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ललित प्रसंगः कौन तुम

मेरे घर में कोई घुस आया है। छिप कर बैठ गया है, कहीं। कहीं है जरूर। यहीं आसपास। मगर पता नहीं, कहां है? किधर है? उसके होने का पूरा-पूरा अहसास हो रहा है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

मेरे घर में कोई घुस आया है। छिप कर बैठ गया है, कहीं। कहीं है जरूर। यहीं आसपास। मगर पता नहीं, कहां है? किधर है? उसके होने का पूरा-पूरा अहसास हो रहा है। अहसास क्या, उसके होने की पूरी गंध, पूरी ध्वनि, ध्वनि की झंकार झंकृत हो रही है। वह मुझे चुराने के लिए ही घुसा है, शायद। शायद नहीं, निश्चित। वह मुझे चुरा रहा है। जहां-जहां मेरा होना होता है, वहां-वहां से मुझे हटा कर अपने में खींच रहा है। अरे यह क्या? देखो न, मेरी तो समूची संचेतना ही उसमें संकेंद्रित होती जा रही है। तो? तो… उसे चोर कहंू क्या? नहीं, नहीं यह ठीक नहीं है। उसका मुझे बिना बताए ही मेरे में घुस आना चोर जैसा जरूर है। मुझमें ही मुझसे छिप कर अपनी ठांव बना लेना, पकड़ में न आने वाली ठांव हथिया लेना चोर जैसा जरूर है। मगर चोर इतने ढीठ होते हैं, नहीं सुना। चोर इतने ललित होते हैं, नहीं जाना। वह चुरा रहा है, यह बिल्कुल सही है। मगर उसका चुराना इतना भला क्यों लग रहा है? नहीं मालूम।
यह कौन है? पता नहीं। देखा नहीं अभी तक, फिर पहचान कैसी! परिचय कैसा! फिर अपरिचित से इतनी आत्मीयता क्यों? इतना आकर्षण कैसा? इतना लगाव कैसा?

क्या बताऊं, कुछ समझ नहीं आता। परिचय कोई बहुत बड़ी चीज है क्या? अब सारी दुनिया कहती है, तो होगी। दुनिया निराली है। कुछ को कहने में उसे कुछ नहीं लगता। दुनिया की अपनी आंख है। वह नहीं देखती कि और चीजों की भी अपनी आंख है। दुनिया तो बिना भर आंख देखे, जी भर कहने की आदी है। कुछ कहने से भला कब पेट भरा है उसका। खैर। वह कतई परिचित नहीं है। नितांत अपरिचित है। अपरिचित है, इसीलिए परिचय की उत्कंठा में उमगाता रहता है। उसका अपरिचय ही उसके अचूक सम्मोहन का मूल है। परिचय पा लेने की हुमस ही दिल को चीर देती है। बड़ी कसक होती है। मगर यह कसक कितनी प्रिय है। इतनी प्रिय कि पल भर को भी विलग होने को जी नहीं चाहता। कितनी मीठी है। इतनी मीठी कि हमेशा मुंह लगाए रखने का मन होता है। इतनी अद्भुत कि पी-पी कर प्यास बढ़ती जाती है। कैसा लावण्य है। लावण्य का कैसा रूप है। रूप कैसा अपरूप है। अपूर्व है। कितना नया है। क्षण-क्षण नया। जानने से अधिक जानने के लिए आमंत्रित करता हुआ। आंख उड़ने लगती है, पीछे-पीछे। वह आंखों में समा कर अपने रस के ऐश्वर्य से सींच कर अपने पीछे दौड़ने को आंखों को लगाए रखता है। जगाए रखता है। वह सचमुच अपरिचित है, परिचितों की व्यर्थता का डंका बजाता हुआ। यह अपरिचय का कैसा सम्मोहन है, जो परिचय की पकड़ को सहज ही छुड़ा देता है। अपरिचय के आकर्षण में परिचय के समूचे संसार का विस्मृत हो जाना कितना विस्मयजनक है।

उस अपरिचित का अपने में होना इतना सघन है, जीवंत है, जाग्रत है कि तनिक भी संदेह की गुंजाइश नहीं है। फिर भी उसका अलक्षित होना कितना आश्चर्यजनक है। जितना आश्चर्यजनक है, उससे भी अधिक कुतूहलपूर्ण है। वह है, तय है। मगर कहां है, कहां-कहां है तय कर पाना मुश्किल है। वह हर कहीं है, क्या? हर चीज में समाया हुआ है क्या? लगता तो ऐसा ही है। मगर जहां भी देखने की कोशिश करो, पकड़ने का प्रयास करो, पहचानने का यत्न करो, वहां से गायब। अलक्षित होकर व्याप्त होना ही प्रेम का होना होता है क्या? खुद अलक्षित रह कर लक्ष्य बन जाना, जीवन की बागडोर गह लेना कितने अचंभे की बात है। मगर वह ऐसा ही है, अचंभे की तरह।

वह ऐसा है कि जागे में जो करता है, करता ही है। वह सोने में भी बहुत कुछ करता है। जहां क्रियाशीलता की गुंजाइश सबसे कम होती है, वहां भी वह हमारी चेतना को क्रियाशील रखता है। नींद के सुनसान घर में भी वह बहुत बड़ा काम करता है। सुनसान घर में ही नींद का निवास होता है। नींद के घर में वह सुनहले सपनों के चित्र बनाता रहता है। ऐसे चित्र वह बनाता है, जो हमारे प्राणों की प्यास है। वह हमारे प्राणों की प्यास के लिए चित्र बनाता है। सपने हमारे प्राणों की प्यास बुझाने वाले होते हैं। सपनों में भी कुछ बड़े सुनहरे होते हैं यानी कीमती होते हैं। जो हमारे में छिप कर बैठा है, वह हमारी आंखों में अपनी कूची से सुनहरे सपनों के चित्र अंकित कर देता है। उस चित्र से आंख बंध जाती है। बस बंध ही जाती, बंधी ही रह जाती तो भला ही भला होता। मगर आंख है कि उससे बिंध भी जाती है। आंख तब बिंध जाती है जब आंख में रहने वाला आंखों से कूद कर बाहर कहीं आंखों से ओझल होने लगता है। जब वह ओझल होने लगता है, सीने से निकलने वाली सांसें उसका अनुसरण करती हैं। उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगती हैं। जब थक कर लौटती हैं तो अपने में उसके होने के निशान ढूढ़ने लग जाती हैं।

वह जो मुझमें समा आया है, अपने प्रभाव में बांध लिया है। उसने अपनी आज्ञा का अनुचर बना लिया है। मुझे अपनी इच्छा के कारागार में उसने मेरे अस्तित्व को जीत कर बंदी बना लिया है। इतना ही होता तो भी केवल दुख की बात न होती। खुशी की बात यह भी है कि मुझे अपने सम्मोहन में बंदी बना कर अपनी विजय की डोर से वह भी मुझसे बंध गया है। उसका होकर भी न होना, न होकर भी होने जैसा है। तभी तो एक करुण अभाव में भी चिरतृप्ति का अमृत भाव भरा रहता है। उसके बोध का एक छोटा-सा क्षण काल के असीम विस्तार में बंधनमुक्त होने का वरदान दे रहा है। कितना विलक्षण है। उसका मुझे कुछ पता न था। पता था तो सिर्फ पीड़ा का। पीड़ा को मैंने खरीदा था कीमत चुका कर अपनी मर्जी से। कभी-कभी सौदे के साथ घालू भी मिल जाता है। इस कभी न भूलने वाली प्यारी खरीददारी में, जो घालू में बिना खरीदे मिल गया है, वह खरीदी हुई चीज से न जाने कितना अधिक मूल्यवान है। प्रिय है। कैसा सौभाग्य है। कैसे कहूं?

आज सृजन का विस्तार अपनी अस्मिता में पुलक से भर रहा है। प्रफुल्लता से भर कर उसके पांव अभिसार में उठ रहे हैं। उसका अभिसार चिरंतन लास्य के लय में विलय का अभिसार है। अब वह न होगी केवल लय होगी पुलक की लय, प्रफुल्लता की लय, कृतार्थता की लय, चरितार्थता की लय। अस्तित्व की अनगिनत तरंगों को लय में रूपांतरित करने वाला, समस्त कोलाहल को संगीत में बांधने वाला, अथाह सूनेपन को आकर्षण की झंकार से गुंजा देने वाला, अपार उदासी को औत्सुक्य से सजा देने वाला, अनबुझ प्यास को परितोष से भर देने वाला, वह जो मेरे हृदय में है, कौन है? वह व्यक्त नहीं है। वह अव्यक्त के व्यक्त होने की प्रक्रिया का वाचक है। विग्रह है। उसका व्यक्त हो पाना संभव नहीं। वह प्रेम जैसा हो सकता है। वह कविता जैसा हो सकता है। वह एक संभावना के घटित होने की उत्सुकता जैसा हो सकता है। वह शब्दों में नहीं, शब्दों से संकेतित संभावना जैसा है। संभावना के सीमाहीन सच जैसा है। मौजूदा क्षण में पूरा मौजूद, फिर भी मौजूद क्षण को प्रतिक्षण अतिक्रमित करती संभावना के सच जैसा। उसका होना चिरंतन का होना है क्या? मगर कैसे कहूं?

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