त्रिशूल पर कंडोम चढ़ाने वालों, कभी सोचा है इससे क्या हासिल होगा? - Jansatta
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त्रिशूल पर कंडोम चढ़ाने वालों, कभी सोचा है इससे क्या हासिल होगा?

धर्म विशेष के प्रतीकों पर हमले का हासिल सांप्रदायिक टकराव के सिवा कुछ नहीं है। फिर भी मुट्ठी भर अराजक लोग समय-समय पर धार्मिक प्रतीकों पर हमले बोलकर धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश में लगे रहते हैं।

Author नई दिल्ली | April 18, 2018 7:50 PM
कठुआ गैंगरेप की घटना के बहाने धर्म विशेष की भावनाओं के साथ खिलवाड़ की कोशिश(फोटो-सोशल मीडिया)

पिछले साल की बात है। घटना पश्चिम बंगाल की है। जुलाई 2017 में बशीरहाटल निवासी एक नाबालिग लड़के ने पैगंबर मोहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। नतीजा यह निकला कि आसपास के इलाके दंगे की आग में सुलग उठे। सैकड़ों घर जले और करोड़ों की संपत्ति खाक हो गई। लोग दर-ब-दर हो गए। मामले की नजाकत भांपते हुए पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद कैफ ने बतौर सेलिब्रिटी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने ट्वीट कर यह संदेश दिया कि पैगंबर मोहम्मद महान हैं, किसी फेसबुक पोस्ट से उनकी महानता कम नहीं हो सकती, फेसबुक पोस्ट का बचाव नहीं किया जा सकता, मगर उसके नाम पर हिंसा पैगंबर मोहम्मद के उसूलों के खिलाफ है। बहरहाल, तमाम कोशिशों के बाद सांप्रदायिक हिंसा की वारदात थमी।

इससे थोड़ा पीछे चलते हैं। दिसंबर 2015 में देश भर में जगह-जगह मुसलमान सड़कों पर उतरे। मामला फिर पैगंबर मोहम्मद साहब पर अश्लील टिप्पणी का था। टिप्पणी करने वाला कोई नाबालिग लड़का नहीं, बल्कि अखिल भारतीय हिंदू महासभा के सदस्य कमलेश तिवारी थे।टिप्पणी करने वाले के विरोध में अनवरुल हक नामक मौलाना ने 51 लाख का इनाम रख दिया था तो जगह-जगह कानून-व्यवस्था संभालना मुश्किल हो गया था। आखिरकार, कमलेश तिवारी को जेल जाना पड़ा।

नामसमझी या फिर सोची-समझी साजिश के तहत धर्म विशेष के प्रतीकों पर कीचड़ उछालकर अपमानित करने की इन कोशिशों का नतीजा सांप्रदायिक हिंसा और खून-खराबा के सिवा कुछ नहीं निकला। इससे कानून-व्यवस्था के लिए जहां तमाम दिक्कतें खड़ी होती हैं, वहीं आम जन की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है।

खैर, अब ताजा मसले पर आते हैं। जम्मू का बहुचर्चित कठुआ कांड सुर्खियों में है। इस घटना ने हाल के दिनों में घाटी को राजनीतिक ऊष्णता प्रदान कर रखी है। जंगल में घोड़ों की तलाश में निकली आठ साल की एक बच्ची को क्रूरतम तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया। बलात्कार के बाद हत्या की बात सामने आई। 10 जनवरी को हुई इस घटना में तीन महीने बाद हालिया पेश हुई क्राइम ब्रांच की चार्जशीट ने लोगों को झकझोर कर रख दिया।

शुरू में  बच्ची के इंसाफ के लिए जाति-धर्म, उम्र की दहलीज टूट गई। सोशल मीडिया से लेकर सड़क पर हर कोई बच्ची को इंसाफ दिलाने की मुहिम में शामिल हुआ। मगर इस बीच खतरनाक खेल हुआ, जब बच्ची की लाश पर सांप्रदायिकता का कफन चढ़ाने की कोशिश हुई। हमेशा मौके की ताक में रहने वाले ‘राजनीतिक गिरोह’ को दरिंदगी की शिकार बच्ची में बच्ची नहीं, मुसलमान दिखा और आरोपियों में हिंदू।

बच्ची की लाश ‘उनके’ लिए सियासी ‘आस’ में बदल गई। इंसाफ की लड़ाई की आड़ में राजनीतिक हित साधे जाने लगे। कोर्ट में केस जाने से पहले ही सड़क पर अदालतें सज गईं। हर पक्ष के ठेकेदार जज बनकर फैसला सुनाने लगे। इन सब के बीच बच्ची के साथ दरिंदगी की घटना गौण हो गई और बहस केंद्रित हो गई तो सिर्फ हिंदू और मुस्लिम पहचान पर। पीड़ित और आरोपियों से कहीं ज्यादा मायने अब उनकी मुस्लिम और हिंदू पहचान रही। अब बलात्कार से ज्यादा चर्चा कथित घटनास्थल मंदिर और हिंदू आरोपियों की होने लगी। देखते ही देखते हत्या और बलात्कार की एक घटना को हिंदू बनाम मुस्लिम की सांप्रदायिक रंजिश का रूप दे दिया गया।
सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ ‘महारथी’ अब घटना के बहाने हिंदू धर्म पर फब्तियां कसने लगे। सोशल मीडिया पर  धार्मिक भावनाएं भड़काने वालीं तस्वीरें वायरल होने लगीं। कहीं त्रिशूल पर कंडोम चढ़ाने की तस्वीरें तो कहीं माथे पर तिलक लगाए शख्स के लड़की से बलात्कार की कोशिश, कहीं योनि में त्रिशूल घुसने की तस्वीर, कहीं कंडोम पर भगवा ध्वज फरहने की तस्वीर वायरल की जाने लगीं। सुनियोजित तरीके से बलात्कार की घटना का ठीकरा समूचे हिंदू समुदाय पर फोड़ दिया गया और आठ आरोपियों की धार्मिक पहचान के जरिए पूरे हिंदू कौम को बलात्कारी साबित करने की मंशा सोशल मीडिया पर साफ दिखने लगी। इस धार्मिक निशानेबाजी की घटना ने कठुआ की घटना को ध्रुवीकृत कर दिया।

पहले जहां हर धर्म के लोग बच्ची को इंसाफ दिलाने की कोशिश में खड़े नजर आ रहे थे, अब हिंदू-मुस्लिम की लकीर खिंचती दिखी। जबकि सच यह रहा कि सोशल मीडिया से लेकर सड़क पर बच्ची को इंसाफ दिलाने की जद्दोजहद में हिंदू कहीं पीछे नहीं रहे। यहां तक कि केस को मुकाम दिलाने की कोशिश में भी उसी धर्म के लोग आगे आए, जिस धर्म पर घटना की आड़ में निशाना साधने की कोशिश हुई। चाहे पीड़ित परिवार की वकील दीपिका हों या फिर चार्जशीट पेश करने वाले क्राइम ब्रांच के अफसर रमेश जल्ला। हर कोई हिंदू। सवाल फिर उठ खड़ा हुआ कि आखिर बलात्कार की घटना के बहाने धर्म विशेष के प्रतीकों पर हमला करने से हासिल क्या होने वाला है।

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