After rejection, ‘some headway’ on GST Bill; states meeting next week - Jansatta
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GST BILL लागू कराने की कोशिशों को फिर झटका

देश में अप्रत्यक्ष कर की नई वस्तु व सेवाकर (जीएसटी) प्रणाली लागू कराने के केंद्र की कोशिशों को फिर झटका लगा है। राज्यों ने यह कहते हुए जीएसटी विधेयक के संशोधित मसौदे को खारिज कर दिया है कि इसमें उनकी चिंताओं का समाधान नहीं किया गया है। राज्यों को विशेष तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों और […]

देश में अप्रत्यक्ष कर की नई वस्तु व सेवाकर (जीएसटी) प्रणाली लागू कराने के केंद्र की कोशिशों को फिर झटका लगा (फोटो: भाषा)

देश में अप्रत्यक्ष कर की नई वस्तु व सेवाकर (जीएसटी) प्रणाली लागू कराने के केंद्र की कोशिशों को फिर झटका लगा है। राज्यों ने यह कहते हुए जीएसटी विधेयक के संशोधित मसौदे को खारिज कर दिया है कि इसमें उनकी चिंताओं का समाधान नहीं किया गया है। राज्यों को विशेष तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों और प्रवेश शुल्क को लेकर शिकायत है।

राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार संपन्न समिति की बैठक में पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी व्यवस्था के तहत लाने की केंद्र की योजना का विरोध किया गया। राज्यों ने जीएसटी से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक का भी विरोध किया। उनका कहना है कि इस विधेयक में जीएसटी व्यवस्था लागू होने के पांच सालों के दौरान राज्यों को संभावित राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

वित्त मंत्रियों की अधिकार संपन्न समिति के चेयरमैन अब्दुल रहीम राठेर ने बैठक के बाद कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच इन तीन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी है। राजस्व क्षतिपूर्ति का मुद्दा, पेट्रोलियम पदार्थ और प्रवेश कर का मुद्दा इसमें शामिल है। इन तीन बातों के निदान के बिना अधिकार प्राप्त समिति विधेयक का समर्थन नहीं करेगी।

राठेर ने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार को राज्यों के विचारों का आदर करना होगा। राज्य चाहते हैं कि जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद राज्यों को राजस्व की यदि कोई हानि होती है तो केंद्र को उसकी भरपाई करनी चाहिए। यह व्यवस्था पांच साल के लिए होनी चाहिए और संविधान संशोधन विधेयक में क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया जाना चाहिए।

राज्य सरकारें प्रवेश कर और पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले कर को भी जीएसटी के दायरे से बाहर रखना चाहती हैं। अप्रत्यक्ष करों के क्षेत्र में नई कर व्यवस्था जीएसटी लागू करने के लिए केंद्र ने संविधान संशोधन विधेयक का एक नया मसौदा तैयार किया है।

राठेर ने कहा कि केंद्र ने पिछली बैठक में की गई हमारी सिफारिशों में से एक को छोड़ कर किसी और पर सहमति नहीं दिखाई है। हमने कहा था कि जीएसटी में केंद्र सरकार का हिस्सा विभाज्य पूल में जाना चाहिए और इसे राज्यों के बीच बांटा जाना चाहिए, केंद्र ने इस पर सहमति जताई। नया मसौदा समिति को इस महीने शुरू में मिला। इसमें राज्यों के वित्त मंत्रियों की समिति के सुझावों को शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि हम यह देखकर आश्चर्यचकित हैं कि जीएसटी को विभाज्य पूल में रखने की एक सिफारिश को छोड़कर, पिछली बार जो सिफारिशें की गई थी सरकार ने उन्हें नहीं माना है।

पेट्रोलियम पदार्थों, प्रवेश कर और क्षतिपूर्ति के मामले में केंद्र सरकार ने हमारी सिफारिशों को नहीं माना है। राठेर ने हालांकि केंद्रीय बिक्री कर (सीएसटी) की मद में 11,000 करोड़ रुपए क्षतिपूर्ति के तौर पर जारी करने के केंद्र के फैसले का स्वागत किया है।

उन्होंने कहा कि जहां तक सीएसटी क्षतिपूर्ति का मुद्दा है, हमें यह जानकर खुशी हुई है कि केंद्र ने चालू वित्त वर्ष के बजट में इसके लिए 11,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, इससे राज्यों के 2010-11 तक के सीएसटी क्षतिपूर्ति के दावों का निपटान हो जाएगा। इसके बाद के सालों के लिए केंद्रीय बिक्री कर (सीएसटी) को घटाने संबंधी की क्षतिपूर्ति के मुद्दे पर केंद्रीय वित्त मंत्री के साथ विचार विमर्श किया जाएगा।

वित्त मंत्री ने बुधवार को लोकसभा में अनुपूरक अनुदान मांगों पर चर्चा का जवाब देते हुए राज्यों के लिए अतिरिक्त धनराशि जारी करने की घोषणा की थी। केंद्र और राज्यों के बीच सीएसटी राजस्व क्षतिपूर्ति को लेकर पिछले कुछ साल से खींचतान चल रही है। राज्यों के बीच माल के आवागमन पर सीएसटी लगाया जाता है। मूल्यवर्धित कर (वैट) व्यवस्था लागू होने पर 2007-08 में इसे चार से घटाकर तीन फीसद और 2008-09 में तीन से घटाकर दो फीसद कर दिया गया था। तब केंद्र ने राज्यों से वादा किया था कि वह सीएसटी कटौती से होने वाले राजस्व नुकसान की भरपाई करेगी।

जीएसटी व्यवस्था लागू करने के लिए सीएसटी को धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है। इसी दिशा में बढ़ते हुए इसे चार से घटाकर दो फीसद किया गया है। सीएसटी की वसूली केंद्र करता है और इसे राज्यों में बांटता है।

 

 

 

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