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World Malaria Day 2018: ग्लोबल मलेरिया नोबेल मलेरिया

मलेरिया के लिए किए गए इन दोनों अद्भुत शोधकार्यों के लिए 1902 में रोनाल्ड रॉस को और 1907 में अल्फोंस लैवेरन को चिकित्सा के नोबल पुरस्कार मिले।

वर्तमान में वैज्ञानिक आनुवांशिक इंजीनियरिंग तकनीकों द्वारा मलेरिया परजीवियों पर प्रहार के हल खोजने में जुटे हैं।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा
मलेरिया के कारण मच्छर जैसा क्षुद्रजीव वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गया और मलेरिया के नियंत्रण हेतु किए जा रहे वैश्विक प्रयासों की समीक्षा के लिए मई 2007 में 60वें विश्व स्वास्थ्य सभा के सत्र के दौरान विश्व मलेरिया दिवस को मनाए जाने के निर्णय ने मलेरिया को भी ग्लोबल बना दिया। समय-समय पर आते रहने वाले आंकड़ों की मानें तो मलेरिया ने अपने संक्रमण से विश्वभर के करोड़ों लोगों को प्रभावित कर रखा है और यह प्रतिवर्ष लगभग 4.5 लाख तक लोगों को मौत की नींद सुला देता है।

मलेरिया के साथ तीन तथ्य जुड़े हुए हैं, एक प्रोटोजोआ, दूसरा मच्छर और तीसरा इसके उपचार की दवा और ये तीनों ही बातें नोबल पुरस्कार से जुड़ी हैं। सबसे पहले सन 1880 में एक फ्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने इस बात की पुष्टि की थी कि मलेरिया का कारक एक प्रोटोजोआ है। इसी तरह भारत में जन्मे और तत्कालीन इंडियन मेडिकल सर्विस के अधिकारी रहे डॉ. रोनाल्ड रॉस ने सिकंदराबाद में सन 1998 में अपने शोधकार्यों के दौरान पहली बार पता लगाया था कि मच्छर की आंत में मलेरिया के रोगाणु पाए जाते हैं।

मलेरिया के लिए किए गए इन दोनों अद्भुत शोधकार्यों के लिए 1902 में रोनाल्ड रॉस को और 1907 में अल्फोंस लैवेरन को चिकित्सा के नोबल पुरस्कार मिले। हम कह सकते हैं कि बीसवीं सदी के प्रारम्भ में ही मलेरिया ग्लोबल और नोबल रोग की श्रेणी में आ गया था। 21वीं सदी आते आते मलेरिया के नियंत्रण के लिए विश्व स्तर पर चिकित्सकीय शोध अपने चरम पर हैं, लेकिन फिर भी मलेरिया ने अपने कहर की पराकाष्ठा वैसी ही बना रखी है। हांलाकि फिर भी विश्व ने इस पर नियंत्रण कर पाने में काफी सफलता हासिल की है। 2015 का साल एक बार फिर मलेरिया को नोबल बनाने का रहा, जब चीन की 84 वर्षीय महिला वैज्ञानिक यूयू तू को मलेरिया के इलाज की नई थेरेपी विकसित करने के लिए आयरलैंड और जापान के दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ परजीवियों से होने वाले संक्रमण से लड़ने में महत्वपूर्ण योगदान हेतु चिकित्सा का नोबल पुरस्कार मिला।

डॉक्टर यूयू तू ने चीनी पारंपरिक प्राकृतिक दवाओं के आधार पर मलेरिया की रोकथाम के लिए आर्टेमिसिनिन व डीहाइड्रोआर्टेमिसिनिन नामक दवाओं की खोज की थी और इन दवाओं ने मलेरिया से होने वाली मौतों से अनगिनत लोगों को बचाया। ये तो वे खोजे हैं, जिन्होंने मलेरिया को ग्लोबल और नोबल बनाया है, परन्तु इसके अलावा भी विश्व स्तर पर पिछले कई दशकों से मलेरिया उन्मूलन के लिए शोध जारी हैं। विज्ञान की भाषा में कहें तो दुनिया भर में मच्छरों की करीब 3,400 विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से एनोफील्स गैंबिया नामक मच्छर मलेरिया का सबसे बड़ा वाहक सिद्ध हुआ है।

वर्तमान में वैज्ञानिक आनुवांशिक इंजीनियरिंग तकनीकों द्वारा मलेरिया परजीवियों पर प्रहार के हल खोजने में जुटे हैं। हाल ही विकसित की गई एक जीन ड्राइव तकनीक के कारण मलेरिया से मुक्ति की दिशा में वैज्ञानिकों को उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल हुई है। परन्तु वैज्ञानिक शोधों के साथ-साथ राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर भी मलेरिया के प्रति व्यापक जन जागरुकता का होना भी उतना ही जरुरी है। तभी सदी के अंत तक ही सही आज का विश्व मलेरिया दिवस भविष्य में इतिहास की बात बन सकता है।

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