल जानकारी, सैलरी की जानकारी, बैंक अकाउंट, TDS और टैक्स पेमेंट) अपने आप भर जाती है।

टैक्स नोटिस, रिफंड में देरी या अन्य परेशानियों से बचने के लिए टैक्सपेयर्स को ITR सबमिट करने से पहले AIS, Form 26AS, बैंक डिटेल्स और अन्य जरूरी जानकारियों का मिलान जरूर कर लेना चाहिए। आइए जानते हैं वे 5 बातें, जिन्हें प्री-फिल्ड ITR में जांचना बेहद जरूरी है…

[डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) की मुंबई बेंच द्वारा संजीतकुमार केदारनाथ गुप्ता बनाम ITO (ITA नंबर 1011/Mum/2026, असेसमेंट ईयर 2020-21) के मामले में 12 जून, 2026 को सुनाए गए ऑर्डर पर आधारित है, साथ ही जिग्नेश शाह, पार्टनर – डायरेक्ट टैक्स, भूटा शाह एंड कंपनी LLP द्वारा शेयर किए गए एक्सपर्ट विचारों पर भी आधारित है। यह फैसला इस मामले में पेश किए गए फैक्ट्स और एविडेंस के लिए खास है और इसे हर टैक्स विवाद पर लागू होने वाली मिसाल नहीं माना जाना चाहिए। टैक्स के नतीजे अलग-अलग फैक्ट्स , मौजूद एविडेंस और लागू कानून के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी देने के मकसद से है और इसे कानूनी या टैक्स सलाह नहीं माना जाना चाहिए। पढ़ने वालों को इस जानकारी के आधार पर कोई भी फैसला लेने से पहले किसी क्वालिफाइड टैक्स प्रोफेशनल से सलाह लेनी चाहिए।]