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स्‍कूटर चलाते, झोला टांगे मेरे दफ्तर पहुंच जाया करते थे अनंत, मोबाइल पर भेजते थे ढेर सारे जोक्‍स

अनंत कुमार के करीबी दोस्तों में शामिल बीजेपी राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने उनके साथ स्मृतियों को ताजा कर उन्हें याद किया है। राजीव चंद्रशेखर का भावुक लेख अनंत कुमार की गैर-राजनीतिक शख्सियत की बारीक परत को समझने के लिए काफी जरूरी है। चंद्रशेखर को कर्नाटक की राजनीति में स्थापित करने में अनंत कुमार का बड़ा योगदान रहा है। पेश है राजीव चंद्रशेखर का अपने दोस्त अनंत कुमार को श्रद्धांजलि भरा लेख...

दिवंगत केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार (फाइल फोटो: PTI)

राजीव चंद्रशेखर 

“कुछ ही दिनों पहले मुझसे किसी ने पूछा था कि राजनीति के क्षेत्र में मेरा सबसे बेहतरीन दोस्त कौन है। तब बिना किसी झिझक के मेरा जवाब था अनंत कुमार। आज मैंने उन्हें खो दिया है। यह अक्सर देखा गया है कि जब आपका करीबी दोस्त आपसे हमेशा के लिए जुदा हो जाता है तब आप जीवन के सफर में उसके सहयोग और बेहतरीन एहसासों को पाकर खुद को भाग्यशाली समझते हैं। ऐसे लोग एहसास दिलाते हैं कि जीवन में वे आपके लिए किस हद तक महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसी ही शख्सियतों में शुमार थे अनंत कुमार।

मैं अनंत कुमार को पिछले 24 सालों से जानता था। उनसे मेरी पहली मुलाकात 1994 में हुई। उस दौरान वह ऊर्जा से भरे हुए एबीवीपी और बीजेपी के युवा नेता थे। जबकि, मैं उस दौर में अमेरिका से आकर व्यावसायिक गतिविधियों में व्यस्त था और खुद को स्थापित करने की जद्दोजहद में लगा हुआ था। मुलाक़ात होने पर वह अक्सर मुझसे राजनीति और मैं उनसे टेक्नोलॉजी और टेलिकॉम पर बात किया करता था।

मुझे याद है कि कैसे अनंत कुमार स्कूटर चलाते हुए और अपना झोला टांगे मेरे दफ्तर पहुंच जाया करते थे। उनकी सादगी का ही असर रहा कि कभी भी सत्ता का घमंड उनके ऊपर हावी नहीं हुआ। वे कम उम्र में ही अटल जी की सरकार में सबसे युवा केंद्रीय मंत्री बन गए थे। लेकिन, उनकी सादगी हमेशा बरकरार रही। घमंड तो तिल मात्र भी नहीं दिखा। मंत्री बनते ही दूसरे दोस्तों को भूल जाने की आदत से परे अनंत कुमार हमेशा अपने पुराने साथियों के साथ मिलते-जुलते दिखाई दिए।

मेरे करियर के शुरुआती दिनों में बीजेपी में एक ऐसी संस्कृति थी जिसमें कोई भी शख्स अपनी बातें और विचार आसानी से साझा कर सकता था। उस दौरान मैं एक अनजान युवा था। लेकिन, अनंत कुमार ने राजनीति के प्रति मेरे झुकाव को काफी हद तक पुख्ता किया। काफी कम समय में उनकी बदौलत मैं कर्नाटक के साथ-साथ राष्ट्रीय चुनावों में सक्रिय होता चला गया।

दक्षिण के राज्यों में कर्नाटक का बीजेपी के किले के रूप में स्थापित होना निश्चित रूप से येदियुरप्पा के साथ-साथ अनंत कुमार के सार्थक प्रयासों का नतीजा था। वह एक परीश्रमी शख्श थे। अक्सर हंसी-मजाक में वह खुद का परिचय बतौर अखिल भारतीय मजदूर परिषद कहकर दिया करते।

मतभेद वाले कई मौकों पर अनंत कुमार ने अपने निजी अभिमान को पार्टी से कभी आगे नहीं रखा। हमेशा उन्होंने पार्टी को ही प्रमुखता दी। जाहिर है राजनीति में उतार-चढ़ाव लगा रहता है। कई ऐसे मौके आए जब अनंत कुमार को भारी राजनीतिक नुकसान झेलने पड़े लेकिन वह हमेशा मुस्कुराते हुए ही नज़र आए। इन सभी बातों को मद्देनज़र रखते हुए मैंने उनसे धैर्य और निराशा को सही ढंग से संभालने की कला बाखूबी सीख ली।

बात 2006 की है जब देव गौड़ा (जेडीएस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री) ने मेरे सामने राजनीतिक करियर का खाका पेश किया। तब उस दौरान अनंत कुमार ने ही कर्नाटक बीजेपी में मुझे स्थापित किया। वह मेरे एक्टिवज़्म वाली राजनीतिक शैली को खूब सराहते थे। हाल में जब मैं बीजेपी में फिर से आया तब वह बेहद खुश थे। उन्होंने मेरी इस पहल को घर-वापसी का नाम भी दिया। वह राजनीति की दुनिया के एक मात्र शख्सियत थे जो मेरे परिवार में पिता से लेकर बच्चों तक घुले-मिले हुए थे।

अनंत कुमार के लिए देश, पार्टी और परिवार के बाद खुद की फिक्र रहती थी। इसी साल मई माह में कर्नाटक चुनाव में कैंपेन के दौरान उन्होंने अपने स्वास्थ्य की बिल्कुल भी परवाह नहीं की। मैंने उन्हें कई दफा स्वास्थ्य को लेकर आगाह भी किया। लेकिन, उन्होंने इस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। चुनाव में व्यस्त रहना और साथ ही संसद के सुचारू रूप से चलने की फिक्र उन्हें हमेशा रहती थी। बीमार रहने के बावजूद वह पूरी ऊर्जा के साथ लोकसभा से राज्यसभा में अपने काम को अंजाम देते रहे।

उनका पारिवारिक जीवन बेहद साधारण लेकिन मूल्य से भरा हुआ था। उनकी पत्नी तेजस्वनी बीमारी में हर-पल उनके संघर्ष के साथ जुड़ी रहीं। बीमारी के आखिरी कुछ महीनों में तेजस्वनी उनके इलाज के लिए बतौर किसी सरकारी मदद के अमेरिका में इलाज के लिए संघर्ष करती रहीं। जीवन के आखिरी क्षणों तक उन्होंने अपना रवैया बेहद साधारण ही रखा।

मेरे लिए अनंत कुमार हमेशा मुस्कुराने वाले खुशमिजाज दोस्त रहे थे और रहेंगे। वह मेरे मोबाइल पर अनगिनत जोक्स भेजते थे और उन्हें मेरे बच्चों के साथ साझा करने के लिए भी कहते थे। मैं हमेशा उन्हें एक बेहतरीन इंसान और सम्मानित राजनीतिक शख्सियत के रूप में याद रखूंगा। वह मेरे लिए दोस्त के अलावा एक भाई और मार्ग-दर्शक की तरह थे। मुझे यह क्षति हमेशा सहनी पड़ेगी।”

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