एसबीआई-एलआईसी समेत बैंकों और बीमा कंपनियों के पास बेकार पड़े हैं 50 हजार करोड़ रुपए, नहीं मिल रहा कोई दावेदार

सरकार ने संसद में कहा है कि 8.1 करोड़ से अधिक बैंक खातों में 24,356 करोड़ रुपए बेकार पड़े हैं। इसमें से एसबीआई के 1.3 करोड़ बैंक खातों में 3,578 करोड़ रुपए हैं। बीमा कंपनियों के पास बेकार पड़े रुपयों की जानकारी नहीं मिल पाई है।

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तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः freepik)

कई लोग निजी बचत के लिए परिवारीजनों से छिपकर बैंक में खाता खुलवा लेते हैं या बीमा पॉलिसी खरीद लेते हैं। इनके जाने के बाद बैंक या इंश्योरेंस पॉलिसी में जमा पैसे पर कोई दावा नहीं कर पाता है। बैंकों और बीमा कंपनियों के पास ऐसा ही पैसा इकट्ठा होकर करीब 50 हजार करोड़ रुपए हो गया है। अब कोई भी इन पैसों की दावेदारी को लेकर सामने नहीं आ रहा है। खुद सरकार ने संसद में यह जानकारी दी है।

सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी में कहा गया है कि बीमा कंपनियों के पास बिना दावे की पड़ी इंश्योरेंस पॉलिसी की सही जानकारी नहीं मिल पाई है। इन पॉलिसी में करोड़ों रुपया अटका पड़ा है। सरकार के मुताबिक कुल 8.1 करोड़ से अधिक बैंक खातों में 24,356 करोड़ रुपए पड़े हैं। यानी हर खाते में औसतन 3 हजार रुपए बेकार पड़े हैं। इनका कोई दावेदार सामने नहीं आ रहा है। सरकार के मुताबिक, खातों में बेकार पड़ी राशि में अकेले 2020 में 5977 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई है।

नेशनलाइज्ड बैंकों में 16,597 करोड़ रुपए: सरकार ने कहा है कि नेशनलाइज्ड बैंकों में 5.5 करोड़ खातों में कुल 16,597 करोड़ रुपए बेकार पड़े हैं। यानी प्रत्येक खाते में औसतन 3030 रुपए बेकार पड़े हैं। देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के 1.3 करोड़ खातों में 3578 करोड़ रुपए बेकार पड़े हैं। प्राइवेट बैंकों के 90 लाख खातों में 2964 करोड़ रुपए बेकार पड़े हैं। विदेशी बैंकों के 6.6 लाख खातों में 612 करोड़ रुपए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के 40 लाख खातों में 601 करोड़ रुपए बेकार पड़े हैं।

क्यों लावारिस हो जाते हैं पैसै?: कई बार ऐसा होता है कि पॉलिसीहोल्डर दो-चार बार प्रीमियम जमा करने के बाद पॉलिसी को छोड़ देता है। बाद में पॉलिसी बंद होने पर यह पैसा बेकार पड़ा रहता है। बैंक खातों में बेकार पड़ी राशि के लिए पता बदलने को प्रमुख कारण माना जाता है। जानकारों का मानना है कि जब कोई खाताधारक एक शहर को छोड़कर दूसरे शहर में बस जाता है तो अपने बैंक खाते में पड़ी थोड़ी रकम को छोड़ देते हैं। इसके अलावा बिना नॉमिनेशन वाली पॉलिसी और बैंक खातों में जमा राशि पर दावे को लेकर बोझिल कागजी कार्रवाई होती है। इससे बचने के लिए उत्तराधिकारी रकम पर दावा ही नहीं करते हैं। इसी कारण यह पैसा खातों में बेकार पड़ा रहता है।

खाताधारकों का पता लगाने में सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश: एक सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री भगवत कराड ने कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे बेकार पड़ी राशि के खाताधारकों का पता लगाने में सक्रिय भूमिका निभाएं। आरबीआई का आवश्यक निर्देश है कि ऐसी राशि डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड में जमा की जाए। इस राशि का इस्तेमाल डिपॉजिटर्स के हित में उनको जागरूक करने पर खर्च की जाए।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बीमा कंपनियां के लिए 10 साल से अधिक समय से दावा ना किए गए पॉलिसी के फंड को सीनियर सिटीजन वेलफेयर फंड में ट्रांसफर किया जाना आवश्यक है। इस राशि का उपयोग वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण से जुड़े योजना में किया जा सकता है।

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