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हाथरस केस: आखिर प्रशासनिक अधिकारियों से कहां हुई चूक और नासमझी?

टीवी की एक चर्चित एंकर से हुए विवाद के बाद जब उक्त एंकर कोरोनाग्रस्त हुईं तो हाथरस के एसडीएम प्रेम प्रकाश मीणा ने अपने ट्वीट के माध्यम से इस कर्मफल करार दिया।

Hathras Case, Prem Prakash Meenaप्रतीकात्मक तस्वीर.

डॉ.संजीव मिश्र 

उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुए हंगामे के दौरान कदम-कदम पर चर्चा में आए ज्वाइंट मजिस्ट्रेट प्रेम प्रकाश मीणा 2018 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। जब संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में अखिल भारतीय स्तर पर 102वीं रैंक आई तो राजस्थान के अखबारों में बड़े-बड़े साक्षात्कार प्रकाशित हुए। उक्त अधिकारी प्रेम प्रकाश मीणा ने भी दायित्वों के निर्वन के प्रति सजगता के बड़े-बड़े दावे किये। हाथरस में दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने सबसे पंगा भी लिया, पर यह पंगा उन्होंने इतने दिल से लिया कि कोरोना को कर्म से जोड़ दिया।

टीवी की एक चर्चित एंकर से हुए विवाद के बाद जब उक्त एंकर कोरोनाग्रस्त हुईं तो मीणा ने अपने ट्वीट के माध्यम से इस कर्मफल करार दिया। ऐसा सिर्फ मीणा नहीं कर रहे हैं। इस समय ब्यूरोक्रेसी का बड़ा हिस्सा कठपुतली के रूप में काम कर रहा है और यह कठपुतली ब्यूरोक्रेसी भविष्य में लोकतंत्र के लिए खतरा साबित होती नजर आ रही है। लोकतंत्र के चारो स्तंभों यानी न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया की कमजोरी को लेकर आए दिन सवाल उठते रहते हैं। पिछले कुछ कालखंड में ये सवाल और गहराए हैं। इन सबके बीच कार्यपालिका की जिम्मेदार ब्यूरोक्रेसी से उम्मीदें हमेशा ही सकारात्मक रही हैं।

आईएएस बनने के लिए इन्हें सिविल सेवा परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त करना होता है। शुरुआती दौर में आदर्शों की पूरी पोटली इनके हाथ में होती है किन्तु समय के साथ इनमें आने वाले बदलाव इन्हें विधायिका के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव जगा देते हैं। अच्छी पोस्टिंग में योग्यता से अधिक समर्पण का पलड़ा भारी रहने के कारण ये अफसर भी कभी नेताओं को चप्पल पहनाते तो कभी सार्वजनिक रूप से डांट खाते नजर आते हैं। इसी चक्कर में नये आईएएस अधिकारी तक स्वयं को सत्ता की टीम का हिस्सा मान लेते हैं और वैचारिक संकल्पों से भी विरत हो जाते हैं।

जिस तरह हाथरस प्रकरण में अधिकारियों की नासमझी सामने आ रही है, उससे साफ है कि ये अधिकारी परिपक्व तो हैं ही नहीं, होना भी नहीं चाहते। वे हर प्रकरण को व्यक्तिगत स्तर पर अंगीकार करते हैं। जिस तरह से एक पत्रकार से विवाद के बाद प्रेम प्रकाश मीणा ने उक्त पत्रकार को कोरोना होने पर इसे सत्य की हार-जीत और कर्मफल से जोड़ दिया, यह इसी अपरिपक्वता का परिचायक है। ऐसे अपरिपक्व अधिकारियों को कई बार राजनीति का साथ भी मिल जाता है। प्रेम प्रकाश मीणा के इस ट्वीट को सत्ताधारी दल के एक वरिष्ठ चेहरे ने रीट्वीट कर इसे बढ़ावा भी दिया है। कार्यपालिका व विधायिका में अपरिपक्वता व खुन्नस की यह जुगलबंदी निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

ऐसा नहीं है कि पहली दफा ब्यूरोक्रेसी का यह हल्कापन सामने आया है। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी खुलकर कहते हैं कि प्रेम प्रकाश मीणा या ऐसे ही नए आईएएस अफसरों का यह कृत्य तमाम पुरानों के साथ होने वाली कार्रवाइयों का दुष्परिणाम है। वे जानते हैं कि ट्रांसफर-पोस्टिंग से लेकर प्रोन्नति व निलंबन तक पूरी नौकरशाही राजनीति पर निर्भर है, ऐसे में वे सत्ताधारी दल की भावनाओं से पंगा ले ही नहीं सकते। ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक शासन को दिशा निर्देश जारी कर चुका है किन्तु उपर अमल नहीं होता।

सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी अधिकारी की कम से कम दो साल के लिए नियुक्ति की जानी चाहिए और नियुक्ति या तबादलों के लिए राज्य सरकार को सिविल सर्विस बोर्ड का गठन करना होगा। सरकारों ने आईएएस व आईपीएस अफसरों की नियुक्ति व तबादलों आदि के लिए दो अलग-अलग बोर्ड बनाए भी थे किन्तु ये बहुत प्रभावी नहीं साबित हुए। आईएएस अफसरों के लिए बने बोर्ड में राजस्व परिषद के अध्यक्ष के साथ मुख्य सचिव व नियुक्ति विभाग के मुखिया को सदस्य बनाया गया था, वहीं आईपीएस अफसरों के लिए बने बोर्ड में मुख्य सचिव के साथ पुलिस महानिदेशक व गृह विभाग के मुखिया को सदस्य बनाया गया था। स्पष्ट किया गया था कि आपात स्थिति में यदि किसी को हटाया जाएगा या नियुक्ति की जाएगी तो बोर्ड की सहमति लेनी होगी किन्तु ऐसा सही मायनों में प्रभावी रूप से हो नहीं पा रहा है।

आईएएस अफसरों की नयी पीढ़ी इस मामले में कुछ ज्यादा ही तेज है। 1995 बैच के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी साफ कहते हैं कि हाथरस में नयी पीढ़ी की अपरिपक्वता साफ दिख रही है। वे मानते हैं कि बीसवीं सदी तक आईएएस देश की पहले नंबर की नौकरी हुआ करती थी। तब देश की सर्वश्रेष्ठ मेधा आईएएस का हिस्सा होती थी। इक्कीसवीं सदी आते-आते सूचना क्रांति ने देश की मेधा को सिलिकॉन वैली की ओर भेजना शुरू किया और अब तो आईएएस में देश का बेस्ट टैलेंट आ ही नहीं रहा है। इसके पीछे भी राजनीति बड़ा कारण है। पिछले ढाई दशक में कुछ ऐसा हुआ है, जब नेताओं ने मंच से आईएएस अफसरों को उल्टा-सीधा कहना शुरू किया और वे बर्दाश्त भी करते रहे। इससे राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा और श्रेष्ठ मेधा ने यहां आईएएस बनकर काम करने से अधिक उपयुक्त किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की बड़ी भूमिका को स्वीकार करना समझा।

इन स्थितियों में अब आईएएस को देश की पहले नंबर की नौकरी नहीं माना जाता। इसके अलावा आईएएस में सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स बहुत है। आईएएस स्वयं को नौकरियों का ब्राह्मण मानता है और एक तरह से नौकरियों का मनुवाद आईएएस कैडर के भीतर हावी है। आईएएस के प्रभुत्व को लेकर बाकी सारी नौकरियां आवाज उठाती रहती हैं। यह स्थिति भी अत्यधिक खतरनाक है। आईएएस प्रशिक्षण एकेडमी में भी सिखाया जाता है कि नेता हमारे बॉस हैं, मालिक नहीं। हम गवर्नमेंट सर्वेंट यानी सरकार के नौकर हैं, नेताओं के नहीं किन्तु समय के साथ स्थितियां बदल चुकी हैं। नेताओं को लगा कि लोकतंत्र में पूरी पॉवर उनकी ही है, जिसके परिणाम स्वरूप आईएएस का नैतिक बल समाप्त हुआ और नौकरशाही ने समर्पण कर दिया।

पूरी प्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। एक परीक्षा देकर आईएएस बनने के बाद तीस-पैंतीस साल उनकी कोई परीक्षा नहीं होती है। ऐसे में शीर्ष पर बने रहने के लिए आईएएस सत्ता में रहने वालों को खुश करते रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पूरी ब्यूरोक्रेसी कठपुतली की तरह नाचती है, जो अंततः लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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