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आरबीआई सर्वे: नौकरियों के मामले में दिसंबर 2013 से दोगुनी नाउम्‍मीदी सितंबर 2018 में

दिसंबर 2013 में हुए सर्वे में शामिल लोगों में से 29.1 फीसदी का मानना था कि एक साल पहले के मुकाबले उनके हालात बेहतर हुए। वहीं, 34 पर्सेंट लोगों का कहना था कि हालात बदतर हुए।

नौकरियों को लेकर लोगों की उम्मीदें टूट रही है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे कई मायनों में अहमियत रखता है। इसके जरिए हमें आम लोगों का अर्थव्यवस्था को लेकर नजरिए का पता चलता है। दरअसल, विश्वास से भरा ग्राहक ज्यादा से ज्यादा वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को एक नई उछाल मिलती है। वहीं, यह सर्वे यह भी बताता है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार की कोशिशों को लेकर आम जनता कितनी खुश है? इन बातों के अलावा इस सर्वे का एक और अहम पहलू है। 2019 आम चुनाव बेहद नजदीक हैं। ऐसे में इस सर्वे को सत्ताधारी पार्टी के राजनीतिक भविष्य को लेकर संकेत भी मिलते हैं। पूरे सर्वे का लब्बोलुआब यही है कि वर्तमान आर्थिक हालात को लेकर लोगों में असंतोष तो है, लेकिन बहुत बड़े तादाद का अब भी मानना है कि निकट भविष्य में स्थितियां सुधरने वाली हैं।

नौकरियों को लेकर लोगों की टूट रही उम्मीदें!
रिजर्व बैंक के सर्वे में सबसे पहले रोजगार के पहलू पर लोगों के अनुभव पर नजर डालते हैं। पीएम नरेंद्र मोदी के कमान संभालने से कुछ महीने पहले यानी दिसंबर 2013 में हुए सर्वे में शामिल लोगों में से 29.1 फीसदी का मानना था कि एक साल पहले के मुकाबले हालात बेहतर हुए। वहीं, 34 पर्सेंट लोगों का कहना था कि हालात बदतर हुए। बाकियों का मानना था कि नौकरी के परिप्रेक्ष्य में कोई बदलाव नहीं हुए। यानी नौकरियों को लेकर सकारात्मक सोचने वालों की प्रतिशतता यानी नेट रेस्पॉन्स निगेटिव में 5.3 पर्सेंटेज पॉइंट रही। सितंबर 2016 में हालात थोड़े बेहतर हुए। नौकरियों को लेकर लोगों की उम्मीदों का नेट रेस्पॉन्स निगेटिव में 0.2 पर्सेंट था। अब बात करते हैं वर्तमान हालात की। आरबीआई की ओर से सितंबर 2018 में कराए गए सर्वे के मुताबिक, 35.2 पर्सेंट लोगों ने कहा कि नौकरियों को लेकर हालात बेहतर हुए हैं। वहीं, 45.5% लोगों ने माना कि हालात खराब हुए हैं। यानी नौकरियों को लेकर सकारात्मकता महसूस करने वालों का नेट रेस्पॉन्स निगेटिव में 10.3 पर्सेंटेज पॉइंट रहा। यानी हालात दिसंबर 2013 के मुकाबले और भी खराब हैं।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से कराए गए सर्वे के आंकड़ों पर आधारित।

रोजगार पर ठीक होंगे हालात, उम्मीदें कायम
हालांकि, नवीनतम सर्वे में शामिल लोगों को उम्मीद है कि नौकरियों को लेकर हालात अभी से आने वाले एक साल में बेहतर होंगे। रोजगार के मोर्चे पर एक साल बाद के हालात को लेकर उम्मीदों पर किए सर्वे के मुताबिक, 54.1% लोगों का कहना है कि नौकरियों को लेकर स्थितियां बेहतर होंगी। वहीं, 29 पर्सेंट का मानना था कि हालात खराब होंगे। यानी भविष्य में नौकरियों में सकारात्मक हालात को लेकर नेट रेस्पॉन्स 25.1 पर्सेंटेज पॉइंट है। हालांकि, ऐसी ही सकारात्मकता मोदी सरकार के आने से पहले दिसंबर 2013 के वक्त भी थी। उस वक्त भी लोगों का नेट रेस्पॉन्स 24.9 प्रतिशत था, जो करीब-करीब उतना ही है। यानी रोजगार को लेकर आने वाले वक्त में हालात ठीक होंगे, यह उस वक्त भी जनता सोच रही थी और आज भी। जानकार मानते हैं कि सत्ता पर काबिज सरकार के लिए ये आंकड़े एक सकारात्मक संकेत नहीं हैं।

आमदनी बढ़ने को लेकर भी टूट रही आस
आमदनी के मोर्चे पर लोगों के अनुभवों की बात करें तो दिसंबर 2013 में आरबीआई के सर्वे में शामिल 30.9% प्रतिशत लोगों का मानना था कि एक साल पहले के मुकाबले उनकी आमदनी बढ़ी है। वहीं, 15.5% ने कहा कि उनकी आमदनी में कमी आई है। यानी आमदनी को लेकर लोगों की प्रतिक्रियाओं से जुड़ा नेट रेस्पॉन्स 15.4 पर्सेंटेज पॉइंट था। अब बात करते हैं वर्तमान हालात की। सितंबर 2018 में 28.3% लोगों ने कहा कि पिछले साल के मुकाबले उनकी आमदनी बढ़ी है। वहीं, 23.4% पर्सेंट लोगों ने कहा कि आमदनी घटी है। यानी आमदनी बेहतर होने के मोर्चे पर लोगों की सकारात्मकता का नेट रेस्पॉन्स महज 4.9 पर्सेंटेज पॉइंट था। यानी आमदनी के मोर्चे पर दिसंबर 2013 के मुकाबले जनभावना से जुड़े हालात भी खराब हैं।

वर्तमान आर्थिक हालात को लेकर लोगों में असंतोष
वर्तमान आर्थिक हालात को लेकर लोगों के अनुभवों को आंकड़ों के नजरिए से देखें तो सितंबर 2016 में बेहतर स्थिति मान रहे लोगों का नेट रेस्पॉन्स 19.4 पर्सेंटेज पॉइंट है। यहां ध्यान देने योग्य बात है कि यह सकारात्मकता नोटबंदी के ठीक पहले की है। अब बात करें वर्तमान हालात की। आर्थिक हालात को लेकर सकारात्मकता पर नेट रेस्पॉन्स निगेटिव में 10.6 पर्सेंट है। यानी संकेत मिलते हैं कि लोग वर्तमान आर्थिक हालात से खुश नहीं हैं। यहां यह भी बताना जरूरी है कि इस पैमाने पर लोगों का असंतोष दिसंबर 2013 में निगेटिव में 31.2 पर्सेंटेज पॉइंट था। यूपीए सरकार के सत्ता से जाने में अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों के गुस्से को भी एक वजह माना गया था।

अब भी उम्मीद, ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’
सर्वे में लोगों से आने वाले साल को लेकर उम्मीदों पर सवाल पूछे गए। सितंबर 2018 के सर्वे के प्रतिभागियों का नेट रेस्पॉन्स 51.3 पर्सेंटेज पॉइंट है। 2013 के मुकाबले यहां हालात बेहतर हैं। उस साल दिसंबर में आने वाले साल को लेकर उम्मीदों के मोर्चे पर लोगों का नेट रेस्पॉन्स 37.2 प्रतिशत था। यानी लोगों को अभी भी उम्मीद है कि हालात बेहतर होंगे। वे मानते हैं कि सरकार जरूर कुछ बेहतर कदम उठाएगी। फ्यूचर एक्सपेक्टेशन इंडेक्स यानी भविष्य को लेकर उम्मीदों पर वर्तमान आंकड़ा 121.1 है, जोकि दिसंबर 2013 में 96.9 के मुकाबले कहीं ज्यादा है। यानी कहा जा सकता है कि लोगों की उम्मीदें बेहतर हालात को लेकर अभी भी बनी हुई हैं। बता दें कि यह सर्वे महज 6 बड़े शहरों में किए गए हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि यह शहरी जनभावना पर आधारित है, ये नजरिया छोटे कस्बों और गांवों में रहने वालों लोगों का नहीं है।

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