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बढ़ते एनपीए पर भाजपा ने कांग्रेस को कोसा- ‘यूपीए काल’ में लुटवाया न होता तो ये दिन न आते!

बड़े कर्जों की वसूली और एनपीए के मुद्दों के समाधान से जुड़े दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक पर लोकसभा में चर्चा के दौरान भाजपा ने जहां कहा कि अगर संप्रग सरकार के समय जनता का पैसा ‘लुटवाया’ नहीं गया होता तो एनपीए अस्तित्व में ही नहीं होते,

Author July 31, 2018 7:18 PM
वित्त मंत्री पीयूष गोयल

बड़े कर्जों की वसूली और एनपीए के मुद्दों के समाधान से जुड़े दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक पर लोकसभा में चर्चा के दौरान भाजपा ने जहां कहा कि अगर संप्रग सरकार के समय जनता का पैसा ‘लुटवाया’ नहीं गया होता तो एनपीए अस्तित्व में ही नहीं होते, वहीं कांग्रेस ने इस विधेयक के संबंध में सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करते हुए इसे वित्त से जुड़ी स्थाई समिति को भेजने की मांग की। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2018 पर चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा के किरीट सोमैया ने कहा कि अगर संप्रग सरकार के दस साल के शासनकाल में ‘‘बैंकों का पैसा, जनता का पैसा लुटवाया नहीं गया होता’’ तो इस विधेयक की जरूरत नहीं पड़ती। एनपीए अस्तित्व में ही नहीं होते। उन्होंने कहा कि इस विधेयक से डूबती कंपनियों को बचाया जाएगा और नये रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

कांग्रेस के एम वीरप्पा मोइली ने कहा कि भाजपा हमेशा कांग्रेस से एनपीए विरासत में मिलने की बात करती है लेकिन इस सरकार ने अब तक उसमें सुधार के लिए क्या किया।
उन्होंने इस विधेयक की मंशा पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि सरकार को इसे वित्त पर संसद की स्थाई समिति को भेजना चाहिए था। लोकसभा में वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 का और संशोधन करने वाले विधेयक को चर्चा और पारित करने के लिए रखते हुए कहा कि दो साल पहले लागू की गयी संहिता के बाद सरकार का अनुभव अच्छा रहा है और राष्ट्रीय कंपनी कानून अधिकरण (एनसीएलटी) में कुछ मामलों में तो 55 प्रतिशत तक पैसा सीधे बैंकों को वापस आ गया है। इसके अलावा इक्विटी मिली है। हजारों, लाखों लोगों का रोजगार बचा है और कंपनी बंद होने से बची हैं।

गोयल ने कहा कि दो वर्ष के अनुभवों के आधार पर हम इस संहिता में संशोधन लेकर आये हैं जिनमें खासतौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) क्षेत्र को सहूलियत का प्रावधान है। इससे घर खरीदारों को फाइनेंशियल क्रेडिटर बनाया गया है और किसी रीयल इस्टेट कंपनी के डूबने की स्थिति में उसकी आवासीय परियोजना के निवेशकों के हितों का इसमें ध्यान रखा गया है।
उक्त विधेयक छह जून, 2018 को लागू दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) अध्यादेश, 2018 की जगह लेने के लिए लाया गया है। अध्यादेश लाने का विरोध करते हुए आरएसपी के एन के प्रेमचंद्रन ने सरकार पर संविधान के अनुच्छेद 123 के दुरुपयोग का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इसमें रीयल इस्टेट और एमएसएमई क्षेत्र को लेकर लाये गये संशोधन सराहनीय हैं लेकिन इसके लिए अध्यादेश लाने की क्या जरूरत थी? सरकार बताए। प्रेमचंद्रन ने आरोप लगाया कि यह सांठगांठ के पूंजीवाद का मामला है और एक उद्योग, एक कंपनी के फायदे के लिए हड़बड़ी में अध्यादेश लाया गया। इसके लिए सरकार ने संसद की अनदेखी की।

उन्होंने संशोधन विधेयक में क्रेडिटर्स की समिति द्वारा नियमित फैसलों के लिए वोटिंग सीमा 75 प्रतिशत से घटाकर 51 फीसदी करने और कुछ महत्वपूर्ण फैसलों के लिए 66 प्रतिशत करने पर भी सवाल खड़ा किया। भाजपा के सोमैया ने कहा कि प्रेमचंद्रन ने जिन कंपनियों की बात की है, उन्हें रिण किस समय दिया गया, यह भी पता लगा लें। उन्होंने कहा कि कोई भी कंपनी बोली की प्रक्रिया में आगे आकर डूबती हुई कंपनी का अधिग्रहण करती है तो क्या बुराई है। इससे सरकार के राजस्व में भी वृद्धि होती है। नये रोजगार पैदा होते हैं। फिर चाहे कोई भी कंपनी क्यों ना हो।

भाजपा सांसद ने कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कहीं तो राजनीति बंद होनी चाहिए और देश की अर्थनीति के बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि समस्या आपने (कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने) पैदा की और अब समाधान के लिए मोदी सरकार प्रयत्न कर रही है। कांग्रेस सांसद मोइली ने आरोप लगाया कि इस सरकार की कई एजेंसियों के डर से बैंंिकग संस्थाएं निर्णय लेने से डर रही हैं। मोइली ने कहा कि जब हम सरकार में थे तो उस समय कोई भी वित्त संबंधी विधेयक संसदीय समिति को भेजा जाता था। यह एक परंपरा है। लेकिन इस सरकार के अंदर संसदीय समितियों को लेकर ‘बहुत असहिष्णुता’ है। लोकतंत्र के लिए सहिष्णुता जरूरी है।

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