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भारत को 8-10% सतत वृद्धि के लिए वैश्विक बाजारों पर काबिज होना होगा

अरविंद पनगढ़िया ने कहा, 'चीन में वेतन पिछले एक दशक से अधिक समय से 10 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है और यह भारत के औसत वेतन के मुकाबले दो-तीन गुना अधिक है।'

Author न्यूयार्क | Published on: June 2, 2016 9:12 PM
नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया। (पीटीआई फोटो)

भारत को यदि अगले 20-25 साल तक 8-10 प्रतिशत की सतत् वृद्धि दर हासिल करनी है तो उसे कुछ विश्व बाजारों पर काबिज होना होगा। यह बात एक शीर्ष योजनाकार ने कही लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि देश मुक्त व्यापार समझौते में प्रवेश करने के लिए अन्य के मुकाबले सुस्त रहा है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि मुक्त व्यापार क्षेत्र के मामले में भारत निश्चित तौर पर अन्य देशों के मुकाबले सुस्त रहा है। उन्होंने यह बात बुधवार (1 जून) को यहां एशिया सोसायटी पॉलिसी इंस्टीच्यूट द्वारा ‘भारत सरकार के दो साल’ पर आयोजित चर्चा में कही। वह इस प्रश्न का जवाब दे रहे थे कि क्या व्यापार केंद्रित वृद्धि सरकार के लिए प्राथमिकता है।

पनगढ़िया ने कहा कि बड़ा सवाल यह है कि क्या ‘वाह्य नीति’ सरकार की विकास रणनीति का अंग है। साथ ही कहा कि उनका दबाव इस दिशा में है। उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता है कि यदि भारत को अगले 20-25 साल की अवधि के दौरान 8-10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करने की कोशिश करनी है तो यह काम वस्तुत: विश्व बाजार के कुछ हिस्से पर काबिज हुए बगैर नहीं किया जा सकता।’ उन्होंने कहा कि उदारीकरण के अलावा भारत को व्यापार सुविधा, देश तथा देश से बाहर वस्तुओं के तेज परिवहन और विभिन्न अनिवार्य मंजूरियों जैसे आंतरिक सुधार पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

पनगढ़िया ने कहा कि भारत का आंतरिक वस्तु बाजार 1,000 अरब डॉलर से कम का है जबकि विश्व बाजार में वस्तु व्यापार 18,000 अरब डॉलर का है। उन्होंने कहा कि चीन में वेतन पिछले एक दशक से अधिक समय से और फिलहाल तक 10 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रहा है और यह भारत के औसत वेतन के मुकाबले दो-तीन गुना अधिक है। उन्होंने कहा, ‘वहां भारत के मुकाबले ज्यादा तेजी से वेतन बढ़ सकता है। बहुत से श्रम केंद्रित कंपनियां चीन से भारत निकल रही हैं और भारत उनके स्वाभाविक गंतव्य होना चाहिए।’

यह पूछने पर कि क्या भारत को प्रशांत-पारीय भागीदारी (टीपीपी) से जुड़ने पर विचार कर सकता है, पनगढ़िया ने कहा कि टीपीपी फिलहाल भारत की विचार क्षेत्र में नहीं है। उन्होंने कहा, ‘भारत के टीपीपी के सदस्य बने इसके लिए बहुत सी चीजें करनी बाकी हैं.. मसलन, बौद्धिक संपदा, सरकारी खरीद और श्रम मानक।’ उन्होंने कहा, ‘ये सभी टीपीपी के अभिन्न अंग हैं और भारत टीपीपी की इन क्षेत्रों में अनिवार्यता के मानक के स्तर से नीचे है।’

एच1-बी वीजा का हवाला देते हुए पनगढ़िया ने कहा, ‘यदि आप इस तरह शुल्क बढ़ाते हैं कि पहले दी हुई रियायत पर खतरा मंडराता है तो दूसरी ओर राजनीतिक तौर पर बहुत अच्छी प्रतिक्रिया नहीं होती।’ उनकी टिप्पणी ऐसे समय में आई है जबकि अमेरिका लोकप्रिय एच-1बी याचिका के लिए वीजा शुल्क बढ़ा रहा है जिसके कारण भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों को पिछले दिसंबर से प्रभावी नियमों के तहत 4,000 डालर प्रति आवेदन अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।

रोजगार सृजन के संबंध में उन्होंने कहा कि बेरोजगारी भारत के लिए बड़ा मुद्दा नहीं है बल्कि बड़ी समस्या है देश में कमतर रोजगार की समस्या। साथ ही कृषि क्षेत्र का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि करीब 49 प्रतिशत श्रम बल सकल घरेलू उत्पाद में करीब 15 प्रतिशत का योगदान करता है। उन्होंने कहा कि उत्पादकता के मुद्दे का समाधान करने की जरूरत है।

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