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बनारसी परंपरा को बनाए रखने की कोशिश

बनारस में बौद्धकाल के दौरान बौद्धिक समाज प्रकृति के आंगन में इकट्ठा होकर नृत्य, संगीत, काव्य और नाट्य का आनंद लेता था। इसे समज्जा की संज्ञा दी जाती थी।

बनारस में बौद्धकाल के दौरान बौद्धिक समाज प्रकृति के आंगन में इकट्ठा होकर नृत्य, संगीत, काव्य और नाट्य का आनंद लेता था। इसे समज्जा की संज्ञा दी जाती थी। इसी परंपरा को निभाने का प्रयास कौमुदी उत्सव में किया गया। इस समारोह का आयोजन संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से कुमुद दीवान फाउंडेशन आॅफ क्लासिकल म्यूजिक एंड डांस की ओर से किया। समारोह में कौमुदी के प्रतीक सफेद कमल से कलाकारों और अतिथियों का स्वागत किया गया।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के एनेक्सी के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में गोवा की राज्यपाल व लेखिका मृदुला सिन्हा मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थीं। उन्होंने कहा कि भारत उत्सवों का देश है और बनारस तो शुरू से ही शिक्षा, धर्म, संस्कृति और कला का केंद्र रहा है। यहां सदियों से देश-विदेश से लोग विद्या ग्रहण करने आते रहे हैं। वाराणसी के महापौर रामगोपाल मोहले ने बताया कि विश्व के 19 शहरों को क्रिएटिव सिटी का दर्जा मिला है, इसमें बनारस भी एक है। जब काशी राष्ट्र गुरु था, तब भारत विश्व गुरु था। हमारा प्रयास होगा कि भारत का वह गौरवशाली अतीत लौट आए। संस्कृति मंत्रालय की सदस्य सचिव उषा आरके ने कहा कि हमारी कोशिश होगी कि काशी में गुरु-शिष्य परंपरा के तहत लोग गायन-नृत्य सीखें। साथ ही कौमुदी उत्सव, गुलाब बाड़ी, बुढ़वा मंगल जैसे उत्सवों की परंपरा को भी पुनर्जीवित किया जाए। हमारा प्रयास है कि मुंबई, चेन्नई और लखनऊ को भी यह दर्जा मिले।

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इस अवसर पर भरतनाट्यम नृत्यांगना डॉ. यामिनी कृष्णमूर्ति ने कहा कि शास्त्रीय संगीत और नृत्य की अविरल धारा है। जिसके बहने से लोग चिरजीवी होते हैं। कौमुदी उत्सव में कथक नृत्यांगना शोवना नारायण भी मौजूद थीं। उन्होंने अपने कार्यक्रम की शुरुआत ‘बनारस को अगर ठहराई’ पर आधारित नृत्य से की। इस प्रस्तुति में बनारस के सौंदर्य की तुलना नायिका के सौंदर्य से की गई थी। उन्होंने ‘छाड़ो लंगर मोरे बइयां गहो न’ पर नृत्य अभिनय पेश किया। इसमें राधा-कृष्ण की छेड़छाड़ और नायिका के सोलह श्रृंगार के भावों का मोहक चित्रण था। वहीं कविता ‘दो घंूट भंग पिलइह’ में शिव की बारात के दृश्य का वर्णन था। अगली कविता ‘नई अबला रस रीत न जाने’ में दुल्हन पार्वती और सखी के संवाद को दर्शाया गया। इसी क्रम में कवयित्री वर्तिका नंदा की कविता ‘औरत की चुप्पी, नानक है, कबीर है’ को शोवना नारायण ने भावों के जरिए दर्शाया। नृत्यांगना शोवना ने अपनी प्रस्तुति का समापन ‘ओ कवि तुम ऐसी कविता लिखना’ से किया। इसमें महिलाओं को संदेश दिया गया था कि वह अपने साथ होने वाले शोषण और अत्याचार का विरोध करें। शोवना नारायण के साथ तबले पर शकील अहमद थे और गायन पर माधव प्रसाद ने संगत की।
समारोह में बनारस घराने की ठुमरी गायिका कुमुद दीवान ने ठुमरी व दादरा पेश किया। उन्होंने शुरुआत विलंबित लय की ठुमरी ‘व्याकुल भई बृजबाम’ से की। उन्होंने राग मिश्र खमाज पर आधारित ठुमरी ‘मोहे तोरी नजरिया लग जाएगी’ गाया। पंडित महादेव मिश्रा रचित यह ठुमरी जत ताल में निबद्ध थी। उन्होंने पंडित जगदीप प्रसाद मिश्र की बंदिश की ठुमरी को सुरों में पिरोया। इसके बोल थे-‘सांवरे ने जमुना तट पर’। उन्होंने दादरा ‘जमुनिया की डार तोड़ लाई राजा’ पेश किया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति में प्रयोग करते हुए डॉ. वर्तिका नंदा के काव्य संग्रह ‘तिनका-तिनका डासना’ की रचना ‘आसमान में छेद है’ गाई। उनके साथ तबले पर आशीष मिश्र और हारमोनियम पर सुमित मिश्र ने संगत की।
वाराणसी को यूनेस्को ने क्रिएटिव सिटी नेटवर्क के तहत ‘क्रिएटिव सिटी आॅफ म्यूजिक’ यानी संगीत का शहर घोषित किया है। यहां के कण-कण में सृजनशीलता विद्यमान है। यह कला, संगीत, नृत्य, साहित्य जगत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संस्कृति मंत्री डॉ. महेश शर्मा की पहल पर ही यह संभव हो पाया है।

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