भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) देश के बॉन्ड मार्केट को अधिक सुलभ, पारदर्शी और कुशल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। सेबी बॉन्ड टोकनाइजेशन के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है, जिसके लिए वह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के साथ समन्वय कर रहा है।
यह पहल निवेशकों के लिए बॉन्ड बाजार तक पहुंच आसान बनाने और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
SEBI के होल-टाइम मेंबर अमरजीत सिंह ने गुरुवार को मुंबई में एक इवेंट में कहा, “आइडिया यह है कि क्या एक शेयर्ड लेजर का इस्तेमाल सिक्योरिटी और पैसे के एक साथ ट्रांसफर को इनेबल करने के लिए किया जा सकता है, जिससे सेटलमेंट ज्यादा एफिशिएंट हो और रिकंसिलिएशन कॉस्ट कम हो। पायलट से इस पहलू की जांच करने की उम्मीद है, साथ ही स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट के जरिए ऑटोमेटेड कूपन पेमेंट और दूसरे सर्विसिंग इवेंट की फीजिबिलिटी की भी जांच की जाएगी।”
सिंह ने कहा, “मैं यह साफ कर दूं कि यह एक अलग ट्रेडिंग मार्केट बनाने के बारे में नहीं है। यह इस बारे में जांच करने के बारे में है कि क्या टेक्नोलॉजी मौजूदा बॉन्ड मार्केट को आसान, तेज और ज्यादा एफिशिएंट बना सकती है।”
सेबी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब रेगुलेटर देश में ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए कैपिटल देने के लिए बॉन्ड मार्केट को गहरा करने पर जोर दे रहा है। यह डेट सिक्योरिटीज़ के लिए एक “क्रेडिट रिस्क-ओ-मीटर” पर भी कंसल्ट कर रहा है ताकि ऐसे मार्केट में इन्वेस्टर प्रोटेक्शन को बेहतर बनाया जा सके जो तेजी से बढ़ रहा है।
निवेशकों की सुरक्षा के लिए रिस्क-ओ-मीटर
सिंह ने कहा कि रिस्क-ओ-मीटर एक “स्टैंडर्ड, कलर-कोडेड विज़ुअल स्केल होगा जो मौजूदा क्रेडिट-रेटिंग सिंबल से मैप किया जाएगा। इसे ऑफर डॉक्यूमेंट के साथ-साथ उन प्लेटफॉर्म पर भी दिखाया जाएगा जिनके जरिए सिक्योरिटीज बेची जाती हैं, साथ ही रेटिंग और क्रेडिट-रेटिंग एजेंसी का नाम भी होगा।”
रेगुलेटर कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट के डिस्ट्रीब्यूशन को बेहतर बनाने की भी योजना बना रहा है और “जल्द ही” फिक्स्ड इनकम चैनल पार्टनर्स के लिए एक फ्रेमवर्क लाएगा, जैसा कि म्यूचुअल फंड के मामले में डिस्ट्रीब्यूटर देखते हैं। इन चैनल पार्टनर्स को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ सिक्योरिटीज़ मार्केट्स के ज़रिए सर्टिफाइड किया जाएगा।
सिंह ने साफ किया, “चैनल पार्टनर न तो क्लाइंट फंड या सिक्योरिटीज़ को हैंडल करेंगे और न ही इन्वेस्टर्स से अलग से चार्ज करेंगे। इसका मकसद साफ अकाउंटेबिलिटी और इन्वेस्टर सेफगार्ड बनाए रखते हुए पहुंच बढ़ाना है।”
FPIs के लिए डिजिटल पावर ऑफ अटॉर्नी
एक अलग फैसले में सेबी ने गुरुवार को विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के लिए ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को आसान बना दिया। नए नियमों के तहत अब एफपीआई अपने कस्टोडियन के पास डिजिटली हस्ताक्षरित पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA) जमा कर सकेंगे।
पावर ऑफ अटॉर्नी एक डॉक्यूमेंट है जो FPIs को अपनी ओर से काम करने के लिए कस्टोडियन को ऑथराइज़ करने की इजाज़त देता है। वहीं, कस्टोडियन SEBI-रजिस्टर्ड फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन होते हैं जो FPIs के इन्वेस्टमेंट को होल्ड करने, सुरक्षित रखने और मैनेज करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
सेबी ने अपने सर्कुलर में कहा कि यह नया नियम तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है। इसके तहत पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA) के लिए अब नोटराइजेशन, एपोस्टिलाइज़ेशन और कॉन्सुलराइज़ेशन जैसी अतिरिक्त औपचारिकताओं की आवश्यकता नहीं होगी।
रेगुलेटर के मुताबिक, इस बदलाव से एफपीआई ऑनबोर्डिंग में लगने वाला समय कम होगा, दस्तावेज़ी प्रक्रिया सरल बनेगी और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए भारत में कारोबार करना पहले से अधिक आसान हो जाएगा। यह SEBI द्वारा शुरू किए गए उपायों के हिस्से के तौर पर आता है।
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) से जुड़े ब्याज दर नियमों में अहम बदलाव किए हैं, जो 1 अक्टूबर 2026 से पूरे देश में लागू होंगे। नए नियमों का उद्देश्य बैंकों की ब्याज दर व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और एकरूप बनाना है। यहां पढ़ें पूरी खबर…
