8th Pay Commission News: केंद्र सरकार ने जब से 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) के लिए टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) नोटिफाई किया है, कई कर्मचारी प्रतिनिधि निकाय ने चिंता जताई है कि फाइनल फ्रेमवर्क में उनकी कई मुख्य मांगों को ठीक से नहीं दिखाया गया है।

जैसे-जैसे 8वें वेतन आयोग का प्रोसेस तेज हो रहा है, कर्मचारियों के बीच उम्मीदें लगातार बढ़ रही हैं। इस बार, बहस सिर्फ फिटमेंट फैक्टर या बेसिक पे में बदलाव तक ही सीमित नहीं है। एक जरूरी प्रपोजल यह भी सामने आया है कि फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस (FMA) को 1,000 रुपये प्रति महीने से बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति महीने कर दिया जाए। खास तौर पर उन कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए जो CGHS नेटवर्क के तहत कवर नहीं होने वाले इलाकों में रहते हैं।

कर्मचारी संगठन ने पिछले वर्ष जनवरी में सरकार के सामने अपनी मांगें रखनी शुरू कर दीं, जब केंद्र सरकार ने 8वें वेतन के गठन की घोषणा की थी। वित्त मंत्रालय ने भी नेशनल काउंसिल – जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी के स्टाफ साइड से टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) पर सुझाव मांगे थे।

स्टाफ साइड का कहना है कि उनकी कई जरूरी मांगों को फाइनल ToR में शामिल नहीं किया गया था। फिटमेंट फैक्टर, OPS की बहाली और मेडिकल सुविधाओं जैसे मुद्दों पर साफ जानकारी न होने को लेकर खास तौर पर नाराजगी थी।

हाल ही में, 8वें वेतन आयोग को जनपथ पर चंद्रलोक बिल्डिंग में एक ऑफिस दिया गया था। कमीशन की चेयरमैन सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई हैं। इसे कमीशन के अपने ऑपरेशनल फेज में जाने का संकेत माना जा रहा है।

ड्राफ्टिंग कमेटी मीटिंग: क्या फैसला हुआ?

जनसत्ता के सहयोगी फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, मांगों के एक चार्टर को फाइनल करने का प्रोसेस राजधानी में NC-JCM (स्टाफ साइड) ड्राफ़्टिंग कमेटी की एक हफ्ते तक चली मीटिंग में शुरू हुआ, जो 25 फरवरी को शुरू हुई थी। इस ड्राफ्ट में लगभग 1 करोड़ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स से जुड़ी कई जरूरी मांगें शामिल हैं।

FMA पर सबसे बड़ा प्रस्ताव

जनसत्ता के सहयोगी फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, सबसे ज्यादा चर्चा वाली मांग नॉन-CGHS एरिया में फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति महीना करना है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि मौजूदा मेडिकल महंगाई के मुकाबले 1,000 रुपये की मौजूदा रकम बहुत कम है। यह रकम मुमकिन नहीं है।

यूनियनों का कहना है कि चूंकि हेल्थ खर्च बहुत तेजी से बढ़ा है, इसलिए मेडिकल अलाउंस को भी असलियत के हिसाब से बढ़ाया जाना चाहिए।

आगे क्या?

अब सबकी नजरें 8वें पे कमीशन की औपचारिक कार्रवाई और उसकी सिफारिशों पर हैं। अगर FMA को बढ़ाकर 20,000 रुपये करने जैसी मांगें मान ली जाती हैं, तो यह एक बड़ी राहत (खासकर नॉन-CGHS इलाकों में रहने वाले पेंशनर्स के लिए) साबित हो सकती है।

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8वें वेतन आयोग की बात जब भी आती है, तो सबसे ज्यादा चर्चा फिटमेंट फैक्टर की होती है। लेकिन इतिहास बताता है कि अगर इस नंबर को अकेले देखा जाए, तो यह थोड़ा भ्रम पैदा कर सकता है। कई सरकारी कर्मचारियों का मानते हैं कि अगर फिटमेंट फैक्टर 2.5 या 2.8 है, तो उनकी सैलरी 150% या उससे ज्यादा बढ़ जाएगी। असल में ऐसा नहीं है, आइए इसे आसानी से समझते हैं…