Bangalore: Ajay Ushakant ones used to earn RS 60 lakhs per month, Now does nothing but teach vedic education - 60 लाख रुपए महीने की कमाई छोड़ देने लगे वेद की शिक्षा - Jansatta
ताज़ा खबर
 

60 लाख रुपए महीने की कमाई छोड़ देने लगे वेद की शिक्षा

बैंगलूरु के अजय ऊषाकांत अच्छी-खासी लाखों की कमाई कर रहे थे लेकिन अब मुफ्त में वैदिक शिक्षा देते हैं। फोर्ब्स इंडिया मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में अजय ऊषाकांत ने बदली हुई जिंदगी के बारे में दिलचस्प कहानी सुनाई।

अजय ऊषाकांत की फाइल फोटो। (Image Source: Facebook/Ajay Ushakanth)

बैंगलूरु के अजय ऊषाकांत अच्छी-खासी लाखों की कमाई कर रहे थे लेकिन अब मुफ्त में वैदिक शिक्षा देते हैं। फोर्ब्स इंडिया मैगजीन को दिए एक इंटरव्यू में अजय ऊषाकांत ने बदली हुई जिंदगी के बारे में दिलचस्प कहानी सुनाई। अजय ऊषाकांत के मुताबिक 80 के दशक के आखिर में उन्होंने मुंबई में बतौर हीरा व्यापारी करियर शुरुआत की थी लेकिन पारिवारिक समस्याओं के चलते 1994 में होम टाउन में बेबी प्रोडक्ट की दुकान खोल ली। एक कारपेंटरी यूनिट भी शुरू की जो पांच सितारा होटलों और सर्विस अपार्टमेंट्स में बच्चों के लिए पालने आदि बनाकर बेचती थी। कारोबार से हर महीने लगभग 60 लाख रुपये की कमाई हो रही थी। देश भर में 200 स्टोर खोलने की योजना बनी थी। अन्य साझेदारों के साथ महाराष्ट्र के दो शहरों में ‘द बेबी सेंटर ब्रांड’ के नाम से 8 स्टोर्स भी खोल दिए थे लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि सब पीछे छूट गया।

ऊषाकांत के मुताबिक एक दिन डिनर के दौरान उनकी 17 वर्षीय बेटी ने पूछ लिया, ”ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है, पैसा या परिवार?” बात को अगले दिन के लिए टाल सकता था लेकिन बेटी ने फिर पूछा तो उसे समझाने के लिए तर्क देने लगा कि उसकी फीस भरने के लिए, उसकी और उसके बच्चों की देखभाल करने के लिए पैसों की जरूरत पड़ेगी। ऊषाकांत के मुताबिक तभी बेटी के एक जवाब ने झकझोरा और वह सोचते रह गए। वह बोली, ”इसका मतलब है कि आपने जो परवरिश दी है उस पर आपको विश्वास नहीं है।”

ऊषाकांत के मुताबिक इस वाकये और कैंसर से पिता जी मौत ने आत्मसाक्षात्कार का मौका दिया। वह बताते हैं कि मैं खुद से पूछता था, ”मैं इस धरती पर क्यों हूं? शरीर को क्या जीवित रखता है? और मैं कौन हूं?” भगवद्गीता जैसी पवित्र किताबों की ओर रूझान बढ़ा। गुरुओं का साथ मिला और जिंदगी बदल गई। वह बताते हैं कि 2015 में एक युवा लड़का मिला जो नशे की लत से जूझ रहा था, एक साल तक उसे रास्ता दिखाया और वह नशा मुक्त हो गया। यहां से विचार आया कि जो ज्ञान अर्जित किया है उसे बांटा भी जाए। उभरते हुए उद्यमियों को उनके कारोबार संबंधी सेवा देने वाली अमेरिकी कंपनी वीवर्क के साथ काम कर रहे ऊषाकांत के एक मित्र ने सुझाव दिया कि वह वहां काम करें। वह कहते हैं जब पैसे की जरूरत थी तो उसका पीछा किया, अब जरूरत है नहीं। मुफ्त में ज्ञान इसलिए बांटते हैं क्योंकि उन्हें भी यह मुफ्त में मिला।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App