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टैक्सी के बाद अब ट्रक-टेम्पो ट्रांसपोर्टरों को संगठित करने का APP

इंजीनियरिंग स्नातक तीन युवा उद्यमियों द्वारा शहरों के अंदर छोटे वाणिज्यिक वाहनों का परिचालन करने वाले असंगठित परिचालकों को ओला और उबर जैसे ऐप आधारित आॅनलाइन प्लेटफार्म पर लाकर संगठित करने के लिए शुरू किए गए...

Author नई दिल्ली | Updated: October 11, 2016 12:47 PM

इंजीनियरिंग स्नातक तीन युवा उद्यमियों द्वारा शहरों के अंदर छोटे वाणिज्यिक वाहनों का परिचालन करने वाले असंगठित परिचालकों को ओला और उबर जैसे ऐप आधारित आॅनलाइन प्लेटफार्म पर लाकर संगठित करने के लिए शुरू किए गए उद्यम पोर्टर में इस समय बेंगलुरू और दिल्ली सहित पांच शहरों में 3,000 से अधिक हल्के वाणिज्यिक वाहन (एलसीवी) जुड़ चुके हैं। पोर्टर ने निकट भविष्य में अपने प्लेटफार्म से जुड़े एलसीवी की संख्या 50,000 तक करने का लक्ष्य रखा है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर से इंजीनियरिंग करने वाले युवा उद्यमी एवं बेंगलुरूं से शुरू इस स्टार्टअप पोर्टर के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रणव गोयल ने कहा कि पोर्टर का उद्देश्य छोटे वाणिज्यिक वाहनों का परिचालन करने वालों, खासकर अपने टेम्पो-ट्रक खुद चलाने वाले लोगों को एक मंच पर संगठित कर उनका कारोबार बढ़ाने में मदद करना है।

गोयल ने कहा कि दो साल पहले देश की आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) राजधानी बेंगलुरू से शुरू किए गए इस उद्यम में बेंगलुरू दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई में 3,000 से अधिक एलसीवी आॅपरेटर जुड़ चुके हैं। हमारा लक्ष्य इस संख्या को निकट भविष्य में 50,000 तक पहुंचाना है।
उन्होंने कहा, पोर्टर उन्हें एक आॅनलाइन मंच मुहैया कराता है जहां ग्राहक और वाहन मालिक आपस में एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। वाहनों में जीपीएस प्रणाली लगे होने से ग्राहक को उनकी वास्तिविक स्थिति का पता चलता रहता है। इसी तरह कोई वाहन किसी स्थान पर सामान की आपूर्ति करने गया है तो लौटते समय उसे उस स्थान से ढुलाई का आॅर्डर मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

गोयल ने कहा कि बहुत से छोटे ट्रकों के मालिक स्वयं ही उन्हें चलाते हैं। ऐसे में उनको ग्राहकों तक पहुंचने का ज्यादा समय नहीं मिलता और उनका बहुत सारा समय ग्राहकों को ढूंढने में जाया हो जाता है। ‘‘यह बाजार बहुत पेशेवर नहीं है जिससे ऐसे वाहन दिनभर में एक या दो फेरे ही लगा पाते हैं या फिर सामान की आपूर्ति के बाद उन्हें उस स्थान से खाली लौटना होता है जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है।’’
गोयल ने आईआईटी खड़गपुर के उत्तम दीघा और आईआईटी कानपुर के विकास चौधरी के साथ मिलकर इस स्टार्टअप की शुरूआत 2014 में की थी।
पोर्टर मंच से जुड़ने वाले वाहन चालकों या मालिकों को खास प्रशिक्षण दिया जाता है। मालभाड़ा तय करने के लिए एप में एक इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली विकसित की गई है जो मालभाड़े में कंपनी का 20 प्रतिशत कमीशन जोड़कर ग्राहक को बताता है। इस पर नकद और आॅनलाइन भुगतान, दोनों की सुविधा है। ग्राहक द्वारा वाहन को ज्यादा इंतजार कराने या ज्यादा समय लेने पर अतिरिक्त भुगतान करना होता है।
उन्होेंने बताया कि समय अनुपालन में चालक की लापरवाही पर उसे चेतावनी दी जाती है। उसका आॅर्डर भी किसी दूसरे को दे दिया जाता है। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि ऐप के जरिये मालढुलाई की लागत कम होने की एक वजह वाहन के फेरों की संख्या बढ़ना भी है। एक वाहन दिन में ज्यादा फेरे लगाता है तो ग्राहक को मालभाड़े में 25 प्रतिशत तक बचत होती है वहीं चालक की कमाई भी 50 प्रतिशत तक बढ़ती है।
गोयल ने कहा कि कुछ शहरों में ‘नो एंट्री’ वाले स्थान होते हैं या किसी विशेष समय में वहां ट्रकों के जाने की अनुमति नहीं होती। ऐसे में एप पर उस क्षेत्र की बुकिंग ही नहीं होती या गूगल मैप की मदद से चालक को वैकल्पिक मार्ग मुहैया कराया जाता है।

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