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‘लव जिहाद’ मुद्दे के पीछे आखिर क्या है राजनीति?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देश के हर नागरिक को प्रदान किया गया है। यह अधिकार अंतर्धार्मिक विवाहों का पथ भी प्रशस्त करता है। ऐसे में ‘लव जिहाद’ को गलत ढंग से परिभाषित करना समस्या की जड़ में है।

crime, crime news, love jihadप्रतीकात्मक तस्वीर।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गैरकानूनी धर्म परिवर्तन अध्यादेश लाए जाने के साथ ही ‘लव जिहाद’ को लेकर चर्चा और तेज हो गयी है। सामान्य रूप से हिन्दू संगठन पहले भी ‘लव जिहाद’ को लेकर तमाम सवाल उठाते रहते थे, किन्तु पिछले कुछ महीनों में कई राज्यों की सरकारों के बीच ‘लव जिहाद’ को लेकर कानून बनाने की होड़ सी लगी थी। कई राज्यों ने इस संबंध में घोषणाएं भी कीं और इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दिशा में अध्यादेश लाकर पहल भी कर दी। दरअसल ‘लव जिहाद’ का मौजूदा रूप अलग-अलग ढंग से परिभाषित हो रहा है।

‘लव जिहाद’ को सच मानने वाले हों या इसे कपोल कल्पना करार देने वाले हों, सभी का एजेंडा विचारधारा केंद्रित है। कहा जाए तो हर किसी का अपना-अपना ‘लव’ है, और विचारधारा जनित प्यार में हर कोई अपना-अपना ‘जिहाद’ यानी विचारधारा जनित युद्ध कर रहा है। इस इश्क और संघर्ष के परिणाम कुछ भी हों, पर यह पूरी प्रक्रिया भारतीय समाज में विभाजन की रेखाएं गहरी करने वाली है।

‘लव जिहाद’ की परिकल्पना के साथ ही हमें इस शब्द को समझना होगा। ‘लव’ एक अंग्रेजी शब्द है, जिसका सीधा अर्थ प्यार सबको समझ में आता है, वहीं ‘जिहाद’ एक अरबी शब्द है, जिसे अलग-अलग रूप में परिभाषित किया गया है। ‘जिहाद’ का अर्थ है अल्लाह के लिए स्वार्थ व अहंकार जैसी बुराइयों से संघर्ष है। इसके आशय धार्मिक युद्ध कतई नहीं है। इसके बावजूद लगातार ‘लव जिहाद’ को प्यार की राह पर चलकर धर्मयुद्ध के रूप में परिभाषित किया जाता रहा है। ‘लव जिहाद’ को खारिज करने वाले प्यार को धर्म से जोड़ने का विरोध करते हैं। वे पूरी तरह गलत भी नहीं कहे जा सकते।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देश के हर नागरिक को प्रदान किया गया है। यह अधिकार अंतर्धार्मिक विवाहों का पथ भी प्रशस्त करता है। ऐसे में ‘लव जिहाद’ को गलत ढंग से परिभाषित करना समस्या की जड़ में है। वैसे भी भारत में अंतर्धार्मिक विवाहों की संख्या बहुत कम है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक भारत में अंतर्धार्मिक विवाह महज दो फीसद हैं। इन्हें सभी हिन्दू-मुस्लिम हों, ऐसा नहीं है और जो हिन्दू-मुस्लिम अंतर्धार्मिक विवाह हों, उनमें भी सभी लड़के मुस्लिम व लड़कियां हिन्दू हों ऐसा नहीं है।

भारत में केरल से ‘लव जिहाद’ की स्वीकार्यता की शुरुआत हुई, जो बाद में कर्नाटक के रास्ते देश के अन्य हिस्सों में विस्तार पाई। ‘लव जिहाद’ को लेकर इसके विरोधियों की सभी आशंकाएं निर्मूल हों, ऐसा पूरे तौर पर नहीं कहा जा सकता। उत्तर प्रदेश में कानून बनाने की यात्रा में हाल ही में कानपुर के कुछ मामले बड़ा कारण बने हैं। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि एक ही मोहल्ले की आधा दर्जन लड़िकयों को पास के एक ही मोहल्ले के दूसरे धर्म के आधा दर्जन लड़कों से प्यार हो जाए। यदि ऐसा हुआ भी हो, तो सामाजिक विद्वेष के इस दौर में इसे स्वीकार करना कठिन होता है।

कानपुर में ऐसा हुआ है, कुछ माह के भीतर हुए 14 अंतर्धार्मिक विवाहों में लड़कियां हिन्दू धर्म की थीं। यह मामला सामने आने के बाद गठित विशेष जांच टीम ने पाया कि तीन लड़कों ने नाम बदलकर हिन्दू लड़कियों से संबंध बनाए। ऐसी स्थितियां शक पैदा करती हैं और इसके लिए सामाजिक रूप से मिलकर समस्याओं के समाधान की जरूरत है। इनमें आठ लड़कियां नाबालिग भी थीं, जिनके साथ संबंध बनाना पहले से ही अपराध की श्रेणी में आता है। ये स्थितियां ही कानून बनाने का आधार बनती हैं।

वैसे ‘लव जिहाद’ के विरोधियों को समता भाव भी स्थापित करना चाहिए। उत्तर प्रदेश की सरकार इसके खिलाफ अध्यादेश ले ही आयी है और मध्य प्रदेश, हरियाणा जैसे कुछ राज्यों की सरकारें इस दिशा में तैयारी कर रही हैं। संयोग है कि इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और भाजपा के शीर्ष दो मुस्लिम नेताओं ने हिन्दू बेटियों से ब्याह किया है। अब वे इसे ‘लव जिहाद’ के रूप में स्वीकार करते हैं या नहीं, यह भी देखना होगा। भाजपा में ही इश्क और विवाह के लिए धर्म परिवर्तन के बड़े उदाहरण के रूप में धर्मेंद्र व हेमामालिनी की जोड़ी है। धर्मेंद्र पहले से विवाहित थे और हिन्दू धर्मावलंबी होने के कारण पहली पत्नी होते हुए दूसरी शादी नहीं कर सकते थे।

ऐसे में हेमामालिनी से विवाह के लिए उन्होंने धर्मांतरण कर निकाह किया था। कानून के मुताबिक यह धर्मांतरण तो पूरी तरह महज विवाह के लिए ही था। ऐसी स्थितियां निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इन पर अंकुश लगना ही चाहिए। वैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय सहित कई अदालतें विवाह के लिए धर्म परिवर्तन को गलत ठहरा चुकी हैं। इस पर अंकुश लगाने व न्यायालय के फैसलों के अनुपालन में कोई दोष नहीं निकाला जा सकता। इन सबके बीच ‘लव जिहाद’ जैसे मसलों से सामाजिक मनभेद उत्पन्न करने वालों को भी चिह्नित किया जाना चाहिए।

प्यार और धर्म के नाम पर किसी को भी अपना राजनीतिक एजेंडा लागू करने का मौका भी नहीं मिलना चाहिए। इससे समाज विभाजित होता है और देश की एकता-अखंडता पर संकट के बादल छाते हैं। इसे रोकना ही होगा।

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