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जयति घोष का आकलन: नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने ही फैसलों से इस बजट को बना ल‍िया है सबसे मुश्‍क‍िल

आम बजट 2017: इस बार सरकार करीब एक महीने पहले आम बजट पेश कर रही है। वहीं रेल बजट भी इस बार नहीं पेश किया जाएगा।

Author Updated: January 31, 2017 11:46 AM
Arun Jaitley news, Arun Jaitley latest news, Arun Jaitley hindi News, Arun Jaitley vs Rahul gandi, Narendra Modi Debt, Narendra Modi News, Narendra Modi latest newsप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बाएं) और वित्‍त मंत्री अरुण जेटली। ( PTI File Photo)

जयति घोष

वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितताओं और नोटबंदी की वजह से घरेलू अर्थव्यवस्था में आयी सुस्ती को देखते हुए आम बजट तैयार करना आसान नहीं होगा। लेकिन ऐसा लग रहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार इस काम को और भी मुश्किल बनाने पर तुली हुई है। सरकार लोगों की उम्मीद बढ़ाने में कामयाब रही और ये लगभग तय है कि इनमें से ज्यादातर उम्मीदें पूरी नहीं होंगी। सरकार नोटबंदी के बहुपक्षी कुप्रभाव को नकारती रही है। वो यूनिवर्सल बेसिक इनकम (बुनियादी आय) से जुड़े तमाम तरह के विचारों को हवा दे रही है। इनके साथ ही वो तुलनात्मक रूप से कठोर वित्तीय लक्ष्य स्वीकार कर रही है।

बजट की घोषणा के समय, इस साल के वित्तीय लक्ष्यों की जटिलता और आने वाले सालों के वित्तीय अनुमानों को ध्यान में रखते हुए हमें इसकी तैयारी की प्रक्रिया पर विचार करना होगा।  ये पहली बार होगा कि आम बजट करीब एक महीने पहले पेश किया जाएगा। कहा जा रहा है कि ये इसलिए किया जा रहा है ताकि इसमें की गयी संस्तुतियों को दो महीने बाद एक अप्रैल से नया वित्त वर्ष शुरू होने तक वैधानिक मंजूरी मिल जाए। ये बात तार्किक लगती है लेकिन सामान्य वर्षों में भी समय से पहले बजट पेश करने से कई मुश्किलें आ सकती हैं। ये मुश्किलें राजनीतिक दलों द्वारा व्यक्त की गयी चिंताओं से इतर हैं।

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सामान्य वर्षों में भी समय से पहले बजट पेश करने पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), राजस्व, सार्वजनिक खर्च इत्यादि से जुड़े वार्षिक आंकड़ों का अनुमान पेश करने में दिक्कत होगी क्योंकि इसके लिए साल के केवल सात-आठ महीनों का डाटा उपलब्ध होगा। लेकिन ये सामान्य वर्ष नहीं है। नोटबंदी और उसके बाद नकदी की किल्लत ने अर्थव्यवस्था को चरमरा दिया है। हमें इतना तो पता है कि इससे बहुत बुरे प्रभाव पड़े हैं लेकिन ये प्रभाव कितना है, कहां तक है और कब तक रहेगा ये हम नहीं जानते।

‘सेंट्रल स्टैटिस्टिकल ऑर्गेनाइजेशन’ (सीएसओ) ने सरकार की मदद करते हुए एक महीने पहले ही जीडीपी का अनुमान दे दिया ताकि बजट निर्माण की प्रक्रिया में सहूलियत हो। चूंकि इस अनुमान में नोटबंदी से होने वाले असर नहीं होंगे इसलिए इससे हमें (और वित्त मंत्रालय को) संभावित जीडीपी का मामूली आभास ही मिलेगा। ये “सुरक्षित” अनुमान इस साल की अनुमानित जीडीपी विकास दर 7.1 प्रतिशत से थोड़ा ही कम है जो कि जाहिर तौर पर वास्तविकता से ज्यादा होगा।

दूसरे स्रोतों से मिले आंकड़ों के अनुसार असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी से बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। इसकी वजह से मांग और आपूर्ति के चक्र पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा है। साथ ही स्वरोजगार करने वालों के रोजगार, आमदनी और आय में कमी भी आयी है। इन आर्थिक नुकसान की एक-दो महीनों में भरपायी नहीं हो सकती। चूंकि अभी भी नकदी का संकट बरकरार है इसलिए इसका विपरीत प्रभाव आगे भी जारी रहेगा और भविष्य की आर्थिक गतिविधियों और निवेश योजनाओं को कुंद करेगा। ऐसे में जाहिर है कि सीएसओ के अनुमान से आर्थिक स्थिति का पूरा पता नहीं चलेग।

राजस्व से जुड़े अनुमान भी अनिश्चित हैं। वित्त मंत्रालय ने पिछले दो महीनों में टैक्स राजस्व में हुई बढ़ोतरी का प्रयोग करते हुए संकेत दिया है कि नोटबंदी के कारण आर्थिक गतिविधियों को कोई नुकसान नहीं हुआ है और असलियत में राजस्व में बढ़ोतरी हुई है। ये कई वजहों से असलियत से दूर है। साल 2016-17 की तीसरी तिमाही में इकट्ठा प्रत्यक्ष कर से पूरे वित्त वर्ष के राजस्व के बारे में अच्छे संकेत नहीं मिलते। संभव है कि बंद किए जा चुके नोटों में बहुत सारे टैक्स का अग्रिम भुगतान किया गया हो जिसकी वजह से पिछले साल की आखिरी तिमाही की तुलना में इस साल की आखिरी तिमाही में ज्यादा टैक्स आया हो। साल 2016-17 की तीसरी तिमाही में इकट्ठा हुए अप्रत्यक्ष कर में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की गिरी कीमतों की वजह से फायदा हुआ। भारत सरकार अंतरराष्टरीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरने के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमत को यथामूल्य पर रखते हुए कस्टम और एक्साइज कर की दरें बढ़ा दीं। वहीं आर्थिक सुस्ती के वजह से आखिरी तिमाही में अप्रत्यक्ष कर से होने वाले राजस्व में कमी आने का अनुमान है।

कमोबेश नोटबंदी के कारण आयी आर्थिक सुस्ती को दूर करने के लिए तत्काल वित्तीय उपाय करने की जरूरत है। अर्थव्यवस्था को भारी झटका देने के बाद सरकार को इसे रोकने के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए। सरकार को कम से कम इसके और बुरे न होने देने का इंतजाम जरूर करना चाहिए। इसके लिए सार्वजनिक मद में होने वाले खर्च को बढ़ाना होगा जिससे ज्यादा रोजगार तैयार हो सके। सार्वजनिक खर्च को इस तरह करना होगा ताकि इससे नकदी के संकट की मार सहने वाले अधिक से अधिक लोग जुड़े सकें।

ऐसे में कोई भी संवेदनशील सरकार सामाजिक खर्च में पर्याप्त बढ़ोतरी करेगी। खासकर उन क्षेत्रों में जिनमें पहले से ही काफी किल्लत है। सरकार को नोटबंदी की वजह से जिनकी रोजगार या जीविका छिन गयी उनका विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसमें पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्र में खर्च शामिल है जिससे इनकी गुणवत्ता सुधरे। इन क्षेत्रों में खर्च करने से सरकार को कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ होगा।

अगर केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के खर्च को कम किए बिना “बुनियादी आय” (बेसिक इनकम) के प्रावधान को लेकर सचमुच गंभीर है तो सबके लिए पेंशन योजना से इसकी शुरुआत की जा सकती है जो फिलहाल केवल गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे की आबादी के लिए है। सरकार इस पेंशन की 200 रुपये प्रति माह की राशि को बढ़ा कर न्यूनतम मजदूरी का आधा कर सकती है, जैसा कि सालों पहले पेंशन परिषद ने मांग की थी।

अगर सरकार संवेदनशीलता दिखाती है तो उसे नोटबंदी के अपने भयावह फैसले के आम लोगों पर पड़े कुप्रभावों को स्वीकार करना चाहिए और जिन लोगों की नौकरी या जीविका गयी है उन कुछ राहत देनी चाहिए। सरकार को उन लोगों के परिजनों के लिए भी कुछ करना चाहिए जिनकी नोटबंदी के बाद जान गयी। लेकिन अफसोस की बात है कि अभी तक सरकार ने संवेदनशील, समझदार या गंभीर होने का बहुत कम संकेत दिया है।

(जयति घोष जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं।)

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