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‘बुरा न मानो होली’ के नाम पर मर्यादा का ‘वीर्यपात’ क्यों?

गुब्बारे के अंदर पानी, कीचड़, अंडे और अब सीमन। अश्लीलता के नाम पर जितना गिर सकते हैं, उससे भी कहीं ज्यादा गिरते दिख रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी की लड़कियों पर सीमन( वीर्य) भरे गुब्बारे फेंकने की घटना बेशर्मी की पराकाष्ठा है।

Author नई दिल्ली | March 2, 2018 18:49 pm
सीमन भरे गुब्बारे फेंके जाने की घटना के विरोध में दिल्ली के पुलिस मुख्यालय पर लड़कियों ने प्रदर्शन किया था

गुब्बारे के अंदर पानी, कीचड़, अंडे और अब सीमन। अश्लीलता के नाम पर जितना गिर सकते हैं, उससे भी कहीं ज्यादा गिरते दिख रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी की लड़कियों पर सीमन( वीर्य) भरे गुब्बारे फेंकने की घटना बेशर्मी की पराकाष्ठा है। ‘बुरा न मानो होली’ कहकर लंबे अरसे से होली की हुड़दंग पर पर्दा डालने की रवायत अब घातक मोड़ पर पहुंच गई है। अमर कॉलोनी में चंद शोहदों की गुब्बारे फेंकने की घटना ने समूची दिल्ली के चेहरे पर कालिख पोतकर रख दी। समूची दिल्ली इसलिए कि इस घटना में घर से लेकर समाज और प्रशासनिक सिस्टम सबकी असफलता छिपी है। जिन लड़कों ने गुब्बारे फेंके, उनके मां-बाप संस्कार नहीं भर पाए, घटनास्थल पर मौजूद लोग उन्हें ऐसा करते रोक नहीं पाए, फिर लड़कियों की शिकायत पर भी तत्काल आरोपी पुलिस के फंदे में नहीं आए।

आखिर ‘रेप कैपिटल’ के रूप में बदनाम दिल्ली की ‘हवा’ में ऐसा क्या है कि यहां के लड़कों के दिमाग में इतनी शैतानियां भरी हैं, ऐसी घिनौनी घटनाएं अंजाम देते हैं। एक प्रकार से देखें तो यह घटना सामाजिक मर्यादा का ‘वीर्यपात’ है। कौन हैं ये लोग, कहां से लाते हैं दिमाग में इतनी गंदगी, किस आदत से मजबूर होकर करते हैं ऐसा, क्या है इनका इलाज? ये ऐसे सवाल हैं , जिनका जवाब तलाशना समाज और सिस्टम के लिए जरूरी है। नहीं तो ऐसी घटनाएं अनवरत जारी रहेंगी।

 

दिल्ली यूनिवर्सिटी की वह छात्रा,जिस पर शोहदों ने सीमन भरा गुब्बारा फेंका। ( फोटो-एएनआई)

बुरा जरूर मानिएः बुरा न मानो होली है…। इस एक लाइन की आड़ में सारे गलत काम छिपाने की कोशिश होती है। लेडीश्रीराम कॉलेज की छात्रा पर वीर्य भरे गुब्बारे फेंकते समय भी शोहदों ने यही लाइन कही थी।छात्रा के मुतााबिक,”नजदीक आकर मनचलों ने पहले बुरा न मानो होली है कहा और फिर तरल पदार्थ भरे गुब्बारे फेंके। बाद में पता चला कि उसमें जो तरल है, वह सीमन है।”
डीयू के जीसस एंड मेरी कॉलेज की छात्रा पर भी जब सीमन भरे गुब्बारे फेंके गए तो वह परेशान हो गई। छात्रा के मुताबिक बस में मौजूद किसी ने कुछ हेल्प नहीं की, उल्टे साथ बैठी एक आंटी सरीखी महिला ने कह दिया-बुरा न मानो होली है। आंटी का मतलब था कि होली पर ऐसी अभद्रताएं चलतीं रहतीं हैं, इसे ज्यादा दिल पर लेने की जरूरत नहीं है।

मुखर होकर बुलंद करें आवाजःहोली के मौके पर जब भी कोई बुरा न मानो के नाम पर कोई गलत बर्ताव करे तो उसकी बातों में न आइए, न होली का मौका समझकर चुप बैठिए। बुरा मानिए, विरोध करिए और सबक सिखाने के लिए हर संभाव उपाय करिए। चाहे कोई खास हो या आम उसके खिलाफ शिकायत जरूर करें। याद करे, कोई त्यौहार किसी को बदतमीजी करने का लाइसेंस कतई नहीं देता। डीयू की उन लड़कियों से सीखिए, जिन्होंने सीमन भरे गुब्बारे फेंकने की घटना के बाद जोरदार विरोध दर्ज कराया। सैकड़ों की संख्या में पहुंचकर पूरा पुलिस हेडक्वार्टर ही घेर लिया। जिससे पुलिस दबाव में आई और पूरे राजधानी में अलर्ट जारी किया गया। पुलिस ने कॉलोनी के सीसीटीवी खंगालने शुरू किए।
मर्यादा पर मस्ती का न हो अतिक्रमण: फाल्गुन की फिजाओं में मस्ती घुली होती है। फागुनी बयार बहुत मादक मानी जाती है। कहा जाता है कि होली और हुड़दंग एक दूजे के पर्याय हैं। तमाम वर्जनाएं, तमाम बंधन इस दिन ढीले पड़ जाते हैं। यह त्योहार बच्चे, बड़े-बूढ़ों से लेकर स्त्री-पुरुषों को रंगों में रंगकर उनमें साम्यभाव पैदा करने वाला माना जाता है। हंसी-ठिठोली और असीम उत्साह इस पर्व के मूल तत्व हैं। बावजूद इसके ध्यान रखना चाहिए कि हमारी मस्ती कहीं मर्यादा की लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन तो नहीं कर रही। मस्ती और मर्यादा के बीच लकीर को ध्यान में रखने में ही इस त्योहार की गरिमा है। उसी में सभी का मान-सम्मान है। मगर जिस ढंग से होली की आड़ में अश्लीलता की घटनाएं होती हैं, उसने इस त्यौहार की मूलभावना को ठेस पहुंचाकर फूहड़ता का पुट दे दिया है।

देश के तमाम कोनों से अश्लीलता, अभद्रता की जिस तरह से खबरें आती हैं तो उससे त्यौहार के नजदीक आते ही लोगों खासकर महिलाओं में डर कायम होने लगता है। लोग अपने घर-परिवार ईष्ट-मित्रों को बचके रहने आदि नसीहतें जारी करने लगते हैं। त्यौहार की आड़ में गलत गतिविधियों के चलते ही अब लोग घरों से निकलना पसंद नहीं करते। जबकि होली मिलन का त्यौहार है। देखने में आता है कि अब कमरों में कैद होकर लोग होली मना लेते हैं। इसके पीछे डर कारण है। कहीं केमिकल रंगों के पुत जाने का डर, कहीं कीचड़ फेंके जाने का डर, कहीं नशे में झूमते लोगों से वाद-विवाद का डर। सोचिए हमारी हरकतों से लोग होली फोबिया का शिकार हो रहे हैं। क्या हम त्यौहार के साथ अन्याय नहीं कर रहे हैं?

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