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2020 संग भारत रत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के सपनों की विदाई !!

कलाम के सपनों का भारत 2020 तक ऐसा बन जाना था, जिसमें दुनिया का हर व्यक्ति रहना चाहता हो। उन्होंने ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी, जो विद्वानों, वैज्ञानिकों व अविष्कारकों की दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ निवास स्थान बने।

Dream of Dr. APJ Abdul kalam, Blogभारत रत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम। (फोटो- रमेश नायर, इंडियन एक्सप्रेस)

वर्ष 2020 की शुरुआत के साथ ही हमने इक्कीसवीं शताब्दी के बीसवें वर्ष की यात्रा शुरू कर दी थी। भारत में बीसवीं शताब्दी की समाप्ति से पहले से ही वर्ष 2020 बेहद चर्चा में था। दरअसल भारत रत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने बदलते भारत के लिए वर्ष 2020 तक व्यापक बदलाव का सपना देखा था। इक्कीसवीं शताब्दी की शुरुआत के बाद भी उन सपनों को विस्तार दिया गया। ऐसे में 2020 के स्वागत के साथ हमें कलाम के तमाम सपने भी याद आए।

अब 2020 की विदाई की बेला आई है और साथ ही कलाम के सपने भी विदा हो रहे हैं। कोरोना संकट और शाहीनबाग से किसान आंदोलन तक की यात्रा सहेजे इस वर्ष ने अर्थव्यवस्था की चुनौतियों, देश के सर्वधर्म सद्भाव के बिखरते ताने-बाने की चिंताओं और देश की मूल समस्याओं से भटकती राजनीति को विस्तार ही दिया है। इसके परिणास्वरूप कलाम के सपने बिखर से गए हैं।

वर्ष 2020 की शुरुआत में ही देश संभावनाओं के साथ चुनौतियों की पूरी फेहरिश्त लिए खड़ा था। पूरी दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था बनने का स्वप्न लेकर चल रहा भारत अर्थव्यवस्था की कमजोरी से जुड़े संकटों का सामना कर रहा था। बेरोजगारी ने पिछले कुछ वर्षों में कई नये पैमाने गढ़े ही थे, ऊपर से कोरोना का संकट आ गया। रोजगार के अवसर पहले ही कम हुए थे और तमाम ऐसे लोग बेरोजगार होने को विवश हुए, जो अच्छी-खासी नौकरी कर रहे थे।

इन चुनौतियों के स्थायी समाधान पर चर्चा व विमर्श तो दूर की बात है, पूरे देश में धार्मिक सद्भाव के ताने-बाने में बिखराव के दृश्य आम हो गए हैं। कहीं लव जेहाद के नारे लग रहे हैं, तो कहीं धार्मिक राजनीतिक ध्रुवीकरण कर संविधान के मूल भाव को चुनौती दी जा रही है। हमारी चर्चाएं हिन्दू-मुस्लिम केंद्रित हो चुकी हैं। कोरोना संक्रमण के दौर में कारणों की पड़ताल तक धर्म आधारित हो गयी थी।

डॉ.कलाम ने वर्ष 2020 तक भारत की जिस यात्रा का स्वप्न देखा था, उसमें हम काफी पीछे छूट चुके हैं। कलाम ने इक्कीसवीं सदी के शुरुआती बीस वर्षों में ऐसे भारत की कल्पना की थी, जिसमें गांव व शहरों के बीच की दूरियां खत्म हो जाएं। ग्रामीण भारत व शहरी भारत की सुविधाओं में तो बराबरी के प्रयास नहीं किये, गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ाया। खेती पर फोकस न होने से कृषि क्षेत्र से पलायन बढ़ा, जिससे गांव खाली से होने लगे।

कलाम ने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहां कृषि, उद्योग व सेवा क्षेत्र एक साथ मिलकर काम करें। वे चाहते थे कि भारत ऐसा राष्ट्र बने, जहां सामाजिक व आर्थिक विसंगतियों के कारण किसी की पढ़ाई न रुके। 2020 के समाप्त होने तक तो हम इस परिकल्पना के आसपास भी नहीं पहुंच पाए हैं, ऐसे में चुनौतियां बढ़ गयी हैं। किसान से लेकर विद्यार्थी तक परेशान हैं और उनकी समस्याओं के समाधान का रोडमैप तक ठीक से सामने नहीं आ पाया है।

कलाम के सपनों का भारत 2020 तक ऐसा बन जाना था, जिसमें दुनिया का हर व्यक्ति रहना चाहता हो। उन्होंने ऐसे राष्ट्र की कल्पना की थी, जो विद्वानों, वैज्ञानिकों व अविष्कारकों की दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ निवास स्थान बने। इसके लिए वे चाहते थे कि देश की शासन व्यवस्था जवाबदेह, पारदर्शी व भ्रष्टाचारमुक्त बने और सभी के लिए सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य सुविधाएं समान रूप से उपलब्ध हों। ये सारी स्थितियां अभी तो दूरगामी ही लगती हैं।

देश आपसी खींचतान से गुजर रहा है। यहां स्वास्थ्य सेवाएं आज भी अमीरों-गरीबों में बंटी हुई हैं। नेता हों या अफसर, न तो सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना चाहते हैं, न ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। गरीबी और अमीरी की खाई पहले से अधिक चौड़ी हो गयी है।

यह स्थिति तब है कि वर्ष 2020 के लिए अपने सपनों को साझा करते हुए उन्होंने देश को गरीबी से पूरी तरह मुक्त करने का विजन सामने रखा था। वे कहते थे कि देश के 26 करोड़ लोगों को गरीबी से मुक्त कराना, हर चेहरे पर मुस्कान लाना और देश को पूरी तरह विकसित राष्ट्र बनाना ही हम सबका लक्ष्य होना चाहिए। वे इसे सबसे बड़ी चुनौती भी मानते थे।

उनका कहना था कि इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें साधारण मसलों को भूलकर, एक देश के रूप में सामने आकर हाथ मिलाना होगा। कलाम ने ऐसे भारत का स्वप्न देखा था, जिसके नागरिकों पर निरक्षर होने का कलंक न लगे। वे एक ऐसा राष्ट्र चाहते थे जो महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों से पूरी तरह मुक्त हो और समाज का कोई भी व्यक्ति खुद को अलग-थलग महसूस न करे।

कलाम के विजन 2020 का यह वह हिस्सा है, जो पिछले कुछ वर्षों में सर्वाधिक आहत हुआ है। साक्षरता के नाम पर हम शिक्षा के मूल तत्व से दूर हो चुके हैं। महिलाओं व बच्चों का सड़क पर निकलना दूभर हो गया है। वे असुरक्षित हैं और यह बार-बार साबित हो रहा है। समाज में जुड़ाव के धागे कमजोर पड़ चुके हैं और न सिर्फ कुछ व्यक्ति, बल्कि पूरा समाज ही अलगाव के रास्ते पर है। ऐसे में 2020 के बाद ही सही, हमें विचार करना होगा कि हम कलाम के दिखाए सपने और उस लक्ष्य से कितना पीछे रह चुके हैं। हमें मिलकर उस सपने को साकार करने के लिए कदम उठाने होंगे।

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