भावेष पांडेय

भारतीय राजनीति में जब भी ‘समाजवाद’ शब्द का जिक्र होता है, तो डॉ. राम मनोहर लोहिया की याद आती है। लोहिया का समाजवाद वह था जहाँ योग्यता सर्वोपरि थी और वंशवाद के लिए कोई स्थान नहीं था। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में खुद को लोहिया का उत्तराधिकारी बताने वाली समाजवादी पार्टी (सपा) आज एक जीवंत उदाहरण बन चुकी है कि कैसे एक विचारधारा को ‘निजी संपत्ति’ में बदला जा सकता है।

मुलायम का कुनबा और परिवार की ‘सुप्रीमेसी’

समाजवादी पार्टी के भीतर परिवारवाद केवल एक आरोप नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित संरचना है। मुलायम सिंह यादव ने जब इस पार्टी की नींव रखी थी, तब उद्देश्य पिछड़ों और शोषितों की आवाज बनना था। लेकिन धीरे-धीरे पार्टी के शीर्ष पदों से लेकर जिला पंचायतों तक केवल यादव परिवार का कब्जा होता चला गया।

अब परिवार के जातिवाद पर फिर चर्चा तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के करीबी रहे युवा नेता गगन यादव की सोशल मीडिया पोस्ट ने पार्टी के भीतर के सिस्टम को उजागर कर दिया है। उन्होंने एक भावनात्मक पोस्ट लिखी है जिसमें अखिलेश यादव द्वारा किए गए अपमान का जिक्र है। यह पोस्ट वायरल हो गई है और लोगों के बीच चर्चा का विषय है। गगन यादव की सोशल मीडिया पोस्ट इस बात को मजबूती से रेखांकित करती है कि यादव परिवार के भीतर भी एक ‘हाइरार्की’ यानी श्रेणी बनी हुई है।

इस श्रेणी में सबसे ऊपर मुलायम सिंह यादव के अपने बच्चे और उनका तत्काल परिवार है। पार्टी के भीतर यह अलिखित नियम है कि नेतृत्व का अधिकार केवल मुलायम के सीधे उत्तराधिकारियों को ही मिलेगा। धर्मेंद्र यादव, अक्षय यादव, आदित्य यादव जैसे नाम इस बात की पुष्टि करते हैं कि पार्टी में ऊँचे पदों के लिए ‘यादव’ होना काफी नहीं है, बल्कि ‘मुलायम परिवार’ का हिस्सा होना अनिवार्य है।

अखिलेश बनाम शिवपाल: वर्चस्व की लड़ाई और स्पष्ट परिणाम

2016-17 का वह दौर समाजवादी पार्टी के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ था, जब चाचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव के बीच सत्ता का खुला संघर्ष हुआ। यह केवल दो नेताओं के बीच का मतभेद नहीं था, बल्कि यह परिवारवाद के भीतर ‘सुप्रीम’ कौन रहेगा, इसकी जंग थी।

शिवपाल यादव, जिन्होंने मुलायम सिंह के साथ मिलकर खून-पसीने से पार्टी को खड़ा किया था, उन्हें अखिलेश के सामने झुकना पड़ा। इस विवाद ने यह साफ कर दिया कि पार्टी में ‘अनुभव’ और ‘संघर्ष’ की तुलना में ‘सीधा उत्तराधिकार’ अधिक शक्तिशाली है। अंततः अखिलेश यादव ने न केवल पार्टी पर कब्जा किया, बल्कि यह भी संदेश दिया कि सपा का मतलब अब सिर्फ अखिलेश यादव है। शिवपाल की वापसी और उनका मौन समर्पण यह साबित करता है कि मुलायम के बच्चों के वर्चस्व को चुनौती देना परिवार के भीतर भी संभव नहीं है।

परिवारवाद की भेंट चढ़ता समाजवाद

आज समाजवादी पार्टी की हालत ऐसी है कि कार्यकर्ता केवल ‘झंडा ढोने’ और ‘भीड़ जुटाने’ तक सीमित रह गए हैं। जब भी बड़े फैसलों की बात आती है, तो बंद कमरों की बैठकों में केवल परिवार के सदस्य मौजूद होते हैं। गगन यादव के इनपुट यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या यादव समाज का एक आम युवा कभी सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सपना देख सकता है? जवाब नकारात्मक है।

समाजवाद का मूल सिद्धांत ‘अवसर की समानता’ है, लेकिन सपा में ‘अवसर’ केवल परिवार के लिए आरक्षित हैं। सैफई से लेकर लखनऊ तक, पार्टी का पूरा तंत्र एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमता है। टिकट बंटवारे से लेकर संगठन में पदों के आवंटन तक, परिवार के सदस्यों की सहमति ही अंतिम होती है।

‘सामंतवादी’ आचरण

समाजवादी पार्टी आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ वह समाजवाद की बात तो करती है, लेकिन उसका आचरण पूरी तरह ‘सामंतवादी’ हो चुका है। परिवारवाद की इस भेंट ने पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर दिया है। अखिलेश और शिवपाल के विवाद के बाद स्थापित हुई ‘अखिलेश की सर्वोच्चता’ ने यह मुहर लगा दी है कि यह पार्टी अब किसी विचारधारा की नहीं, बल्कि एक खास परिवार की निजी जागीर है।

अगर सपा को वास्तव में लोहिया के सपनों का समाजवाद लाना है, तो उसे परिवार की चौखट से बाहर निकलना होगा। अन्यथा, गगन यादव जैसे जागरूक युवाओं के सवाल और जनता का मोहभंग पार्टी के पतन की पटकथा लिखते रहेंगे। समाजवाद के नाम पर परिवारवाद का यह खेल अब और अधिक समय तक लोगों की आंखों में धूल नहीं झोंक सकता।

(लेखक अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। विभिन्न पत्रिकाओं में लेखन करते हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)