प्रो. मनिन्द्र अग्रवाल, डायरेक्टर, IIT कानपुर

सर्द सुबह की हल्की धुंध में जब एक शोधार्थी अपने लैपटॉप पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल को ट्रेन करने की कोशिश करता है, तो उसे केवल एल्गोरिद्म या कोड की जटिलता से ही नहीं जूझना पड़ता, वह उस अदृश्य संरचना से भी जूझ रहा होता है जो उसके पीछे काम करती है। सर्वर, क्लाउड, स्टोरेज, नेटवर्क और वह विशाल ऊर्जा तंत्र जो इन सबको संचालित करता है। यही संरचना है डाटा सेंटर। आधुनिक अर्थव्यवस्था की असली फैक्ट्री, जहां विचारों को कम्प्यूटिंग शक्ति मिलती है और आंकड़ों को इंटेलिजेंस में बदला जाता है।

आज विश्व जिस तकनीकी क्रांति के दौर से गुजर रहा है, उसमें डाटा सेंटर केवल भवन या मशीनों का समूह नहीं हैं, वे राष्ट्रीय शक्ति, आर्थिक संप्रभुता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के आधार बन चुके हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कम्प्यूटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स, 5G, डिजिटल गवर्नेंस, इन सभी की नींव डाटा सेंटर पर टिकी है। ऐसे समय में उत्तर प्रदेश का 5 गीगावाट क्षमता वाले डाटा सेंटर क्लस्टर विकसित करने का संकल्प केवल एक निवेश प्रस्ताव नहीं, बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक कदम है।

वर्तमान में अमेरिका लगभग 54 गीगावाट की स्थापित क्षमता के साथ डाटा सेंटर क्षेत्र में अग्रणी है। चीन लगभग 20 गीगावाट और यूरोपीय देश लगभग 13 गीगावाट क्षमता के साथ आगे बढ़ रहे हैं। भारत में यह क्षमता अभी लगभग 1.6 गीगावाट है, जबकि देश वैश्विक डाटा का लगभग 20 प्रतिशत उत्पन्न करता है। वैश्विक डाटा सेंटर क्षमता में भारत की हिस्सेदारी मात्र 2–3 प्रतिशत के आसपास है। यह अंतर केवल संख्यात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक है। यदि किसी देश का डाटा विदेशी सर्वरों पर निर्भर है, तो वह अपनी डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा भी बाहरी संरचनाओं पर छोड़ देता है। इसलिए डाटा सेंटर निर्माण का प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

उत्तर प्रदेश की पहल इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखी जानी चाहिए। यदि राज्य वर्ष 2030 तक 5 गीगावाट क्षमता विकसित करता है और 2047 तक 40 गीगावाट के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ता है, तो यह न केवल भारत के डाटा परिदृश्य को बदल सकता है, बल्कि वैश्विक निवेश मानचित्र में भी नई स्थिति स्थापित कर सकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल विशेषकर बड़े लैंग्वेज मॉडल हजारों जीपीयू और अत्यधिक ऊर्जा खपत पर आधारित होते हैं। एक मेगावाट डाटा सेंटर की स्थापना पर निर्माण लागत लगभग 35–40 करोड़ रुपये आती है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और जीपीयू जोड़ने पर कुल लागत 70–80 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट तक पहुंच जाती है। यह पूंजी-गहन क्षेत्र है, लेकिन इसका प्रतिफल भी दीर्घकालिक और बहुआयामी होता है।

डाटा सेंटर केवल प्रत्यक्ष रोजगार ही नहीं देते, वे एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं जिसमें नेटवर्किंग कंपनियां, कूलिंग टेक्नोलॉजी, पावर मैनेजमेंट, साइबर सुरक्षा, क्लाउड सेवाएं, स्टार्टअप, रिसर्च लैब्स और प्रशिक्षण संस्थान सम्मिलित हैं। जिस क्षेत्र में डाटा सेंटर स्थापित हो जाते हैं, वहां से उन्हें स्थानांतरित करना व्यावहारिक रूप से कठिन होता है। इसलिए प्रारंभिक निवेश के साथ दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।

डाटा सेंटर के लिए चार मूलभूत आवश्यकताएं हैं, गुणवत्तापूर्ण और सस्ती बिजली, पर्याप्त भूमि, विश्वसनीय जल संसाधन और तकनीकी मानव संसाधन। उत्तर प्रदेश इन चारों मानकों पर संभावनाओं से परिपूर्ण है। प्रदेश में ऊर्जा अवसंरचना का विस्तार हुआ है और सौर ऊर्जा के माध्यम से लाखों नलकूपों के सोलराइजेशन जैसे कार्यक्रम ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में संकेत देते हैं। बड़े भू-भाग की उपलब्धता, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के निकटता, पूर्वांचल और बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाएं और विकसित हो रहा औद्योगिक ढांचा इसे डाटा सेंटर क्लस्टर के लिए उपयुक्त बनाते हैं।

तकनीकी मानव संसाधन की दृष्टि से आईआईटी कानपुर, आईआईटी बीएचयू, एनआईटी, एकेटीयू और अनेक इंजीनियरिंग संस्थान राज्य को बौद्धिक आधार प्रदान करते हैं। यदि इन संस्थानों को उद्योग के साथ जोड़ा जाए, तो अनुसंधान और नवाचार की गति कई गुना बढ़ सकती है। डाटा सेंटर क्लस्टर केवल इमारतें बनाकर नहीं विकसित होते। इसके लिए नीति, नियमन, निवेशक विश्वास और बहु-विभागीय समन्वय आवश्यक है। डाटा सेंटर स्थापना एक मल्टी-डिसिप्लिनरी प्रयास है जिसमें ऊर्जा, शहरी विकास, आईटी, वित्त, पर्यावरण और औद्योगिक विभागों का तालमेल अनिवार्य है।

हाइपर-स्केलर कंपनियों जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन वेब सर्विसेज, मेटा के साथ रणनीतिक साझेदारी आवश्यक है। निवेशक तब तक डाटा सेंटर स्थापित नहीं करते जब तक उन्हें दीर्घकालिक उपयोग और राजस्व की सुनिश्चितता न हो। इसलिए वैश्विक कंसल्टिंग फर्मों और निवेश फंड्स के साथ सक्रिय संवाद भी आवश्यक है। साथ ही, जहां-जहां डाटा सेंटर क्लस्टर स्थापित हों, वहां समेकित डिजिटल टाउनशिप विकसित की जानी चाहिए, जहां आवास, कौशल केंद्र, स्टार्टअप इन्क्यूबेशन हब और अनुसंधान प्रयोगशालाएं एक साथ हों। इससे क्लस्टर केवल औद्योगिक इकाई नहीं, बल्कि नवाचार का केंद्र बन जाएगा।

“डाटा इज द न्यू ऑयल” यह कथन केवल रूपक नहीं, बल्कि नीति निर्माण का आधार है। यदि राज्य को 2029 तक एक ट्रिलियन डॉलर और 2047 तक 6 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त करना है, तो सटीक, समेकित और रियल-टाइम डाटा अनिवार्य है। वर्तमान व्यवस्था में विभिन्न विभाग अलग-अलग स्तरों पर आंकड़े संकलित करते हैं, जिससे असंगति उत्पन्न होती है। एक केंद्रीकृत स्टेट डाटा अथॉरिटी विभिन्न विभागों के डाटा को एकीकृत कर एक विश्वसनीय प्लेटफॉर्म तैयार कर सकती है। इससे नीति निर्माण अधिक सटीक, पारदर्शी और परिणामोन्मुख होगा। रियल-टाइम डाटा आधारित शासन डिजिटल अर्थव्यवस्था की बुनियाद है।

डाटा सेंटर तभी प्रभावी होंगे जब उनके साथ कौशल विकास का मजबूत ढांचा हो। 25 लाख युवाओं को एआर/वीआर और एआई आधारित प्रशिक्षण देने की योजना, आईटीआई में एआई डाटा लैब्स की स्थापना और एआई-सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना जैसे कदम भविष्य के मानव संसाधन को तैयार करेंगे।

तकनीकी आत्मनिर्भरता केवल मशीनों से नहीं आती, वह मानव मस्तिष्क से आती है। यदि उत्तर प्रदेश अपने युवाओं को उन्नत कम्प्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, क्लाउड आर्किटेक्चर और मशीन लर्निंग में प्रशिक्षित करता है, तो वह न केवल निवेश आकर्षित करेगा बल्कि नवाचार भी उत्पन्न करेगा। आईआईटी जैसे संस्थान इस परिवर्तन में सेतु की भूमिका निभा सकते हैं। अनुसंधान प्रयोगशालाओं में विकसित एल्गोरिद्म, ऊर्जा दक्ष कूलिंग सिस्टम, चिप डिजाइन और साइबर सुरक्षा समाधान सीधे उद्योग में लागू हो सकते हैं। अकादमिक-उद्योग साझेदारी से पेटेंट, स्टार्टअप और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की क्षमता बढ़ती है।

उत्तर प्रदेश यदि डाटा सेंटर तकनीक विशेषकर ऊर्जा दक्षता, हरित कूलिंग और स्वदेशी सर्वर निर्माण में अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है, तो वह केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक का उत्पादक भी बन सकता है। डाटा सेंटर ऊर्जा-गहन होते हैं। इसलिए हरित ऊर्जा, सौर और पवन स्रोतों के उपयोग, तथा जल संरक्षण तकनीकों का समावेश आवश्यक है। यदि उत्तर प्रदेश हरित डाटा सेंटर मॉडल अपनाता है, तो वह वैश्विक ईएसजी (ESG) मानकों के अनुरूप निवेश आकर्षित कर सकता है।

इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब तकनीकी परिवर्तन राष्ट्रों की दिशा बदल देते हैं। कंप्यूटर और इंटरनेट क्रांति के समय भारत ने आंशिक भागीदारी की और अब एआई और डाटा सेंटर युग में नेतृत्व का अवसर है। उत्तर प्रदेश के पास संसाधन, मानव शक्ति, भू-राजनीतिक स्थिति और नीतिगत संकल्प सभी उपलब्ध हैं। यदि इनका समन्वित और समयबद्ध क्रियान्वयन होता है, तो राज्य न केवल भारत का, बल्कि वैश्विक डिजिटल मानचित्र का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

डाटा सेंटर केवल सर्वर नहीं हैं, वे भविष्य की अर्थव्यवस्था के इंजन हैं और यदि यह इंजन उत्तर प्रदेश की धरती पर पूरी शक्ति से संचालित होता है तो आने वाले दशकों में यह प्रदेश डिजिटल आत्मनिर्भरता, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)