भावेष पांंडेय
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में अभी करीब एक साल का वक्त बाकी है लेकिन राज्य में चुनावी माहौल दिखने लगा है। इस बीच महाराष्ट्र में असर दिखाने के बाद यूपी विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की अगुवाई वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) एक बड़ी चुनौती पेश करने की तैयारी में है। पार्टी ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह इस बार 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना बना रही है।
AIMIM के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली मीडिया से बातचीत में कह चुके हैं कि 2026 के जिला पंचायत चुनावों में सभी 75 जिलों में पार्टी लड़ेगी, और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए 200 सीटों पर तैयारी चल रही है। अंतिम फैसला राष्ट्रीय अध्यक्ष ओवैसी ही लेंगे, लेकिन पार्टी की रणनीति साफ है-मुस्लिम समुदाय में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना और एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प पेश करना।
यूपी में अपनी ताकत दिखाने को बेताब ओवैसी
ओवैसी बार-बार कह चुके हैं कि 2027 का चुनाव वे पूरी मजबूती के साथ लड़ेंगे। उनका मुख्य तर्क यह है कि जब अन्य जातियों-जैसे यादव, जाट, ब्राह्मण, दलित-के अपने अलग-अलग नेता और पार्टियां हो सकती हैं, तो मुसलमानों का अपना स्वतंत्र नेतृत्व क्यों नहीं हो सकता? वे इसे मुस्लिम राजनीतिक अस्मिता और सशक्तिकरण का मुद्दा बताते हैं।
ओवैसी का कहना है कि मुसलमानों को ‘सेकुलर’ पार्टियों पर निर्भर रहकर ‘भीख’ मांगने की जरूरत नहीं है। वे अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी पर सीधा निशाना साधते हुए कह चुके हैं कि वे ‘अखिलेश की दुकान बंद’ कर देंगे। यह बयान महाराष्ट्र में AIMIM की हालिया सफलताओं से उत्साहित होकर आया है, जहां पार्टी ने स्थानीय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया और मुस्लिम-बहुल इलाकों में मजबूत पकड़ बनाई।
उत्तर प्रदेश की मुस्लिम आबादी में ओवैसी का बढ़ता प्रभाव
उत्तर प्रदेश में AIMIM का प्रभाव मुस्लिम समुदाय के बीच धीरे-धीरे बढ़ रहा है। राज्य में लगभग 19-20% मुस्लिम आबादी है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने चुनिंदा सीटों पर लड़ा था, जहां उसके वोट शेयर ने कई जगह सपा-गठबंधन को नुकसान पहुंचाया।
उदाहरण के लिए, बाराबंकी की कुर्सी सीट पर सपा 217 वोटों से हारी, जबकि AIMIM को 8,541 वोट मिले थे। इसी तरह नकुड़, शाहगंज, सुल्तानपुर जैसी कई सीटों पर AIMIM के वोट सपा के हार के मार्जिन से ज्यादा थे। विश्लेषकों का मानना है कि अगर ये वोट सपा को मिल जाते, तो कई सीटों पर नतीजे बदल सकते थे।
सपा को सीधा नुकसान पहुंचाएगी AIMIM
AIMIM के यूपी में बढ़ते प्रभाव से सबसे अधिक नुकसान समाजवादी पार्टी को हो सकता है। सपा का मुस्लिम-यादव (M-Y) गठजोड़ लंबे समय से मजबूत रहा है, और मुस्लिम वोट बैंक उसकी सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। लेकिन AIMIM की मौजूदगी से मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो रहा है, जो सपा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। ओवैसी की पार्टी को ‘वोट-कटर’ कहा जाता रहा है, और 2022 के चुनावों में यह साबित भी हुआ।
इसी वजह से समाजवादी पार्टी कभी नहीं चाहती कि AIMIM यूपी में मजबूती से चुनाव लड़े। लेकिन ओवैसी का तर्क है कि मुसलमानों को अपनी अलग पार्टी बनानी चाहिए, जैसे अन्य जातियां बनाती हैं।
यूपी में AIMIM का प्रभाव बढ़ने के कारण
AIMIM के यूपी में बढ़ते प्रभाव के कई कारण हैं। पहला, ओवैसी की करिश्माई छवि। वे संसद में अपनी बेबाक बहसों और सड़क पर दिए भाषणों से युवा मुसलमानों में लोकप्रिय हैं। दूसरा, मुस्लिमों में बढ़ती असुरक्षा और असंतोष। पिछले कुछ वर्षों में CAA-NRC, लव जिहाद कानून, मस्जिद-मंदिर विवादों और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन ने समुदाय में यह भावना पैदा की है कि मुख्यधारा की पार्टियां उनकी असली आवाज नहीं उठातीं। AIMIM इसे ‘मुस्लिम एक्सक्लूसिव’ राजनीति के रूप में पेश करती है, जो कई युवाओं को आकर्षित कर रही है।
तीसरा, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में पार्टी की सफलता ने यूपी के मुसलमानों में उत्साह जगाया है। महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में AIMIM ने कई मुस्लिम-बहुल वार्डों में जीत दर्ज की, जिससे सपा के मुस्लिम वोट बैंक पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। AIMIM के प्रवक्ता और नेता दावा करते हैं कि मुसलमान अब ‘फेक सेकुलर’ पार्टियों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। यूपी AIMIM अध्यक्ष ने कहा था कि 2027 में सपा सत्ता में नहीं आ पाएगी, क्योंकि मुस्लिम वोट अब बंट रहा है।
जमीनी मजबूती की तैयारी
पार्टी अब ग्राउंडवर्क तेज कर रही है। जिला स्तर पर संगठन खड़ा करना, युवाओं को जोड़ना और स्थानीय मुद्दों (शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा) पर फोकस करना उसकी रणनीति है। कुल मिलाकर, AIMIM का यूपी में बढ़ता प्रभाव मुस्लिम राजनीति में नया अध्याय लिख सकता है। अगर पार्टी 200 सीटों पर मजबूती से लड़ी, तो 2027 का चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है। यह न केवल सपा के लिए चुनौती है, बल्कि पूरे विपक्षी खेमे के लिए भी सोचने का विषय है कि मुसलमानों की बढ़ती आकांक्षा को कैसे संबोधित किया जाए। AIMIM का दावा है कि यह मजबूत विकल्प तैयार करने की दिशा में पहला कदम है, जो मुसलमानों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाएगा।
(लेखक भावेष पाण्डेय (अधिवक्ता) नेशनल एसोसिएशन ऑफ यूथ के अध्यक्ष हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)
